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जाँच परीक्षा

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जाँच परीक्षा
लेख़क: मो. जमील, अंधराठाढ़ी, मधुबनी (बिहार)


# जाँच परीक्षा

लेख़क: मो. जमील, अंधराठाढ़ी, मधुबनी (बिहार)

रामू: जल्दी-जल्दी स्नान करो, स्कूल नहीं जाना है क्या? देखों मैं नहा धोकर पहले से ही तैयार हो गयी हूँ। आज तो अपने स्कूल में विज्ञान की परीक्षा होने वाली है। सर दो दिन पहले ही बोले थे, 'इस बार कोरोना महामारी के चलते एक भी जाँच परीक्षा नहीं हुई है। अब मैं जाँच परीक्षा लेने वाला हूँ।' तुम में से जो कोई सबसे ज़्यादा अंक लाएगा उसे प्रिंसिपल सर के हाथों से पारितोषिक मिलेगा। और प्रशस्ति पत्र भी मिलने वाला है।

रानी: देखना रामू भाई, इस बार तो पूरे स्कूल में मैं ही टॉप करूंगी। और प्रिंसिपल सर के हाथों से मुझे ही सम्मान मिलेगा।

रानी बोलती जा रही थी। रानी पांचवीं कक्षा में पढ़ती थी। अभी रानी की वय सात साल थी, अपनी कक्षा में पढ़ने में बहुत तेज तर्रार थी। रानी को कई बार स्कूल की ओर से ढेरों पुरस्कार भी मिला था। रानी को स्कूल के सारे अध्यापक बहुत मानते थे। रानी की माँ बोलीं, "मेरा आशीर्वचन तेरे साथ है। मुझे तुम पर पूरा विश्वास है। तुम इस खानदान के नाम को एक दिन हिमालय से सुमेरू तक पहुँचाओगी। जा बेटी तुझे किसी की भी नज़र ना लगे।"

रानी अपनी माँ से बोली, "माँ आज कौन सा दिन है?"

रानी की माँ उधर बर्तन साफ करने चापाकल पर चली गयीं। रानी के पार्श्व में छह साल का रामू था। रामू गुस्से में बोला, "क्यों तुम्हें पता नहीं है कि आज कौन सा दिन है?"

रानी: नहीं-नहीं मेरे भाई, अगर पता होता तो भला मैं क्यों पूछती?

"अच्छा-अच्छा ज्यादा नौटंकी मत करो; वैसे आज शुक्रवार है।"

"ओहो ऐसा करो तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, वैसे तो तुम नाश्ता कर ही लिए होगे?"

रामू वज्रदृष्टि से रानी को देखता है।

रानी: रामू तुम एक बात बताओ, आज तुम बहुत हतोत्साहित लग रहे हो क्यों? और तुम्हारे चेहरे पर सिर्फ गुस्सा ही गुस्सा है। कहीं आज तूम जाँच परीक्षा के भय से स्कूल तो नहीं जाना चाहते हो?

रामू: देखों रानी, मेरी प्यारी बहन तुमको मेरे बारे में सब कुछ पता है। फिर इस तरह के प्रश्न क्यों करते हो मुझे पढ़ाई करने में बिल्कुल भी दिल नहीं लगता है। और मुझे पढ़ाई में आनंद तो बिल्कुल भी नहीं आता। माँ के भय से स्कूल जाता हूँ।

"अगर कहीं स्कूल नहीं गया तो माँ उलटा करके पीटेंगी।"

रामू रानी के कान में चुपके से कहता है, "माँ को बोल देना कि आज रामू को सर्दी जुकाम है और बुखार भी है।"

"ठीक है अगर स्कूल जाने का मन नहीं करता है तो तुम स्कूल बिल्कुल भी ना जाओ। किंतु इस तरह की बहानेबाजी करना बंद करो। मुझे आज तो पहले से ही देर हो गयी है पता नहीं जब से मैं जाँच परीक्षा की टेंशन लिया हूँ ना रात को नींद ही नहीं आती है। इसी वजह से आज देर से सोकर उठी हूँ। अच्छा रामू चलता हूँ, और हाँ सुन रामू, ईश्वर से प्रार्थना जरूर करना..."

"बॉय-बॉय रानी बहन..."

रानी स्कूल चली गयी और इधर ऊधमी रामू धमा-चौकड़ी करने दोस्तों के साथ चला गया। रानी जैसे ही स्कूल पहुँची कि स्कूल में जाँच परीक्षा दस मिनट पहले ही आरंभ हो चुकी थी। रानी की कक्षा के सर मोहन लाल जी, "ये लो कॉपी। एक तो तुम पहले देर कर चुकी हो..."

रानी: सर वो क्या है ना आज आंखें देर से खुलीं। इसलिए आने में देर हो गयी।"

"कोई बात नहीं बेटा, होता है... ये लो प्रश्न और कॉपी; अपनी सीट पर जाकर बैठो।

रानी अपनी सीट पर बैठकर कॉपी लिखने लगी और कक्षा में प्रथमतः कॉपी लिखकर सर को सौंप दी, "सर ये लीजिए कॉपी..."

मोहन लाल जी: अरे वाह बेटा, तुम तो पहले ही दे दी कॉपी।

जाँच परीक्षा समाप्त हुई, सभी बच्चे अपने अपने घर चले गए। और रानी भी अपने घर आ गयी।

रानी: माँ आज सिर में बहुत दर्द कर रहा है।

रानी की माँ बोलीं, "अभी स्कूल से आई हो इसलिए कदाचित तुम्हारे सिर में दर्द कर रहा होगा। ऐसा करो पहले तुम आराम करो।

रानी अपने शयनकक्ष में आराम करने चली गयी। और इधर धमा-चौकड़ी करके रामू भी आया। रामू रानी से बोला, "रानी बहन, तुम्हारी जाँच परीक्षा कैसी गयी?"

रानी बोली, "अबे एक तो सिर में पहले से ही दर्द कर रहा है... और तू ऊपर से माथा क्यों खा रहा है? अभी आराम करने दो फिर बताती हूँ कि कैसी गयी परीक्षा।

"ठीक है... पहले आराम करो फिर बताना... मेरा क्या है। मैं इसलिए पूछ रहा हूँ कि पिछली बार स्कूल में सम्मान समारोह नहीं हुआ था तो स्कूल की ओर से निमंत्रण कार्ड मिला था। उस सम्मान समारोह में बहुत आनंद आया था। क्योंकि स्कूल में तुम प्रथम स्थान प्राप्त की थी... चलो तुम्हें आराम की जरूरत है।"

रानी खटिया पर सो गयी। क्योंकि रानी जाँच परीक्षा को लेकर अहर्निश पढ़ाई करती थी। रविवार को जाँच परीक्षा का रिजल्ट भी आने वाला था। सभी बच्चों के चेहरे पर वो अद्भुत मुस्कान थी और सभी की जुबान पर एक ही बात थी कि मैं प्रथम स्थान लाऊँगा मैं...

और रविवार की सुबह रानी अपने बिस्तर से उठी मुंह हाथ धोया और नाश्ता किया। अपनी माँ को बोली, "माँ आज स्कूल में रिजल्ट भी आने वाला है। सभी बच्चे अपने अपने अभिभावकों के साथ आएंगे। आप भी चल रही हैं ना?"

रानी की माँ बोलीं, "अरे रानी बेटी, कैसी बातें कर रही हो? मैं क्यों नहीं जाऊँगी? तुम्हारे साथ चल रही हूँ।"

रामू, रानी की माँ ओर रानी, सभी तैयार होकर स्कूल की ओर रवाना हुए। इधर स्कूल में सारे बच्चे पहले से ही इकट्ठे थे। रामू, रानी की माँ ओर रानी सभी अपने स्थान ग्रहण किए। 'पब्लिक स्कूल' के प्रिंसिपल दिनेश चौपाल जी इधर बोलने जा रहे थे कि आपलोगों का खुले दिल से स्वागत करता हूँ। आपलोगों को तो पता ही है कि इस स्कूल में प्रतिवर्ष एक सम्मान समारोह होता है। जैसा कि आपलोग बखूबी जानते हैं कि इस बार देर से ये सम्मान समारोह हुआ है कोरोना महामारी के चलते। और इस सम्मान समारोह में स्कूल के उदीयमान बच्चों को पुरस्कृत किया जाता है। हमारे स्कूल की एक ही छात्रा उदीयमान की फेहरिस्त में आती है। किंतु रोमांचक बात यह कि क्या इस बार भी रानी ही पुरस्कृत होगी। लगातार दो बार रानी ने बाजी मारी है। मगर दिनेश चौपाल जी मोहन जी से बोले कि सभी को बताइए इस बार प्रथम स्थान कौन प्राप्त किया।

मोहन जी मंच पर आकर बोले कि तीसरे स्थान चुन्नू रजोरी ने प्राप्त किया। दूसरे स्थान सुमैना कुमारी और पहले स्थान प्राप्त करने वाली छात्रा रानी कुमारी है।

जैसे ही रानी के कान में आवाज़ पहुँची कि इस बार भी प्रथम स्थान रानी ही प्राप्त की है। रानी के चेहरे पर मुस्कान और रानी खुशी से उछली। रानी को मंच पर आने के लिए बोला गया। 'पब्लिक स्कूल' के प्रिंसिपल दिनेश चौपाल जी बोले, "आओ रानी, मंच पर आकर कुछ बोलों।"

रानी मंच पर गयी, "...और प्रथमतः सभी छोटे बड़ों को मेरा प्यार भरा नमस्कार। मैं रानी कुमारी, मेरी उम्र सात साल और मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ती हूँ। तो दोस्तों, आपलोगों के समक्ष कुछ बातें रखना चाहती हूँ। ...कि हम अभी बच्चे हैं। बच्चों को मोबाइल, संगणक से विमुख रहना चाहिए। मैं भी आपलोगों की तरह एक इंसान हूँ। किंतु मैं सबसे ज़्यादा समय अपनी पढ़ाई पर देती हूँ, खेलकूद पर नहीं। बात सही है कि पढ़ाई के साथ-साथ जीवन में खेलकूद भी उतना ही जरूरी जितनी पढ़ाई। ...नहीं दोस्तों सबसे पहले हमें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। अगर सत्यनिष्ठा के साथ दिल लगाकर पढ़ाई करोगे तो सफलता आपके कदम अवश्य चूमेगी। सफलतम व्यक्ति के पास भी चौबीस घंटा ही होता है। छत्तीस घंटा नहीं। लेकिन सफलतम व्यक्ति अपने जीवन में समय का सदुपयोग करता है, इसलिए कृतार्थ होता है। अगर हम सब भी अपने जीवन में समय का सदुपयोग करेंगे तो हम सब भी कृतार्थ हो सकते हैं। यही पर मैं अपनी बात खत्म करती हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद।"

रानी की बातें जैसे ही संपन्न हुईं। दिनेश चौपाल जी, "अब बारी है तुम्हें सम्मानित करने की। मुझे अत्यंत हर्षानुभूति हो रही है कि किसी उदीयमान छात्रा को सम्मानित कर रहा हूँ। ... आपके अभिभावक नहीं आए हैं क्या?

रानी बोली, "सर मेरी माँ आयी हैं।"

"अरे रानी, उन्हें भी मंच पर बुलाओ..."

रानी की माँ मंच पर आयीं; और दिनेश चौपाल जी रानी को एक मेडल, पचीस हज़ार का चेक दिया और प्रशस्ति पत्र भी। सभी लोग अपने बच्चों से बोले कि, सीखो रानी से कुछ; और सभी लोग जोर-जोर से ताली बजाने लगे। करतल-ध्वनि से 'पब्लिक स्कूल' के पूरे प्रांगण गूंज उठा।
( समाप्त)


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