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लेखिका - दिशिता आये, Udaipur, Rajasthan.
One selected story from Hindi Story Competition 'नगेन्द्र साहित्य पुरस्कार', 2020



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दिशिता आये, Udaipur, Rajasthan.

यह कहानी है स्नेहा की। स्नेहा जो एक 14 साल की लड़की है और अपने परिवार के साथ बहुत खुशी से रहती है। स्नेहा का परिवार ज्यादा बडा नहीं है। स्नेहा के साथ उसके माता-पिता ही रहते थे। पर कुछ समय से स्नेहा बहुत दुखी थी और बहुत अकेला महसूस कर रही थी, क्योंकि स्नेहा अपने मन की बात, अपने खयाल सिर्फ अपने पापा से करती थी। पर काम की वजह से स्नेहा के पापा को शहर से बाहर जाना पड़ा। स्नेहा अपने मम्मी-पापा दोनों ं से ही वेहद प्यार करती है। लेकिन स्नेहा को अपने पापा से ज्यादा लगाव था। स्नेहा औरों से बहुत कम बात करती थी। स्नेहा की मम्मी ने कई बार स्नेहा को अपना दोस्त बनाना चाहा पर स्नेहा ने हर वार बात टाल दी। स्नेहा अपने पापा को हर बात बताती थी। स्नेहा अपने पापा का ही इंतज़ार करती थी।

स्नेहा के पड़ोस में उसकी एक सहेली रिया रहती थी। रिया और स्नेहा बहुत अच्छी दोस्त थी। रिया भी अपने माता-पिता के साथ रहती थी। दोनों ं एक साथ ही खेलती थी ,पढ़ती थी। और दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझती थी।

फिर एक दिन रिया की मम्मी बहुत ज्यादा बीमार हो गई थी और चार दिन बाद वो स्वर्ग चली गई। रिया और रिया के पापा दोनों बहुत अकेले हो गाए थे। जब एकदिन स्नेहा रिया के घर गई और रिया ने स्नेहा को अपनी मम्मी के बारे में बताई तो स्नेहा को बहुत दुख हुआ। कुछ दिन बाद स्नेहा ने रिया को देखा कि वो कितनी अकेली हो गई थी। स्नेहा वहुत दुखी थी साथ ही वो यह सोच रही थी, अगर परिवार का कोई व्यक्ति हमसे दूर हो जाता है या उसका साथ हमसे छुट जाता है तो पूरा परिवार कितना खाली लगने लगता है। जैसे जीवन में सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है। स्नेहा ने समझा कि रिया का दुख क्या है। फिर अगली सूबह स्नेहा के मन में यह विचार आया कि अगर यह सब उसके साथ हुआ होता तो? स्नेहा इस बात के खयाल से ही डर गई थी) फिर स्नेहा ने सोचा कि अब वह सबके साथ अच्छे से, प्यार से और हसी-खुशी से रहेगी। अगले दिन स्नेहा के पापा घर आए, स्नेहा बहुत खुरा थी और वह अपनी मम्मी कि अच्ची दोस्त बन गई। अब स्नेहा ने समझा कि अपनों ं कि हिमारी जिदगी में क्या महत्त होती है। वह बहुत अच्छे से अपने परिवार के साथ अपना समय बिताने लगी। अव स्नेहा बहुत ही खुश थी। फिर स्नेहा ने रिया को भी वापस मुसकराना सिखाया। फिर से सब खुश रहने लगे। हमे अपनों का साथ बहुत जरूरी होता है।
( समाप्त )

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