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सदाचार

- HP Sarkar







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एक गांव में एक पंडित रहते थे। वे विद्वान और सदाचारी थे। उस शहर के प्रजा उनसे बहुत प्यार करते थे , उनका ख़ूव सम्मान करते थे। उस देश के राजा भी उनको सम्मान करते थे। इस वजह से राजदरबार में उनका हमेशा आना-जाना रहता था।

एकदिन उन्होनें सोचा “लोग मुझे क्यों चाहते हैं ? वे लोग मेरी पढ़ाई-लिखाई को सम्मान करते हैं या मेरे सदाचार को सम्मान करते हैं ? इसका उत्तर मुझे चाहिए। ”

अगले दिन बे राजसभा में गए, लौटते वक्त राजकोष से चुपके से एक सोने की मुद्रा ले गए। लेकिन राजकोष के अधीकारि ने उन्हे ऐसा करते देखलिया। अधीकारि ने सोचा कोई ज़रुरी काम होगा ओर वे जलदी जलदी में बोलना भूल गए।

दूसरे दिन वे पंडित फिर राजसभा में आए और लौटते वक्त फिरसे राजकोष से चुपके से दो मुद्राएँ ले गए। अधीकारि ने आज भी देखा मगर कुछ नहीं बोला। तीसरे दिन भी जब ऐसा हुआ तो अधीकारि ने यह बात महामंत्री को बाताई।

अगले दिन भी वे पंडिन राजसभा में आए। मगर आज महामंत्री उन पर नज़र राख रहे थे। पंडित जब लौटने लगे तब महामंत्री भी उनके पीछे-पीछे छिप-छिप के चलने लगे। महामंत्री ने देखा वे पंडित आज भी चुपके से कई सारी मुद्राएँ लेकर चले गए। यह पंडित तो राजकोष से सोने की मुद्राएँ चुरा रहा है।

महामंत्री ने यह बात महाराज को बातई। तब राज आदेश से उस पंडित को बांधकर राजसभा में लाया गया और सरे प्रजा और सभासद के सामने उनका न्याय किया गया।

सभी ने इस चोरी ओर बेईमानी के लिए उनका प्राणदंड माँगा। तभी वे पंडित ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। सब लोग आश्चर्य हो गए।

राजा ने उनसे इस हँसी का कारन पूछा। तब वे बोलने लगे “ महाराज , मैं यह जानना चाहता था कि लोग मुझे क्यों सम्मान करते हैं ? वे मेरे सदाचार का सम्मान करते हैं या फिर मेरी पढाई-लिखाई का सम्मान करते हैं? ये बात जानने के लिए ही मैं ने राजकोष से मुद्राएँ चुराई।” यह कहकर पंडित ने अपना थैला से निकालकर सारी मुद्राएँ राजा को दे दी और कहा “ महाराज मैं ने जाना कि लोग मेरी सदाचार को ही सम्मान करते हैं। क्योंकि जब मैं ने सदाचार छोड़ा लोग मेरी पढ़ाई-लिखाई को भी भूल गए और मुझे प्राणदंड मिला। इसलिए मैं हंस रहा था। ”

राजा के साथ साथ बाकी सब भी असली बात जान गए और पंडित की ख़ूब तारीफ करने लगे।
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ब्रजलाल

- HP Sarkar

एक शहर के कोने में एक मिठाई की दुकान थी। दो भाई, ब्रजलाल और केशवलाल मिलके वह दुकान चलाते थे। मिठाई की गुणवत्ता अच्छी थी। इसलिए दूर दूर से लोग मिठाई लेने आते थे।

एकबार एक जरुरी काम के लिए केशवलाल छह महिने के लिए दूर देश में चले गए। केशवलाल चले जाने के बाद की बात है।

एक दिन ब्रजलाल की दुकान में एक ग्राहक बोल रहे थे कि व्यवसाय में चारों तरफ मंदी का भीषण बुरा दौर आने वाला है। अब से व्यवसाय करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा।

ब्रजलाल ने इस बात को मन में बिठा लिया। वह दिन भर सोचता था कि भीषण मंदी आनेवाली है, अब मेरा क्या होगा ? वह बहुत उदास हरने लगा। उसकी मुँह से हंसी ग़ायब हो गई।

अब उसकी दुकान में ग्राहक आना भी कम हो गाया। ब्रजलाल समझने लगा सही में अब मंदी का दौर चालू हो गया। वह और घबरा गया और उदास रहने लगा। ग्राहक और कम होने लगे। पहले उसकी दुकान में 50 सेर की मिठाई बनती थी। धीरे धीरे ऐसा हुआ कि अब 5 सेर की मिठाई ही बनती है फिर भी कुछ बच जाते हैं।

ऐसे में एक दिन केशवलाल लौट आया। दुकान और भाई की दशा देख उसे बहुत दु:ख हुआ। उसने ब्रजलाल से इसकी बज़ह पुछी तो ब्रजलाल ने सब सीधा सीधा और सच सच बोल दिया। केशबलाल समझदार था वह सब समझ लिया।

वह मुस्कराते हुए भाई से कहा “ हाँ, भैया तुम सच कह रहे हो। मंदी का दौर तो आया था , मगर वह पिछले महिने में ही चला गया। अब लोग चारों तरफ हर्ष और उल्लास के साथ नए नए व्यापार चालू कर रहें हैं। मंदी कबका खतम हो गया है। ”

ब्रजलाल को भाइ की बात पे यक़ीन था। उसने भी मान लिया कि सही में मंदी चली गई और मन ही मन बहुत ख़ुश हुआ। उसकी मुसकान लौट आया , मन मे नई आशा जागी और वह बहुत ख़ुश रहने लगा।

अब धीरे धीरे लोग आने लगे , ज्यादा मिठाई भी बिकने लगीं। कुछ ही दिनों में फिर से 50 सेर कि मिठाई बनने लगीं।

फिर एक दिन ब्रजलाल के मन में एक संका जगी। उसने अपने भाई से पूछा “ मंदी क्या फिर से आएगी? ”

केशवलाल हँसने लगा। उसने बोला “ मंदी कभी कुछ भी नहीं थी। तुम किसिकी बात सुनकर मन ही मन डर गए थे और मंदी को सच मान लिए। तुम उदास रहने लगे तो तुम्हारे काम में उसका असर पड़ा। विक्री कम होने लगी। फिर जैसे ही तुम सोचने लगे कि मंदी चली गई , तुम बहुत ख़ुश हुए , मन में एक आशा, एक उम्मीद जाग उठी। तुम मुस्कराने लगे और ख़ुश रहने लगे तो तुम्हारे काम में भी उसका असर हुआ। ” अब ब्रजलाल दिलसे हंसने लगे।
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नियुक्ति

- HP Sarkar

एक गांव में दो दोस्त रहेते थे। पलाश और विनय। दोनों पंडित, बुद्धिमान, साहसी और बलवान थे। उनकी बातें धीरे धीरे राजा के कानों तक पहुँचीं । फिर एक दिन राजा का बुलावा आया। गांव में उनके सम्मान और बढ़ गए। उस गांव से राजधानी बहुत दूर थी। पाँच दिनों तक पैदल चलना पड़ता था। दोनों ने साथ में खाने-पीने का सामान लेके गाँव वालों से बिदाई लेके राजधानी की ओर चल दिए।

रास्ते में बहुत सारे गाँव , बहुत सारे नगर को पार करते हुए वे लोग दिन ढलते ही एक मंदिर के सामने पहुँचे। दोनों वहीं मंदिर में रात गुजारे। मच्छरों ने उन्हें रात भर सोने नहीं दिया। फिर सुबह होते ही बेमौसम जोर से बारिश होने लगी। बेमौसम बारिश के कारण रास्ते ख़राब हो गए, फिसलन बढ़ गई। दोनों बहुत तकलिफ में चलने लगे। अगली रात उनको रहने के लिए कोई जगह नहीं मिली तो दोनों एक पेड़ के नीचे सो गए। ऐसे ही चलते चलते दोनों आखिरकार राजदरबार के सामने पहुँच ही गए। अगले दिन सही समय पर दोनों को राजदरबार में लाया गया।

सभी सभासद इन दोनों के ज्ञान, प्रतिभा और व्यवहार से बहुत ख़ुश हुए। राजा को भी बहुत अच्छा लगा और उन्होनें दोनों को राज कार्य में नियुक्त करना चहा। राजा ने राजगुरु से आग्रह किया कि दोनों को सही काम बाँट दिया जाए। राजगुरु ने विनय को बाहर इंतजार करने के लिए कहा। विनय राजदरबार से बाहर चला गया। तब राजगुरु ने पलाश से पूछा “ तुम दोनों इधर कैसे आए ? तुमरी यात्रा कैसी रही ? ”

पलाश ने बोलना चालू किया “ गुरुदेव , यात्रा ख़ूब ख़राब रही। रात को हम सो नहीं पाते थे। हर जगह इतने मच्छर थे। सड़कों की भी बहुत बुरा हाल है। एक दिन रात को हमें सोने की जगह ही नहीं मिली , तो हमें एक पेड़ के नीचे सोना पड़ा। बहुत जगह पे पानी की कमी है तो कहीं खाना मिलना मुश्किल है।” पलाश बोलता गया और राजगुरु ध्यान से सुनते रहे। इसके बाद विनय को अंदर बुलाय गया और पलाश को बाहर रुकाया गया।

विनय से भी राजगुरु ने जब वहीं सवाल किए जो पलाश से किए थे , तब विनय ने बताया “ राजगुरु , हमारी यात्रा बहुत ही अच्छी रही। हमने इस दौरान कितने नए गाँव देखेँ , कितने नए नगर देखें , कितने ही नए लोगों से मुलाकात हुई। यह एक अलग अनुभव है। ” उसकी बातें सुनके हर कोई आश्चर्यचकित रह गया।

राजगुरु : रात को सोने के लिए तकलीफ नहीं हुई ? क्या मच्छर नहीं थे ?
विनय : जी हाँ , मच्छर तो थे , पर मैं उनकी तरफ ज्यादा ध्यान न देते हुए अच्छी तरह चादर ओढ़ के सोया था और ख़ुशी के स्वप्ने देख रहा था। मैं सोच रहा था कि कैसे मैं महाराज से मिलूंगा ? क्या बातें करेंगे ? ये सोचते हूए मैं आसमान के सुंदर सुंदर तारों को देख रहा था।
राजगुरु : रास्ते भी तो ख़राब थे ? चलने में तकलीफ नहीं हुई ?
विनय : जी नहीं , मुझे चलने में कोई तकलीफ नहीं हुई। मैं तो सुंदर सुंदर पेड़ पौधों को देख रहा था। उनमें बैठे हुए पंछीओं के गाने सुन रहा था। वे एक अनोखा अनुभव है।
राजगुरु : और खाने-पीने की तकलीफ ?
विनय : सफर में थोड़ी तकलीफ तो होती ही है। नई जगह , नए रास्ते , थोड़ी तकलीफ तो स्वाभाबिक है।
सभी सभासद वा: वा: करने लगे।

बाहर से पलाश को भी अंदर बुलाया गया। राजगुरु ने दोनों को अलग-अलग काम दिआ। पलास को अलग-अलग राजकार्यों का निरीक्षण का काम सौंपा गया। बहुत सारी जन-योजनाओं में भी उसको शामिल किया गया। और विनय को शिक्षा और साहित्य के काम सौंपे गए। देश की शिक्षा-विकास-योजनाओं में उसको शामिल किया गया। पलाश और विनय राजदरबार से चले जाने के बाद महाराज ने राजगुरु से पुछा कि वे कैसे दोनो को सही काम बांट के दिए।

राजगुरु: महाराज , ये दोनों ही ज्ञानी और बुद्धिमान हैं। पर इनके विचार अलग हैं। पलाश का जो विचार है उससे वह राजकर्यों में दोष निकालेगा ही। इससे हमें पता चलेगा हमारी गलती किधर हुई है और हम उसे ठीक कर सकते हैं। इससे देश को लाभ होगा। साथ ही विनय का जो विचार है, वह शिक्षा और साहित्य में अच्छा काम कर सकता है। वह छात्रों के मन में एक नए स्वप्न, नई आशा और नई उम्मीद जगा सकता है जो आगे चलकर एक सुंदर और सशक्त राष्ट्र निर्मान कर सकता है। राजगुरु की बातें सुनकर सब धन्य धन्य करने लगे।
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दोस्ती

- HP Sarkar

यह बात मैं ने मेरे एक डॉक्टर दोस्त से सुनी है। यह उसकी ही कहानी है। नाम सुप्रतिम है। उसका पिताजी भी डॉक्टर है। वे लोग अमीर है । इसलिए सुप्रतिम को कभी गरीबी का सामना नहीं करना पड़ा था। उसे मालूम नहीं था गरीबी क्या होता है। एक अमीर का बेटा एक अमीर जैसा ही बड़ा हुआ है। लेकिन वह मन से अमीर हुआ इस घटना के बाद।

उन दिनों वह पाँचवी या छठी कक्षा में पढ़ता था। ग़ैर सरकारी स्कूल था तो खर्चा भी ज्यादा था। इसलिए उसके लगभग सारे सहपाठी अमीर ही थे। सिर्फ़ एक को छोड़ के। उसका नाम था देवेश। देवेश के पिताजी उस ही स्कूल के सामने बादाम आदि बेचते थे। उनकी यह इच्छा थी कि देवेश पढ़ाई करके एक बड़ा आदमी बने।

मगर हुआ विपरीत। टायफायड से देवेश की आँखों की रोशनी चली गई। वह अब न तो कुछ पढ़ सकता है और न कुछ लिख सकता है। कुछ ही दिनों में उसे वही स्कूल के सामने अपने पिताजी के साथ बादाम बेचते देखा गया। उसके वहीं दोस्त उससे बादाम खरीदते थे। और उनमें सुप्रतिम भी शामिल था।

सुप्रतिम अपने दोस्त का अंधापन का फायदा उठाके उससे हर दिन बादाम चोरी करता था। एक रुपया का बादाम बोलके पाँच रुपये का बादाम ले जाता था। देवेश को कुछ मालूम नहीं चलता था , लेकिन वह अपने दोस्त पर बहुत भरोसा करथा था। कुछ ही दिनों में देवेश की दुकान भी बंद हो गई। कोई उसे फिर नहीं देखा। इस बीच सुप्रतिम के पिताजी का भी दूर शहर में तबादला हो गया। और वे लोग वहाँ से चले गए। बात यहाँ पे आके रुक गई , मगर खतम नहीं हुई , शुरु हुई दूसरी ओर से।

सुप्रतिम डॉक्टर बनने के बाद उसे नौकरी मिली और उसे उसी शहर में वापस आना पड़ा। अपनी गाड़ी से वह हर दिन उसी स्कूल के सामने से दवाख़ाना जाता था और उसी रास्ते से लौट भी आता था। लोग उसे डॉक्टरबाबु , डॉक्टरबाबु कहते हैं , बहुत सम्मान करते हैं।

एक दिन वह दवाख़ाना से लौट राहा था कि अचानक वहीं स्कूल के सामने उसे अपना दोस्त दिखाइ दिया। देवेश को पहचानने में उसे देर नहीं लगी। उसने गाड़ी को वहीं रुका दिया। देवेस आज बिलकुल अंधा है। कंकाल सा बदन पे एक फटा-पुराना कपड़ा , रूखे सूखे बाल , हाथ में एक दुतारा। ज़मीन में बैठके वह सुर-बेसुर में गाना गा रहा है। सामने एक कटोरी में कोई कुछ पैसा फेंक जाता है तो कोई मुड़के भी नहीं देखता।

देवेश का वह गाना सीधा सुप्रतिम के सिने में आके लगा। लोग उस गाने का मतलब समझे या न समझे सुप्रतिम को उस गाने का अर्थ और दर्द दोनों समझ में आ गया। उसकी आँखों के सामने वो हरकतें दिखाई देने लगी जो उसेन देवेश के साथ किया था। न जाने कितने ही दिन उसने अपने इस असहाय दोस्त को धोखा देकर लूटा था।

सुप्रतिम की आँखों से पानी बहने लगा , वह और देर तक गाड़ी में बैठ न पाया , धीरे से उतारके वह अपने दोस्त के पास आया और देवेश के हाथों को पकड़ा। देवेश अचानक घबड़ा गया। लेकिन जैसे ही उसने उन हातों को छूआ वह और ज्यादा चौंक गया। उसके चेहरे पे एक ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी और दिल की गहराई से एक आबाज़ निकली “ सुप्रतिम ! मेरे दोस्त ! ” देवेश और ज़ोर से सुप्रतिम के हाथों को पकड़ लिया। सुप्रतिम की आँखों से बारिश की तरहा आँसू बहने लगे। बह बहुत कोशिश के बाद बोला “ पहचाना मुझे ? ” और कुछ बोल ही न पाया। देवेश मुस्कराके बोला “ हाँ , कैसे न पहचानता। तू तो मेरा दोस्त है, मेरा भाई है। कितने दिनों के बाद मिले हैं हम दनों। कैसा है तू ? ” सुप्रतिम कुछ बोल ही न पाया। वैसे ही देवेश के हाथों को पकड़के देर तक बैठा रहा। फिर धीरे से बोला “ चल मेरे साथ। ”

सुप्रतिम देवेश का हात पकड़के अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ने लगा। न देवेश की कोई बात उसे सुनाई दी न उसने देवेश का हाथ छोड़ा। गाड़ी सीधा सुप्रतिम के घर के सामने रुकी। घर में जो कुछ भी खाने के लिए था देवेश को दिया। बाद में इतने सारे रुपये देवेश के हाथों में थमाके उसे घर छोड़के आया। अगली सुबह देवेश को लेके सीधा हॉसपिटल। कुछ ही दिनों में उसकी आँखों का ऑपरेशन भी हुआ और आँखों की रोशनी लौट आई। आँखें बिलकुल ठीक तो नहीं हुईं , पर चलने-फिरने में कोई तकलीफ न रही।

कुछ दिन बाद सुप्रतिम अपने ही घर में गरीबों के लिए एक दवाख़ाना चालू किया। कॉलेज की एक सहपाठी , डॉक्टर गीतश्री से शादी की। दोनों मिलके दबाख़ाने में काम करते हैं और देवेश उस दवाख़ाने का बड़बाबू। दवा के लिए पहले उससे ही टिकट लेना पड़ता है।

बाद में सब ने मिलके देवेश की शादी कराई। आज देवेश की लड़की और सुप्रतिम की लड़की साथ-साथ वहीं स्कूल जाती हैं जहाँ ये दोनों कभी जाते थे। लेकिन खर्चे को लेकर दोनों में झगड़ा ज़रुर होता है। क्योंकि सुप्रतिम देवेश की कोई बात सुनता ही नहीं।









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