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मंज़िल

Hindi Poems

- HP Sarkar







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◍   1   ◍
ज़िंदगी, तू कसम न दे ज़िने के लिए
हम सौ बार गिरे हैं सही
सौ बार उठे भी हैं जीने के लिए।

औरों की कहानी और होगी
दो कदम तू भी चल मेरे साथ
तेरी कहानी भी बदल जाएगी जीने के लिए।।



◍   2   ◍
काश कहीं से आ जाए खुशबू फुलों की
कि मेरे मेहबूब की याद आई है
अब तो रात जागने की आदत हो गई
मेरे इंतज़ार में नींद थकके सो गई।
चाँद भी जागता रहा रात भर, सदीयाँ बीत गईं
आज भी खामोश है वक्त, रात डलती गई।।


◍   3   ◍
एक कदम उठा था कभी मंज़िल की ओर
ज़माना बीत गए मगर आज भी वह दौर जारी है ।

कई बार सोचा कि मंज़िल को ही बदल दूं
मगर ख्वाबों को न बेच सका

पता चला, आज भी वह दौर जारी है
एक मंज़िल ही है , आज भी इंतज़ार में खड़ी है ।



◍   4   ◍
आँसू बहाने से गर तू ख़ुश होता ऐ ख़ुदा
तो काश में आँसू बहा भी दूं -
मगर तू साथ है मेरे
उस हिम्मत का क्या करूं ?

आज भी टकरा जाता हूं पत्थरों से
के सीने में मेरे तू है
यह पत्थर फिर भी तो मिट्टी ही है
इस सिने का क्या कोरूं ?



◍   5   ◍
जलता है दिया अंधेरों में
सायद यह सोचकर -
ज्यादा नहीं तो थोड़ा ही सही
रोशनी दूंगा जलकर ।

जीवन के पन्नों में
एक पन्ना ऐसा भी है
हम बन जाते हैं ख़ुदा
ख़ुद को मिटाकर ।









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