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Hindi Short Story

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नई शुरुआत
लेखक -- गौरव शर्मा, पिता -- रामगोपाल शर्मा, लाड़पुरा बाजार, कोटा (राजस्थान)



नई शुरुआत

लेखक -- गौरव शर्मा, पिता -- रामगोपाल शर्मा, लाड़पुरा बाजार, कोटा (राजस्थान)

"कॉलेज खत्म हो चुका हैं, अब घर में रहकर अपनी माँ और बड़ी ताई से घर के काम सिखों, यही आगे जाकर तुम्हारे काम आएगा, ना कि पढ़ाई।'

विशम्भर नाथ ने अपना फैसला सुना दिया तो रूचि की आगे कुछ बोलने की बिल्कुल हिम्मत ना हुई। लेकिन फिर भी रूचि की माँ ने हिम्मत करके कहा, "लेकिन एक बार इसकी बात तो सुन लीजिए। देखिए तो सही, ये कितने अच्छे नम्बरों से पास हुई हैं। इसकी सभी सहेलियाँ आगे पढ़ाई कर रही हैं तो क्या हमें हमारी बेटी को नहीं पढ़ाना चाहिए?"

नहीं पर विश्म्भर नाथ हर बार की तरह इस बार भी अपनी बात पर अडिग थे। वे नही मानना चाहते थे और वे नहीं मानें। आज ग्रेजुएशन का परीक्षा परिणाम आया था, यही तो दिखाने लाई थी वो पिताजी को। पूरे कॉलेज में सेकेंड नम्बर पर आई थी वो। कितनी खुश थी वो कॉलेज से घर के रास्ते में। अपनी उपलब्धि दिखाकर, पिताजी को खुश देखना चाहती थी । उनकी आँखों में खुशियों की चमक देखने को उत्सुक थी वो। पर उसकी ये खुशियों की बरखा हकीकत की जमीन को छूते ही, गर्म तवे पर पानी की बूंदों की तरह भाप बनकर उड़ गई। एक तरफ रूचि और उसके सपने थे, वो पढ़कर लेक्चरर बनना चाहती थी। दूसरी तरफ विश्म्भर नाथ की सोच थी कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना-लिखाना अच्छी बात नहीं हैं। काफी मिन्नतों के बाद वो रूचि के ग्रेजुएशन के लिए माने थे।

रूचि और उसकी माँ यशोधरा को यकीन था कि वो किसी ना किसी तरह उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए भी मना ही लेंगे पर अब ये कार्य असंभव-सा ही प्रतीत हो रहा था। माँ यशोधरा के अलावा पूरा परिवार विश्म्भर नाथ के ही पक्ष में था। दादी और बड़ी ताई तो जल्द से जल्द रूचि के हाथ पीले करके, परिवार का कथाकथित एक बोझ कम करने पर ही उतारू थी। बड़ी ताई तो मौका पाकर कह भी देती थी, "क्या करना हैं बेटियों को पढ़ा कर? करेंगी तो चूल्हा-चौका ही। हमने तो अपनी बेटियों की जल्दी ही शादी कर दी, तो देखो आज अपनी गृहस्थी में रच-बस गई और आज मजे से सुखी हैं। पढ़ाई के पीछे रहते तो आज कुँवारी ही घूमती।" उनकी बात सुनकर रूचि और यशोधरा चुप रह जाती क्योंकि उनके आगे बोलना बात का बतंगड़ बनाना हैं और कुछ नहीं।

दो-चार दिन इसी असमंजस में निकल गए। कुछ दिनों बाद आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में एडमिशन शरू होने वाले थे और इससे पहले पिताजी को मनाना आवश्यक था। रूचि अपने पिता विश्म्भर नाथ की मर्जी के खिलाफ जाकर कुछ नही करना चाहती थी। लेकिन वो अपनी पढ़ाई भी जारी रखना चाहती थी। इसी बीच एक दिन अचानक शाम को जब घर के सब लोग बैठे थे। तभी रूचि की चचेरी बहन सुकन्या रोते-बिलखते घर आई। आते ही वो अपनी माँ यानि की बड़ी ताई के गले से लिपट गई और लगातार रोती रही। उसके अस्त-व्यस्त कपड़े, चेहरे के निशान उसके साथ घटित हुई किसी अनहोनी की तरफ इशारा कर रहे थे। पूछने पर सुकन्या रोते हुए ही बोली कि जीजाजी ने धोखे से शादी के समय दहेज में दी गई सुकन्या के नाम की जमीन पर, सुकन्या के अँगूठे लगवाकर अपने नाम कर ली और विरोध करने पर मारपीट करके उन्हें घर से निकाल दिया। सब के पैरों तले जमीन खिसक गई कि जीजाजी और उनके घरवाले सुकन्या के साथ ऐसा कैसे कर सकते है। सुकन्या काफी डरी हुई थी। उसके होंठों पर बस एक ही बात थी, "मुझे अब उस घर में नही जाना, कभी नहीं जाना।"

इतना होने पर भी दादी और बड़ी ताई लगभग एक साथ ही बोली, "जाना तो पड़ेगा बेटी, आखिर कब तक यहाँ रहेगी ? लोग क्या कहेंगे ? बेटियाँ तो ससुराल में ही अच्छी लगती हैं, ना कि माँ-बाप के घर में। सहना तो औरत की तकदीर में ही होता है बेटी।"

"अभी वक्त नहीं हैं ये सब बातें करने का। सुकन्या को अन्दर ले जाओ। जल्लादों ने क्या हालत कर दी है हमारी बेटी की," विश्म्भर नाथ की बात सुनते ही बड़ी ताई और दादी की हिदायतों का पिटारा बंद हो गया। उस रात शायद ही घर में कोई सो पाया होगा। अब सब विश्म्भर नाथ के ऊपर था, उन्हीं के फैसले पर सुकन्या का भविष्य टिका था। बड़े भाईसाहब के जाने के बाद उन्ही का फैसला सब के लिए सर्वोपरि था। अगली सुबह सबकी निगाहें विश्म्भर नाथ के फैसले पर ही टिकी थी।

बैठक में उनके दाखिल होते ही बड़ी ताई बोल उठी, "भाईसाहब इसे ससुराल ही छोड़ आओ। मैनें इसे समझा दिया हैं। अजी जवांई जी ने जमीन अपने नाम कर ली तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ा। इसके नाम हो या उनके, एक ही तो बात हैं और मैं तो कहती...." उनकी बात पूरी होने से पहले ही विश्म्भर नाथ ने अपनी बात कहनी शुरू की, "भाभी, मैं फैसला कर चुका हुँ। जब तक जवाई जी अपनी गलती सुधारकर सुकन्या से माफी नहीं माँग लेते, ये इसी घर में रहेगी और अब अपनी पढ़ाई शुरू करेगी।"

"लेकिन भाईसाहब लोग क्या कहेंगे?" बड़ी ताई को फिर से लोगों की ही फिक्र थी। विश्म्भर नाथ अपनी बात पर अडिग थे, "मैंने कह दिया ना। रूचि तुम तैयार हो जाओ, मैं सुकन्या के ससुराल जा रहा हुँ। तुम्हें भी रास्ते में कॉलेज छोड़ता हुआ निकल जाऊँगा। कॉलेज में तुम्हारे एडमिशन शुरू हो रहे हैं ना, तुम्हें दाखिला नहीं लेना है क्या? ससुराल जाकर उन्हें उनकी गलती का अहसास तो कराना ही पड़ेगा ना।"

रूचि, सुकन्या और यशोधरा के चेहरों पर खुशी थी जबकि बड़ी ताई और दादी के चेहरों पर आश्चर्य और चुप्पी के मिले-जुले भाव। दोनों बेटियाँ आकर विश्म्भर नाथ के गले लग गई। दोनों की आँखों में खुशी के आँसूओं की चमक थी। आँसू तो विश्म्भर नाथ की आँखों में भी थे पर आज भी वे इन्हें जता नहीं पाएं।
( समाप्त )


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