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देख लो मुझको, आईना हूँ मैं

Hindi Short Story

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देख लो मुझको, आईना हूँ मैं
लेखक: डॉ लोकेन्द्रसिंह कोट, बड़नगर, उज्जैन, मध्यप्रदेश


# देख लो मुझको, आईना हूँ मैं

लेखक: डॉ लोकेन्द्रसिंह कोट, बड़नगर, उज्जैन, मध्यप्रदेश

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"आईना ये तो बताता है कि मैं क्या हूँ मगर
आईना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में"
-कृष्ण बिहारी नूर

जेम्स ने काम से उठते हुए अँगड़ाई ली और सामने लगे आइने में अपने बिगड़े हुए मुँह को देखकर मुस्कुराया। जेम्स सोचता बहुत है। कई बार तो इतने विचारों से परेशान भी हो जाता है। वह अति संवेदनशील की श्रेणी में आता है इसलिए भी लगभग हर एक घटना उसे अंदर से प्रभावित करती है, चाहे वह अच्छी हो या बुरी।

जेम्स आज देर तक काम करता रहा, सारे कामगार भी चले गए। अकेला होने के बाद भी जेम्स अकेला नहीं था। उसके विचार और आईनों, काँच से भरा घर कभी उसे अकेला नहीं रहने देते। गज़ब है उसका यह पुराना घर भी। आगे आईनों की दुकान है तो पीछे घर। घर क्या आधे से ज्यादा तो भंडार गृह ही है। दो बड़े-बड़े हॉल में मशीनें लगीं हैं और जिस कमरे में जाओ आदम-कद से लेकर हर साईज के आईने, काँच रखे हुए हैं। जहाँ से गुजरो अपनी कई प्रतिकृति आईनों में दिखाई देती। आगे, पीछे पूरा-का पूरा शरीर दिखाई देता था । हरदम दो, आठ, दस... जेम्स साथ होते थे इसलिए शायद ही कभी बोर हुआ हो जेम्स। उसका प्रिय शौक ही था काँच, आईने बनाना और यही रोजी-रोटी भी।

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"आईना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई।"
-गुलजार

किसी बरसात की शाम जब आसपास मेंढ़क, झिंगुर उत्साह से शाम को गुंजायमान कर रहे थे और जुगनू अपनी रंगीनियाँ चमचमा रहे थे तभी उसका मन महका और विचारने लगा- आईने सदाबहार होते हैं। उनकी उम्र न बढ़ती है, न घटती है। बेहद ईमानदार और कमाल के शरीफ; जो है उसे ही दिखाते हैं। कभी झूठ नहीं बोलते और कोई झूठी प्रशंसा भी नहीं। न ही कोई अंहकार, न कोई दोस्त न दुश्मन, अजातशत्रु। न किसी से इर्षा, न कभी किसी से गुस्सा। इससे नायाब कुछ नहीं दुनियाँ में। काश! लोग भी ऐसे ही होते दुनिया में। सोचते-सोचते झपकी आने लगी तो उठकर बिस्तर पर चला गया। खाना आज खाना नहीं था क्योंकि सोमवार का व्रत था। जेम्स ने दुकान पर दो खुबसूरत लाईने लिख रखी थी जो अनायास सबका ध्यान आकर्षित करती थी-
"अगर मुझसे नफरत करना ही है, तो अपने इरादे मजबूत रखना वरना जरा सा भी चूके तो मोहब्बत हो जाएगी।"
नायाब और अनुपम आईनों की दुकान है जेम्स की; बहुत दूर-दूर से ग्राहक आते उस छोटे से कस्बेनुमा शहर में और पसंद के आईने, काँच ले जाते। कईयों के आर्डर रहते और समय व जुबान का पक्का जेम्स उन्हे यथासमय पूरा करता। धंधे में उसकी इस नियमितता ने भी हजारों ग्राहक बढ़ा दिए थे। जेम्स का मानना था धंधा, पैसा अपनी जगह परंतु व्यवहार और ईमानदारी ही किसी भी धंधे की जान होती है। जेम्स डायर पूरा नाम। भरा पूरा एंग्लोइंडियन परिवार का हिस्सा थे जेम्स। पिता रूडोल्फ डायर ब्रिटेन से थे और डॉक्टर थे। माता अनुराधा वी नर्स थी, साऊथ इंडियन थी। आजादी के समय के आस-पास दोनों ने साथ काम करते हुए ब्याह कर लिया था।

कहते ही नहीं यह दस्तावेजों में था कि जेम्स के दादा, परदादा और भी पुराने समय से ईस्ट लंदन या उसके आस पास काँच, आईने बनाने का काम करते थे। अब यह भी किसी फक्र का विषय हो सकता है जेम्स के लिए कि उसका संबंध भी काँच के अविष्कार से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं काँच का आविष्कार मिस्र या मैसोपोटामिया में लगभग ढाई हज़ार साल ईसा पूर्व हुआ था। शुरु में इसका इस्तेमाल साज-सज्जा के लिए किया गया फिर ईसा से लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले काँच के बरतन बनने लगे। पहली शताब्दी आते-आते फ़लस्तीन और सीरिया में, एक खोखली छड़ में फूंक मारकर पिघले काँच को मनचाहे रूप में ढालने की कला विकसित हुई और ग्यारहवीं शताब्दी में वैनिस शहर काँच की चीज़ें बनाने का केन्द्र बन गया था और जेम्स के पूर्वज वहीं से ईस्ट लंदन में आकर बसे थे। उसे यह भी गर्व था कि इतनी गहरी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। हाँ बीच में कुछ लोग अन्य नौकरी, धंधों से जुड़े परंतु वह वही कार्य कर रहा है जो लगभग पॉंच हजार साल पुराना है।

जेम्स जब काम में नहीं लगा होता तो सोचता रहता कि काँच और जीवन का फलसफा है एक ही। काँच बनता है रेत और कुछ अन्य सामग्री को एक भट्टी में 1500 डिग्री सैल्सियस पर पिघलाया जाता है वहीं जिंदगी भी रेत की तरह ही गुजरती है उसमें कभी मन का तो कभी अमन का घटता है तो कभी समस्याएँ एक भट्टी में डालकर उच्च तापमान का अनुभव कराती है। और फिर इस पिघले काँच को उन खाँचों में बूंद-बूंद करके उंडेला जाता है जिससे मनचाही चीज़ बनाई जा सके। इसी तरह जीवन भी विषमताओं में तपकर मन चाहा कुछ करने योग्य हो जाता है। मान लीजिए, बोतल बनाई जा रही है तो खाँचे में पिघला काँच डालने के बाद बोतल की सतह पर और काम किया जाता है और उसे फिर एक भट्टी से गुज़ारा जाता है। ऐसे ही कोई व्यकित बन रहा होता है तो उसे भी तमाम खाँचों में ढ़लना होता है, बार-बार भट्टी में तपना होता है, तभी सही व्यकित सामने होता है।

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"कोई भूला हुआ चेहरा नज़र आए शायद
आईना ग़ौर से तूने कभी देखा ही नहीं।"
-शकेब जलाली

जेम्स को आईने गौर से ही देखना पड़ते थे ताकि किसी को भी गलत माल ना चला जाय। साख ही तो वास्तविक पूंजी है, यह मूल मंत्र था जेम्स का। जेम्स का व्यवहार, साख, बातचीत ऐसी थी किसी को भी उससे मोहब्बत हो जाए। मोहब्बत हो क्या जाय, हो गई। जेम्स ने उस दिन बहुत ही गौर से देखा तो उसे उसका वह चेहरा दिखा जिसे उसने कभी नहीं देखा था। उस चेहरे में रुख़सार दिखाई दी। उसी के यहाँ काम करने वाले अलादिन की युवा बेटी उनके बीमार होने पर काम पर आ रही थी। श्याम वर्ण लेकिन चेहरा उल्लास भरे लावण्य से भरा हुआ। अपने आप में ही सिमटी हुई, बेहद ज़हीन और काम से काम रखने वाली। जेम्स को आईनों में खुद की बजाय उसी का चेहरा दिखाई देता था। ग़ज़ब का समय, जब आईने भी गच्चा खा जाते हैं।

यह बोलने का समय नहीं था। सब कुछ मूक। दोनों के दरमियान बस आईना ही था, उसी संदर्भ में बात होती। जेम्स को तो यह भी नहीं पता था कि सामने से प्रतिक्रिया क्या है। इतने आईने थे कि जेम्स रुख़सार को सीधे देखने की हिम्मत कभी नहीं कर पाया। आईनों ने ही ऐसा पुल बनाया कि बगैर माशुका को देखे भी कोण बनाकर आईनों के माध्यम से जेम्स उसे देख लेता था। तन्मयता से अपना काम करती, बालों की लटों को, जो बार-बार चेहरे पर आ जाती उन्हे पीछे करती, कभी होले से मुस्कराती, कभी गुनगुनाती...। जेम्स के लिए आईना मतलब रुख़सार और रूखसार का मतलब आईना ही होता था। लेकिन मजाल की किसी को पता भी चल जाए...

उस दिन अलादिन ठीक होकर आ गया और रुख़सार का आना बंद। एक दो दिन तो आईने में अलादिन को देखकर ही गुजारे, बैचेनी होने लगी। प्रेम तो प्रेम रहता है, मन में कुलांचे मारता है। पूछ सकते नहीं क्योंकि अलादिन सबसे वरिष्ठ और बेहद कर्मठ, निष्ठावान तथा विनम्र। कभी भी जेम्स को नाम से नहीं पुकारा, हमेशा "सर" ही कहा। जेम्स की अनुपस्थिति में दुकान, कारखाना भी संभाला। यह सब विशेषताएँ जेम्स के लिए दीवार बन कर खड़ी हो गई।

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"हमें माशूक़ को अपना बनाना तक नहीं आता
बनाने वाले आईना बना लेते हैं पत्थर से।
-सफ़ी औरंगाबादी

तमाम जद्दोजहद के जब जेम्स ने आईनों के सामने अलादिन को रुख़सार के बारे में बोलने के लिए घंटों अपने डॉयलाग बोलने का अभ्यास किया और एक दिन मुकर्रर किया कि आज वह अलादिन चाचा से अपने मन की बात कह देगा। लेकिन रंगमंच पर होता वही है जो कठपुतलियों को नचाने वाला करता है। चारों ओर आईने गवाही दे रहे थे, अलादिन भी रोज की तरह अपने काम पर आ गए थे, जेम्स ने सामने आईनों में स्वयं को देखा और अपने रटे रटाए डॉयलाग बोलने वाला ही था कि अलादिन खुशी के साथ जेम्स के ओर बड़े और देशी मिठाई का दोना आगे करते हुए बोले, "सर! अल्लाह का शुक्र है, उस परवरदिगार का रहम है... बेटी रुख़सार का निकाह तय हो गया है... मुंह मीठा कीजिए..."

जेम्स अवाक सा रह गया। मुंह से चाहकर भी शब्द नहीं निकले... गला रूंधने लगा... लेकिन जैसे-तैसे उसने अलादिन के कंधे पर हाथ रखकर गले से लगा लिया। जेम्स की आँखें डबडबा आईं। कुछ काम का बताकर तुरंत वहाँ से निकल गया। गया कहीं नहीं पीछे गोडाऊन का ताला खोलकर वहीं आईनों से भरे हॉल में निढ़ाल होकर बैठ गया। वह स्वयं को संभाल नहीं पा रहा था। सामने पड़े सैकड़ों आईनों में जेम्स फूट-फूट कर रोते दिखाई दे रहा था। मोहब्बत भी आईनों के हर एक हिस्से में रो रही थी। मां उसके बाद पिता फिर डेविड अंकल और अब ये मोहब्बत... सब ज़ुदा होने के लिए ही बने थे।

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जीवन बिसात ही बिछाता है और हर एक को चाहे शतरंज आए-न आए खेलना ही होता है। जेम्स ने बचपन से शतरंज ही खेला और कोई खेल वह बाहर जाकर खेल नहीं सका। ईस्ट लंदन से खानदानी काँच और आईनों के व्यापारी का लड़का पढ़ लिखकर लंदन स्कूल ऑफ मेडिसीन से डाक्टर बन गया और उसकी भारत में पोस्टींग की गई। व्यापारी परिवार बड़ा होने के नाते उनका भारत जाना स्वीकार कर लिया गया। भारत में रूडोल्फ डायर जब आए और उन्हे कमीश्वरी पर पदस्थ किया गया तब भारत में अंग्रेजों की जड़ें हिलना शुरू हो गई थी। चारो ओर 'अग्रेजों भारत छोड़ों' आंदोलन चल रहा था।

रूडोल्फ के लिए बहुत बड़ा परिवर्तन का समय था जो चुनौतियों से परिपूर्ण भी था। नया परिवेश, बेहद गरीबी के बीच जीवटता से जीते लोगों को वह साफ-साफ देख पा रहा था। वैसे रूडोल्फ को सिर्फ अंग्रेजों और राजा महाराजाओं और खासम-खास लोगों का ही ईलाज करना होता था। आम लोगों की पहुँच से अंग्रेजी अस्पताल बहुत दूर थे। फिर भी रूडोल्फ भ्रमण के शौकीन थे, बचे समय में आसपास के क्षेत्रों में निकल पड़ते। वे देखते थे कि जिन परिस्थितियों में यहाँ के लोग जीवन यापन कर रहे हैं वह सब उनकी पुस्तकों के ज्ञान से मिलाप ही नहीं करता है। चिकित्सा विज्ञान की किताबों से मिलाते तो सारी स्थितियाँ उन्हे विपरीत ही मिलती। अंग्रेजी सभ्यता में पले बढ़े रूडोल्फ को बहुत सारी कठिनाई आबो-हवा को लेकर ही हुई। जैसे पानी, खान-पान, रहन-सहन, संस्कृति में पहले पहल तो एक ब्रिटीश डॉक्टर को गँवारपन झलका, हिकारत महसूस हुई पंरतु लोगों की आत्मीयता, आवभगत, अपनापन, सौंधापन, सहजता ने उनके सारे भ्रम धीरे-धीरे तोड़ दिए। उन्हे लगा कि कसौटियाँ ही गलत है, इनका अपना जीवन यापन का तरीका है। वे चिकित्सा से थे तो वे आसपास के वैद्यों से भी मिले और उन्हौने रूडोल्फ का जीवन बदल कर रख दिया। आने वाले चार-छः सालों में इतना रच बस गए कि रुडोल्फ अंग्रेज कम और भारतीय ज्यादा थे। होना भी था क्योंकि आपकी जिज्ञासा, आपकी ललक, आपकी अंर्तदृष्टि ही वह सीढ़ीयाँ हैं जो आपके वजूद में हलचल मचा देती हैं और बाहर जीवटता, विरोधाभास, अनूठा ठेठपन, रहस्य, किताबों, परिभाषाओं से परे भरपूर जीवन हो तो आपका आकर्षण स्वाभाविक है।

भारतीयता में रंगे हुए रुडोल्फ को अस्पताल की ही श्यामवर्णी लेकिन लावण्य से भरपूर अनुराधा पसंद आ गई। अनुराधा ठेठ दक्षिण भारतीय पारम्परिक परिवार से थी और ऐसे में दोनों का मिलन तो रोज अस्पताल की वजह से होता था परंतु ब्याह की बात लगभग असंभव थी। भारत में मान-मर्यादा का सर्वोंच्च स्थान रहा है। ऐसे में बेमेल विवाह और वह भी एक अंग्रेज से कदापि संभव नहीं लग रहा था परंतु कई बार समय और परिस्थिति इतनी बलवान होती है कि सारी कायनात आपके निर्मल मंसूबों को पूरा करने में लग जाती है। अनुराधा के पिता एक लाईलाज बीमारी से ग्रसित थे और रुडोल्फ ने उन्हे इससे आश्वर्यजनक ढ़ंग से उभार दिया और पूरा परिवार जैसे उनका कृतज्ञ हो गया। फ़िर रुडोल्फ का व्यवहार बहुत ही सौम्य, शालीन और अनुराधा के संग शाकाहारी हो गया था। घर पर तो आना-जाना था ही। एक ठेठ दक्षिण भारतीय अयंगार ब्राम्हण तमाम समाज से विरोध मोल लेते हुए अनुराधा और रूडोल्फ का ब्याह रचा देते हैं। हाँ, रूडोल्फ के परिवार से कोई खास आपित्त नहीं आई।

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समय के गुजरते पल में जेम्स बहार की तरह आया। अनुराधा और रूडोल्फ का जेम्स। दो संस्कृतियों के मिलन का केन्द्र जेम्स। उसी समय भारत में कच्चे माल की उपलब्धता और आईनों, कांच की मांग को देखते हुए रूडोल्फ के सबसे छोटे अंकल कांच का कारोबार भारत में ले आए और तलाकशुदा अधेड़ भी, रूडोल्फ और अनुराधा के साथ रहने लगा। नाम था डेविड। रूडोल्फ और अनुराधा के काम के साथ जेम्स भी बड़ा होने लगा। कितना बड़ा इत्तफाक था कि वे रविवार को चर्च जाते और सप्ताह के किसी अन्य दिन मंदिर। और तो और डेविड भी इसी रंग में रंगने लगा था। डेविड के दो ब्याह इंग्लैंड में असफल रहे और उसकी कोई संतान भी नहीं थी। इसलिए जेम्स का चहेता डेविड और डेविड का चहेता जेम्स। जोस, डेविड, शतरंज और आईने यह सब उनके लिए पर्यायवाची शब्द ही थे। होली, दीवाली, क्रिसमस, ईस्टर सब कुछ था उनके आसपास। काम की व्यस्तथा में रूडोल्फ और अनुराधा कभी चर्च और मंदिर नहीं जा पाते लेकिन डेविड और जेम्स तो जाते ही थे। समाज के लिए यह अनोखा समा था।

देश आजादी की कगार पर था। डेविड अपने आईनों, कांच के काम में जम चुका था। दूर-दूर तक उसकी ख्याती कांच वाले अंग्रेज के रूप में हो चुकी थी। जेम्स भी माता पिता के स्नेह में बड़ा हो रहा था। उसे डेविड का काम सुहाता था, स्कूल के बाद वह डेविड के कारखाने में चला जाता और विभिन्न आकार लेते आईनों, कांच की वस्तुओं को देखता था। कई कामगार कार्य कर रहे होते और उनके बीच जेम्स रम सा जाता था। उसे इधर-उधर बिखर रहे कांच के टूकड़ों से कैसे बचना है अच्छी तरह आता था। डेविड के आसपास ही रहकर वह अपने कौतूहल को बरकरार रखता था। अक्सर डेविड से वह जिज्ञासा से भरे प्रश्न पूछता रहता था, "अंकल, कांच जब टूट जाता है तो उसे कितना भी जोड़ो एक लकीर रह ही जाती है... ऐसा नहीं हो सकता कि यह लकीर न रहे..."

जेम्स के इस सवाल पर डेविड चौंक जाता है, कितना परिपक्व प्रश्न है। फिर उसके मोटे-मोटे गालों को खिंचते हुए कहता, "इसके लिए तो इस कांच को फिर से गलाना पड़ेगा और फिर से भट्टी में तपाकर सांचे में डालकर बनाना पड़ेगा, तभी इसमें लकीर नहीं मिलेगी... कुछ समझे!" होले से उसके गाल पर चपत लगाते हुए डेविड यह कहने के बाद खुद ही सोचने लगा कि, बच्चे के प्रश्न ने जीवन बखान कर दिया और मैंने जो उत्तर दिया वह भी पता नहीं कहाँ से आया। रिश्तों के साथ भी ऐसे ही है, टूटे तो टूट जाते हैं और फिर से जोड़ो तो लकीर रह जाती है; लेकिन नम्र, ईमानदार और दिल से क्षमा मांगने पर रिश्ते नए सांचे में ढ़ल् जाते हैं और वह लकीर गायब हो जाती है।

जब आप रोज किसी प्रिय चीज़ से जुड़ें होते हो तो वह हमारे ज़हन में प्रवेश करने लगती है। खुद के इतने सारे अक्स रोज देखने के बाद जेम्स को आईनों की वजह से खुद से मोहब्बत कुछ ज्यादा ही थी। और कहते हैं ना कि, जिसके पास जो होता है वही बाँटता भी है। कुछ चिढ़चिढ़े लोग वास्तव में अपने अंदर का अवसाद ही बाहर निकालते हैं, इसी तरह जेम्स माता-पिता से भी ज्यादा विनम्र, सौम्य और हर एक से मोहब्बत से मिलने वाला ही रहा।

भारत आजाद हो चुका था और जेम्स किशोरावस्था में पहुंचने की तैयारी में था। सेवा से भरपूर रूडोल्फ और अनुराधा के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण था, कमीश्वरी पर स्थित एकमात्र अस्पताल और रोजाना मरीजों की भारी भीड़... एक तरफ कलकत्ता से फैलता हैजा पूरे देश में फैल गया और चारों और कई मौतें, हजारों लोग बीमार हुए। तमाम सावधानी के बाद भी हैजे ने अनुराधा को भी जकड़ लिया। रूडोल्फ ने जेम्स को डेविड के पास ही छोड़ दिया था ताकि वह सुरक्षित रहे। अकेला रूडोल्फ अनुराधा के साथ-साथ अन्य मरीजों की जान बचाने में लगा रहा। एक दिन साथ छूट गया, रूडोल्फ अकेला रह गया। जेम्स और डेविड तक यह खबर महीने भर बाद ही पहुँची। जेम्स के लिए तो उसकी मां मर जाने के बाद एक माह जीवित रही। अनुराधा और रूडोल्फ ने अपनी अपनी वसीयत लिखवाई थी जिसमें अनुराधा ने मरने के बाद स्वयं को दफनाने और रूडोल्फ ने स्वयं को अग्नि को समर्पित करने की बात कही थी। अनुराधा की कब्र पर जेम्स फूट-फूट कर रोया था। जेम्स बहुत संवेदनशील, उस पर मां के जाने का गहरा प्रभाव पड़ा; इतना कि उसे खामोश कर दिया। वह चुप-चुप रहने लगा। डेविड उसकी चुप्पी से वाकिफ था लेकिन उसे पिता से दूर रखना मजबूरी थी। डेविड उसका और अधिक ख्याल रखने लगा था।

जेम्स और डेविड छह दिनों रोज़ चर्च और मंदिर जाते, प्रार्थना करते लेकिन लगता था उनकी और परीक्षा बाकी है। अनुराधा की कमी को खुद रूडोल्फ अपने आप को दिन रात मरीजों की सेवा में लगाकर दूर करने का असफल प्रयास करता रहा। सेवा के दौरान ही उसे पता चला कि वह टीबी का शिकार हो गया है। उस समय टीबी का कोई खास ईलाज नहीं था, बल्कि मरीज को एकांत में आइसोलेट कर दिया जाता था और सीधे किसी से मिलने की मनाही थी। डेविड और किशोर जेम्स को दूर से ही एक लगभग कैदखाने जैसी जगह से रूडोल्फ को देखना भर हो पाता था। पिता पुत्र के लिए और पुत्र पिता के लिए सशरीर मिलने से रह जाते थे और तीनों की आँखों में सिर्फ आंसू रहते थे। एक दिन रूडोल्फ भी...

वसीयत के मुताबिक उसे श्मशान में अग्नि के समर्पित किया गया। संक्रामक बीमारी होने से परिजनों को छूने भी नहीं दिया गया, न ही शवयात्रा की इजाजत। एक अंग्रेज के अंतिम दर्शन के लिए हजारों का हुजूम जमा था, यह उनकी सेवा और इस मिट्टी से लगाव का परिणाम था। इस बार जेम्स के आंसू ही नहीं निकले, बस टकटकी लगाए एक ओर देखता रहा।

डेविड शायद ही कभी जेम्स को अपने से अलग रखता था। उसने किशोरावस्था में जो खोया तो डेविड ने उसे एक चुनौती के रूप में लेना सिखाया। दोनों में शतरंज की बाजी जमती थी तो प्रारंभ में शिष्य गुरु से हार जाता लेकिन समय के चलते जेम्स खेल ही नहीं जीवन में भी परिपक्व होने लगा। मां और पिता को भूल पाना आसान तो नहीं था लेकिन अक्सर डेविड उससे कहता, "जो जीवन में अच्छा हुआ है उसे याद रखो बस! यही तुम्हारे मां पिता की आत्मा को शांति देगा।"

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किसी कारीगर ने जेम्स से आकर कहा, "दादा, बेटी बीमार है आज आधे दिन की छुट्टी चाहिये..."

जेम्स उससे तुरंत हामी भरता और प्यार से कहता, "अरे भई आए ही क्यों, पहले ईलाज करवा लेते... चलो जाओ और कुछ जरूरत हो तो भी बता देना।"

जेम्स के यहाँ अलादिन सहित तीस-तीस साल पुराने कारीगर हैं जिन्हौने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। किसीने जब उनकी दुकान में आग लगा दी थी तब भी नहीं। आजादी के बाद लगा था कि देश में सहजता, समानता आएगी और जिस जुनून से एक होकर आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, उसी जुनून से आगे बढ़ेंगे; लेकिन जात-पात, धर्म, घुआछूत में उलझने लगे। हिन्दू- मुसलमान तो पहले ही भिड़े बैठे थे वहीं ईसाई मिशनरी भी उसकी ज़द में आ गई। डेविड और जेम्स के लिए यह और विकराल समय था। वे चर्च जाते तो वहाँ उन्हे बोला जाता कि दूसरे धर्म को नहीं अपना सकते। दूसरी तरफ मंदिर जाते तो वहाँ उन्हे दिखावटी समझा जाता और लोग प्रयास करते थे कि उन्हे मंदिर से दूर रखा जाय।

इसी सब के चलते दोनों ने चर्च और मंदिर जाना ही बंद कर दिया। उनका कारखाना जो घर भी था वहीं प्रेयर, पूजा कर लेते। ऐसे ही एक दिन पता चला कि उनके कस्बे में दंगे भड़क गए हैं। डेविड कच्चा माल खरीदने बाहर गए हुए थे और घर पर जेम्स ही था। दंगाईयों ने उनके कारखाने में भी आग लगा दी। जैसे-तैसे जेम्स पड़ौस में 'छेनु नाई' के यहाँ शरणागत हुआ। डेविड जब तक आया तब तक कुछ हिस्सा तबाह हो चुका था। स्थितियॉं संभलती इससे पहले ही डेविड को अटैक आया और वहीं मृत्यु हो गई। अब सिर्फ जेम्स बचा था पूरे घर में।

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आईना भला कब किसी को सच बता पाया है
जब भी देखो दायां तो बायां नज़र आया है।

दोपहर का समय ही रहा होगा अलादिन जेम्स के पास आया और भारी मन से बोला, "सर कुछ रूपए एडवांस मिल जाते तो मेहरबानी होती। रुख़सार और उसका घर वाला दोनों पाकिस्तान जाना चाहते हैं क्योंकि उनका पूरा परिवार वहीं रहता है, निकाह के बाद तो वैसे भी बेटी पराई होती है..."

जेम्स ने कहा, "चाचा आप इतने समय से काम कर रहे हैं, मेरे अंकल के उम्र के हैं, इस तरह आप गिड़गिड़ाईये नहीं... आप जितने चाहें उतने ले लिजिए।"

जेम्स को ना जाने क्यों रुख़सार के जाने का धक्का सा लगा। उसे लगा अब तो हमेशा के लिए उसकी मोहब्बत दूर हो जाएगी। जेम्स ने निकालकर दो हजार रूपए अलादिन के हाथों में रख दिए। अलादिन हक्का -बक्का रह गया, "इतने सारे नहीं चाहिये सर, यह तो आपकी तीन माह की कमाई होगी... और फिर मैं कैसे अतारूँगा यह कर्ज?"

जेम्स ने कहा, "यह कर्ज नहीं, मेरा फर्ज है। आपने इतनी सेवा की, कारखाना खत्म हो गया था तब भी आपने साथ नहीं छोड़ा... रख लिजिए ... रुख़सार के काम आएँगे।"

इस घटना के सात- आठ दिन तक जेम्स को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था, उसे लग रहा था जैसे सब कुछ खो गया... उसके शरीर का कोई हिस्सा अलग हो गया। इसी बीच फिर से दंगे हो गए और अलादिन व अन्य कारिगरों को परिवार सहित जेम्स के यहाँ शरण लेनी पड़ी। पीछे गोडाऊन में सबकी व्यवस्था जेम्स ने की। रूखसार और उसका पति भी इसी में था। यह आपदा का समय था लेकिन जेम्स को पता नहीं क्यों बेहद आंतरिक खुशी थी। उसके लिए यह समय मन से भरा हुआ था, उत्साह से सबकी व्यवस्था वह जमा रहा था। सभी व्यवस्थित होकर सो गए लेकिन जेम्स की आँखों में नींद नहीं थी।

देर रात शोर मचा और दंगाई जेम्स के कारखाने के आसपास आ गए, दरवाजे खोलने के लिए कहने लगे। सभी कामगार भी सहम गए क्योंकि दंगाई उनके दरवाजे खोलने के लिए आवाज लगा रहे थे। दंगाईयों ने दरवाजा तोड़ दिया, हथियार बंद, मशाल, जलाने का द्रव्य लेकर अंदर घुसे और जेम्स भी सामने आ गया... दंगाई में से एक ने पूछा, कौन हो तुम हिन्दु या मुसलमान...एक पल तो सन्नाटा छा गया... लेकिन रुख़सार ने हिम्मत दिखाई और उनके हाव भाव देखकर कहा, "भैया जय राम जी की... हम सब हिन्दु हैं... इतने में दंगाई दहाड़ा, ... झूठ, यहाँ दूसरे धर्म के लोग हैं तुम झूठ बोल रही हो...स्थिति बिगड़ते देख रूखसाना ने कहा...नहीं हम सब तो हिन्दु ही हैं... भगवान की कसम... हाँ यह आदमी ईसाई है...उसका ईशारा जेम्स की ओर था।

दंगाईयों ने सबको डराकर धमकी देते हुए सिर्फ जेम्स को चुपचाप बाहर आने के लिए कहा। वह चुपचाप बाहर आ गया। सभी लोग उनके जाने के बाद रुख़सार पर चिल्ला उठे, तुने अपने मालिक को ही... जिनका नमक खाया...रुख़सार सभी का गुस्सा सहन करते हुए बोली... हम सब मारे जाते... एक गया तो क्या हुआ...

दूसरे दिन पता चला जेम्स की आधी जली लाश चौराहे पर मिली।

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आईना कुछ नहीं नज़र का धोखा हैं,
नज़र वही आता हैं जो दिल में होता हैं।

अलादिन कई दिनों तक सो नहीं पाया। एक रात पता नहीं कैसे आँख लगी। उस ने एक सपना देखा कि वह एक आईना लेकर स्वर्ग पहुंच गया, और वहाँ बड़ा भीड़-भड़क्का है। स्वर्ग बड़ा सजा है और बड़ा जुलूस निकल रहा है, शोभायात्रा! अलादिन भी खड़ा हो गया भीड़ में कि क्या बात है? किसीने कहा, आज भगवान का जन्मदिन है। किसी राहगीर ने कहा, उत्सव मनाया जा रहा है।

अलादिन ने कहा, अच्छे भाग्य मेरे कि ठीक दिन आया स्वर्ग। जुलूस निकलते हैं। निकले रामचंद्र जी धनुष—बाण लिए और लाखों—करोड़ों लोग उनके पीछे। फिर निकले मुहम्मद अपनी तलवार लिए, और लाखों—करोड़ों लोग उनके भी पीछे। और फिर निकले बुद्ध, और फिर निकले महावीर, और जरथुस्त्र, और निकलते गए, निकलते गए और आखिर मे जब सब निकल गए तो एक आदमी एक बूढ़े-से मरियल—से घोड़े पर सवार निकला। जनता भी जा चुकी थी, लोग भी जा चुके थे, उत्सव समाप्त होने के करीब था, आधी रात हो गयी, इस पर अलादिन को इस आदमी को देख कर हंसी आने लगी कि यह भी सज्जन खूब हैं, यह काहे के लिए निकल रहे हैं अब! और इनके पीछे कोई भी नहीं।

अलादिन ने पूछा, "आप कौन हैं और घोड़े पर किसलिए सवार हैं? और यह कैसी शोभायात्रा है, आपके पीछे कोई नहीं!"

उस ने कहा, "मैं क्या करूं... मैं भगवान, अल्लाह जो कह लो वही हूं। कुछ लोग हिंदुओं के साथ हो गए हैं, कुछ बौद्धों के साथ, कुछ ईसाइयों के साथ, कुछ मुसलमानों के साथ, मेरे साथ कोई भी नहीं, मैं अकेला हूं। मेरा जन्मदिन मनाया जा रहा है, तुम्हें मालूम नहीं? आईना लेकर घूमते हो, इतना भी पता नहीं... देख लो मुझको आईना हूँ मैं..."

घबड़ाहट मे अलादिन की नींद खुल गयी थी। कुछ समझ नहीं आया उसे। उस दिन देश में सोलहवाँ गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा था।

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मेरे ऐबों को तलाशना बंद कर दिया है लोगों ने,
मैंने तोहफ़े में उन्हें जब से आईना दे दिया है।
( समाप्त)


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