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Hindi Story

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दादागिरी

- HP Sarkar


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एक राज-दरबार में एक दिन एक तगड़ा और हट्टा-कट्टा अपराधी को पेश किया गया। उसका नाम है बिधु। वह बचपन से ही बोल नहीं सकता। उसके खिलाफ कई सौ आरोप है। मगर सारे आरोप एक जैसा ही है, लोगों को मारने-पिटने का आरोप। बिधु जब-तब किसी को मारता-पिटता था।

बिधु को जब राज दरबार में हाजिर किया गया तब सबने देखा कि उसके चेहरे पे कोई भी डर नहीं है, शिकन नहीं है और कोई अपराध बोध भी नहीं है। देखके लग रहा था कि वह बिलकुल् मज़े में है। उल्टा उसके चेहरे पे एक खुशि की लहर थी। ये देखके राजा और महामंत्री को ख़ूब आश्चर्य हुआ। दोनों मन ही मन सोचने लगे, कोई भी अपराधी राजा के सामने इतना निडर, शांत और खुश नहीं हर सकता। ज़रुर कोई बात है। महामंत्री राजा के कान में बोले और राजा ने आदेश दिया कि बिधु को छोड़ दिया जाय।

बिधु खुशि खुशि राज दरबार से चला गया। मगर उसके पीछे पीछे एक गुप्तचर भी चलने लगा। ये बात राजा और महामंत्री के अलावा और कोई नहीं जानता था। बिधु आपने घर की ओर चलने लगा। उस रास्ते में एक साधुबाबा एक पेड़ के नीचे बैठके, हाथ में माला लिए ध्यान कर राहा था। एक नन्हा सा बच्चा टुक-टुक चलते चलते साधु के सामने आते ही ठोकर खाके गिर गया और रोने लगा। रोने की आवाज सुनके साधु ने आँखें तो खुलीं मगर बच्चा को नहीं उठाया और फिर से आँख बंध करके ध्यान करने लगा। नन्हा सा बच्चा नहीं उठ पा रहा था और रो रहा था। दूर से ये सब देखके बिधु भाग के गया और बच्चा को उठाके गोद में लिया। फिर उसने उस साधु के उपर लाथों की बरसात शुरु कर दी। लाथ, घूँसे खाते खाते, अपना माला हात में लिए वह साधु दौड़के वहा से भाग गया।

कुछ दूर जाते ही और एक घटना हुई। एक बहुत ही वृद्ध भिखारी एक दूकन के सामन खाड़ा होके खाना माँग रहा था। अचानक वह दूकानदार बाहर आया और उस भिखारी को धाक्का मारके गिरा दिया। ये देखके बिधु यहाँ भी भागके गया। बिधु को देखते ही सबको मालुम चल गया कि अब क्या होगा। और वह दूकानदार, बिधुको देखते ही पहले से ही सोर मचाने लगे ‘वचाओ वचाओ’। आस पास के लोग आते आते उस दूकानदार के उपर से लाथ-घूँसों का एक तूफान निकल गया। आस पास के सिपाही भी आए और बिधु को फिर से बंदी बनाके राज दरबार ले गए।

वह गुप्तचर भी ये सव छिप छिप के देख रहा था। गुप्त घर में जाके उसने सारी बातें महामंत्री को बातईं। महामंत्री ने तब राज दरबार में सबको सारी बातें खुलके बाताईँ। राजा बहुत खुश हुए और उन्होंने बिधु को नगर सेवक नियुक्त किया। बिधु भी बहुत खुश हुआ और दिल से, निष्ठा से अपना काम करने लगा।

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दोस्ती

- HP Sarkar

बहुत पहले की बात है। एक गुरुदेव के तपोवन में बहुत सारे शिष्य शिक्षा ग्रहन करते थे। उनमें एक था राधामधव और एक था गोपेश। दोनों परम मित्र थे। वे लोग हमेशा साथ रहते थे, साथ चलते थे। दोनों बुद्धिमान, ज्ञानी और साहसी थे। सबको उनकी दोस्ती के बारे में पता था।

दोनों के बीच सिर्फ प्यार भरे बातें ही नहीं होती थीं, दोनों में झगड़ा भी बहुत होता था। कभी कभी झगड़ा इतना बड़ा होता था कि बाकी लोग यह समझते थे कि दोनों की दोस्ती अब टूट गई। अब कभी ये लोग एक नहीं हो सकते। लेकिन कुछ ही देर बाद दोनों दोस्त जैसे का तैसा। एक दुसरे को पकड़के खुब हाँसते थे, मस्ती करते थे। लोग ये देखकर हैरान हो जाते थे मगर गुरुदेव मुस्कराते थे।

दिन आते थे दिन जाते थे मगर उनकी दोस्ती में कोई दरार न आई। एक दिन जब दोनों वन में गाय चराने गए तब एक शिष्य ने गुरुदेव से पूछा “गुरुदेव, ये दोनों कैसे इतने अच्छे मित्र बनके रहते है? दोनों में तो ख़ूब झगड़े होते हैं। फिर भी ये कैसे एक दुसरे के साथ मिल जाते हैं?”

गुरुदेव सव शिष्यों को पास बुलाया। और फिर कहने लगे “ राधामाधव और गोपेश दोनों बुद्धिमान और ज्ञानी है। ये दोनों हमेशा इसलिए अच्छे दोस्त बनके रह पाते हैं क्योंकि दोनों एक दुसरे से मुक्त हैं। जिधर स्वाधीनता है, वहाँ सुख है, वहाँ आनंद है। वैसे ही ये दोनो अपनी बात खुलके बोलते हैं और दोनों की अलग अलग सोच के लिए झगड़ा भी बहुत होता है। लेकिन क्योंकि ये दोनों अहं मुक्त है इसलिए दोनों के मन जल जैसा है। उस जल में दोनों के झगड़े लकीड़ नहीं खीच पाते। सो मन से हीन भाव हवा की तरहा उड़ जाते हैं और दोनों दोस्त गले मिलके चलने लगते है। जब तक ये गुण उनमें रहेगीं तब तक दोनों की दोस्ती अटूट रहेगी। और दोनों की दोस्ती अटूट रहे यही मेरा अशिर्वाद है।”

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भवानी और चोर उस्ताद

- HP Sarkar

राज दरबार में एकदिन एक चोर को हाजिर किया गया। बहुत दिन से सैनिकों को उसकी तलाश थी। मगर वह पकड़ में नहीं आ रहा था। अब पकड़ में आया। राजाने उसे प्राणदंड़ दिया।

वह चोर खुद को बहुत सयाना समझता था, बहुत बड़ा उस्ताद समझता था। उसे चोरी करने में मजा आता था और वह समझता था कि कोई उसे नहीं पकड़ सकता। मगर वह नहीं जानता था कि उस्तादों के भी उस्ताद रहते हैं। अब जब उसे पकड़ लिया गया और उसे मौत की सज़ा हुई तो उसे कठिन वास्तव का एहसास हुआ। वह बहुत रोने लगा और महाराज से प्राण भिक्षा माँगने लगा।

राजाने कुछ सोचा और फिर उसे एक शर्त पर छोड़ने के लिए राज़ी हुए। शर्त यह थी कि उसे एक आदमी का नौकर बनके एक साल रहना पड़ेगा। पास के शहर में भबानी नाम का एक आदमी रहता है। वह बहुत ही सज्जन, ईमानदार और ज्ञानी है। चोर को एक साल तक भवानी का नौकर बनके उसके साथ रहना पड़ेगा। एक गुप्तचर हमेशा चोर के उपर नजर राखेगा।

अपना प्राण बचाने के लिए चोर तुरंत राज़ी हो गया। वह मन में सोचा “यह भागने का एक अच्छा मौका है। दो दिन वहाँ रहके मौका देखके भाग जाएँगे। मैं तो भागने में उस्ताद हूँ।”

राजा ने एक चिठ्ठी और दो सिपाही के साथ चोर को भवानी पास भेजा। भवानी पास जाके चोर ने देखा यह तो एक साधारण घर है। यहा से भागने में कोई दिक्कत नहीं होगी। और भवानी भी बहुत ही दुबला पतला है। एक धकका सँभलना ही उसके लिए मुशकिल हो जाएगा। चोर सोच रहा था राजा ने उसे ऐसी असान छूट क्यों दी है?

घर के पास ही भवानी की थोड़ी सी जमीन थी। वह उसमें ही खेती-बारी करता था। पहले दिन भवानी उस चोर को साथ लेके अपनी ज़मीन में काम करने गए। चोर ज़मीन देखकर दंग रह गया। थोड़ी सी जमीन में ही एसी फसल हई जो बहुत बड़ी जमीन में होती है। वह भवानी के पीछे पीछे चलने लगा और फसलों को देखके हैरान होने लगा। वह समझ गया कि भवानी जमीन और खेती-बारी में माहिर है। वह उत्साह से भवानी को यह-वह पूछने लगा। भवानी भी उसे जबाव देने लगा। बातों बातों में चोर ने जाना, बहुत बार देश के कई हिस्सों में जब फसलें बरबाद होने के कगार पर थीं, राजा ने भवानी की सलाह माँगी और फसलों को बचाया।

भवानी और चोर जब जमीन से घर लौटे तो उन लोगों ने देखा कि एक धनी सेठ हात जोड़े खड़ा था। उन्होंने भवानी को कल अपने घर में खाने के लिए बुलाया। धनी सेठ चला जाने के बाद वहाँ, उस गाँव के एक गरीब किसान आया। उसने हात जोड़के भवानी से कहा “मेरी लड़की की सादी तय हुई है। मगर घर में एक पैसा नहीं है। अब आप ही मेरा सहारा है। आप ही मुझे बचाईए। ” भवानी ने कुछ सोचा और फिर एक चिठ्ठी लिखके उसके हात मे थमा दी। उसने वोला “ कल तुम राज दरबार में चले जाना और यह चिठ्ठी उनको दिखाना। तुम्हें एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ मिल जाएगीं। लेकिन धीरे धीरे आधा रक़म तुम्हें चुकानी पड़ेगी।” वह गरीब किसान खुशि से रोने लगा। वह भवानी को बहुत दुआएँ देकर चला गया। और चोर वहा खड़े- खड़े हिसाब करने लगा कि सौ स्वर्ण मुद्राएँ चुरी करके जमाने के लिए उसे तिस साल लगेंगे और राजा सिर्फ एक चिठ्ठी पे भरोसा करके उसे सौ मुद्राएँ दे देंगे! उसके मनमें नए विचारों का एक तूफान आया।

अगले दिन वे दोनों उस सेठ के घर गए। जब खाना परोसा गया तो चोर हैरान हो गया। एसा खाना वह कभी देखा ही नहीं था। उसने जाना कि एक बार ईस सेठ को व्यवसाय में बहुत नुकसान हुआ। अपना व्यापार बचाने के लिए उन्होंने भवानी से सहायता माँगी। भवानी के कहने पर राजाने उस सेठ को दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ ऋण दे दी। दस हजार स्वर्ण मुद्राओं की बात सुनके चोर अचंबा रह गया। वह सोच ही न पाया कि दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ कमाने में उसे कितने साल लगेंगे और राजा, भवानी की एक बात पे इतनी सारि मुद्राएँ सेठ को दे दिए! उसके मन में एसा तूफान उठा कि उसके विचार ही बदल गए। वह सोचने लगा “एक भले इंसान अगर अपने विचार और कर्म के गुण से इतना सव कर सकता है तो मैं क्यों गलत रास्ते में जाकर चोरी करके मरने चला था।”

उसी दिन से वह तन मन से भवानी के पास खेती-बारी सिखने लगा। देखते ही देखते दो, तीन साल बीत गए। बाद में एक दिन वह भवानी के कहने पर राज दरबार में हाजिर हुआ। राजा उस चोर में यहीँ परिवर्तन चाहते थे और वे चोर को इस रूपमें देखके खुश हुए। राजा ने चोर को थोडी सी ज़मीन दे दी। चोर खुशि से वहाँ खेती-बारी करने लगा। वह अपने उस्ताद की तरहा इतना उस्ताद तो नहीं बन पाया लेकिन लोग उसे उस्ताद ही मानने लगे।

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तनु, रवि, हनु

- HP Sarkar

तनु और रवि एक ही स्कूल में सातबीँ कक्षा में पड़ते थे। दोनों के घर पास पास ही थे। वे लोग पैदल ही स्कूल जाते थे, आते थे। एक दिन स्कूल जाते समय अचानक एक बदमाश लड़का उनके रास्ता रोकके खड़ा हुआ। वह तनु और रवि की उम्र का था। उसने रवि से कहा “ रवि तू अच्छा लड़का है। इसलिए मैं तुझसे प्यार करता हूँ और तुझसे मुझे कोई झगड़ा नहीँ। मगर तनु अच्छा लड़का नहीँ है। वह खुद को बहुत होशियार समझता है। उसके साथ मुझे कुछ बातें करनी है। ”

रवि मन ही मन सोचा “उफ। मैं तो बच गया। उसके साथ मैं झगड़ा नहीं कर सकता इसलिए यहाँ से भाग जाता हूँ।” रवि तनु को एकेला छोड़के वहाँ से चला गया। फिर वह बदमाश लड़के ने तनु का सारा टिफिन खा लिया, उसकी किताबें फाड़ दी और तनु के जेब में एक रुपया था वह भी ले गया। कुछ दिन तनु के साथ ऐसा ही होने लगा। वह बदमाश लड़का तनु को धमकाता “ अगर किसी को कुछ वताया तो तुझे बहुत मारुँगा।” डर के मारे तनु भी किसी को कुछ नही बताता। फिर तनु ने एक रस्ता निकाला। वह अब स्कूम में टिफिन लेके नहीं जाता, साथ में पैसा भी नहीं रखता और किताबें भी बहुत कम रखता। अब वह बदमाश लड़का देखता है कि तनु के पास कुछ नहीं मिल रहा है तो उसने तनु को छोड़ रवि को एक दिन पकड़ा। उसने बोला “ तनु अब अच्छा लड़का बन गया है। लेकिन रवि, तू अब बहुत होशियारी दिखाने लगा है। तू रुक, तुझसे बातें करनी है।” तनु वहाँ से चला गया। रवि ने उसे रुकने के लिए बहुत कहा लेकिन तनु नहीं रुका और चला गया। तब रवि के मन मे बहुत द:ख हुआ। वह सोचने लगा “ उस दिन अगर मैं तनु को एकेला न छोड़ा होता तो आज तनु भी मुझे छोड़के नहीं गया होता। आगे से कभी भी मैं किसी बदमाश की बात सुनके किसीको एकेला छोड़के नहीं भागूँगा।” उस दिन उस बदमाश लड़के ने रवि का टिफिन खा लिया, उसकी किताबें फाड़ दी, रवि के जेब से पाँच रुपये भी ले लिए, उसे गालीयाँ भी दी।

कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा कि अचानक एक दिन तनु का भाई भानु शहर से उनके घर घुमने आया। भानु को देखके तनु के तन में जैसे जान आई। भानु भी सातवीँ कक्षा में ही पड़ता था। भानु पढ़ाई-लिखाई में तो बहुत अच्छा है लेकिन वह भी बहुत ही बदमाश है। इस लिए लोग उसे भानु के बदले हनु कहते है।

नतु ने हनु को सारि बातें बताई। यह सुनके हनु को बहुत गुस्सा आया। उसने बोला “सारि गलती तुम दोनों की ही है। पहले दिन ही अगर उसे दो फटका मार देते तो बात इतनी बढ़ती ही नहीं।” अगले दिन वे तीनों उसी रास्ते से स्कूल जाने लगे कि अचानक उस बदमाश लड़के ने उनका रास्ता रोका। हनु ने उससे पूछा कि क्यों वह हर दिन तनु और रवि को परेशान करता है?

वह बदमाश लड़का हनु की यह बात सुनके एक डंडा हात में लेके बहुत दादागिरी दिखाने लगा। वह बहुत डिंगे मार ही रहा था कि अचानक हनु ने उसे उसके दाहिने कान के नीचे एक जोरदार चाटा मारा। जैसे एक बिजली पलकों में गरजकर बरस गई। बाकी तीनों में कोई समझ ही न पाया कि यह क्या हो गया?

तनु, हनु और रवि को मालुम नहीं था कि उस बदमाश लड़के के उसी कान में कान की पुरानी बीमारी थी। अभी जो होना था वहीँ हुआ। वह बदमाश लड़का कान के दर्द के कारण ज़मीन मे गिर के जोर जोर से रोने लगा। यह देखके पलकों मे तनु , भानु और रवि वहाँ से गायब।

बहुत दिनोंके बाद एक दिन गाँव के तलाव के पास, एक सर्दी की सुबह फिर से ये तीनों के साथ उस लड़के का मुलाकत हुई। तीनों को एक साथ आते देखते ही उसने आनन फानन में तलाव में छलांग लगाई और कैसे भी करके तैरता हुआ उस पार गया और काँपते काँपते भाग गया।





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