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एक और चाँद

Hindi Short Story

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एक और चाँद
लेकिका: नवनीता कुमारी (डेंटिस्ट ), बेतिया, पं.चंपारण, बिहार


# एक और चाँद

लेकिका: नवनीता कुमारी (डेंटिस्ट ), बेतिया, पं.चंपारण, बिहार

अगर मीता को अपने फूल से कोमल तथा मनजीत के अमानत का वास्ता न होता तो कोई भी रोड़ा उसकी जिंदगी का रास्ता यूँ न उसे इस दुनिया से कूच करने से रोक पाता, और वह इस दुनिया से कब का कूच कर गई होती। वह मनजीत की मौत से बिल्कुल टूट चुकी थी। अगर उसका इस दुनिया में मन बहलाने वाला था तो उसका अनमोल खिलौना, उसका प्यारा सा नन्हा बच्चा। मीता ऐसी को ऐसी अनुभूति हो रही थी मानो बगिया का माली अपनी बगिया में एक खुबसूरत फूल खिलाकर किसी को सुर्पुद कर स्वयं मुक्त होकर दूसरो को बंधन में बाँध गया हो। वर्षो से बड़ी मुद्दत से जिस फूल की कल्पना मात्र से ही वह रोमांचित हो उठती थी। उसे क्या पता था कि उस फूल के खिलने से पहले ही उस फूल का द्रष्टा ही मुरझा जाएगा। उस फूल की आँखें खुलने से पहले उसके शुभेच्छु की आँखें सदा के लिए बंद हो जाएगी। अब उसकी जिंदगी पुरानी दस्तावेज बन चुकी है। उस पर धूल की मोटी परत जम अवश्य गई, लेकिन उसके अंदर छुपी हुई खामोशी एवं तमाम दुःख विषाद उसके अतीत के पुख्ता -प्रमाण थे। उसकी जिंदगी उस दवात की भाँति बन चुका था जिसमे स्याही तो थी परंतु उसकी अहमियत साबित करने वाले कलम की कमी थी। उसका चाँद सा सलोना चेहरा श्रीहीन हो गया था एवं उसका तेजहीन चेहरा सफेद लिबास में लिपटा उसकी लाचारी को व्यक्त करने के लिए काफी था। जब उसका इस कटु सत्य से साक्षात्कार हुआ तो वह औंधे मुँह गिर पड़ी, वह विधवा बन चुकी थी, उसकी इच्छाएँ मर चुकी थी, जो कि एक आम विधवा के साथ होता है।
'होईहें वही जो राम रचि राखा,
होनी से पहले भला होनी को लाखा।

मीता की सूनी माँगे, आँखों में आँसूओ का सैलाब बिन बोले सब कुछ बयां कर देती थी। उसकी सूनी कलाईयाँ ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे खनकती चुड़ियो के बजाय हथकड़ियाँ भी पहनने को तरस रही थी, जो कि उसकी बेबसी का प्रतीक था। उसका गहना अगर था, तो वह था उसका पाँच वर्षीय बेटा अखिल। अगर उसमें कुछ सजाने की ललक थी तो वह उसका बेटा अखिल का उज्जवल भविष्य। वह उसी के लिए तो जी रही थी। हजारो तारो के बीच रहकर चाँद अपने को अकेला पाता है, लेकिन जब वह स्वयं चाँदनी को निमंत्रण भेजता है तो चाँदनी शै अपना मन मोर किये हुए चकोरी की भाँति दौड़ी आती है, मगर वह चाँद को सहारा दूर रहकर देती है, फिर मीता का सहारा तो उसके पास था, अखिल; जो उसके बुढ़ापे का बैशाखी बन सके।

मीता का अतीत उसके वर्तमान की अपेक्षाकृत मनभावन था, युवा दिलों में अरमानों एवं उमंगो की छलांगे भरने सदृश थी। अतीत काश्मीर की हर शै से भी खूबसूरत था। उसकी खूबसूरती, उसका तराशा बदन, तीखे नयन-नक्शों वाली का मुकाबला संगमरमर-सा दमकते हुए था, जिसका बखान करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा था। इतिहास साक्षी है कि एक जमाने में बड़े-बड़े बादशाह भी खींचे चले आते थे खूबसूरती की वादियों में। इसकी एक झलक पाने की ललक बादशाहों के मन के प्यास बढ़ा देती थी, और शांति तबतक नहीं मिलती जबतक कि वे फलो का बगीचा, जो कि तंदुरस्ती की प्रहरी और शीतल बयार उनके मन को ठंढ़क न पहुँचा दें। वे इन प्रकृति के हाथो से सजे हर पर्वतमालाओं की ओर से आने वाली भीनी-भीनी खुश्बू उन्हें मदहोश कर अपने को हिन्दुस्तानी होने की गौरव से उद्बोधित कर देती। भारत की मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक अचानक स्मृति-पटल पर छा जाती और तन-मन में वफा की लौ जला जाती और जो मशाल बन जलकर काश्मीर की रक्षा के लिए ढ़ाल बनने के लिए उत्प्रेरित करती। हर बंदा सर पर कफन बाँध यह कसमें लेता, "ये काश्मीर हमारा है, यह हमारे जान से प्यारा है।"

काश्मीर की रंगीन घटाओ में एक घटा -सी चंचल हसीन घटा मीता भी थी। इस काश्मीरी बाला का तो कहना ही क्या! सूरज -सी तेज लिए चाँदनी -सी शीतलता एवं दूध से नहायी हुई कोमलांगी, गालो पर सेब की लाली लिए हुए अनुपम अदा का तो कहना ही क्या? उसके अधरों पर मुस्कान सभी फूलों में जान डाल देती थी। कलियाँ झूम उठती ऐसा प्रतीत होता था मानो खुबसूरती ही खुबसूरती को पनाह दे रही हो।

मीता का रिश्ता उसके पिता एक ऐसे घर में तय कर आए जहाँ का वैभव देखते ही बनता था। मीता का रिश्ता फौजी नौजवान से तय कर आए। वह लड़का कोई और नहीं था, बल्कि वो वही लड़का था जिससे मीता की पहली मुलाकात काश्मीर की खुबसूरत वादियों में प्रीतिभोज के दौरान हुई थी। लेकिन मीता को क्या पता था कि चन्द लम्हों का साथी पूरी जिन्दगी का हमराह, हमसफर और रूहेसफर बनेगा। इस रिश्ते को लेकर मीता की माँ ने असहमति जतायी क्योकि वह लड़का फौजी कप्तान था और वह अपनी बेटी की शादी ऐसे घर में नहीं करना चाहती जहाँ उसकी बेटी का सुहाग हमेशा खतरे के साये में रहे। जब मीता के पिता ने अपनी पत्नी को समझाया कि जीवन-मरण तो इस दुनिया का विधान है। जो आया है उसे एक दिन जाना ही है, लेकिन यह सोचकर अपने दैनिक -क्रियाकलापो को ठप कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है? जब यह बात मीता की माँ के हलक उतरी तो थोड़ी-सी ना-नुकूर के बाद वह भी इस रिश्ते के लिए राजी हो गई।

बड़े धूमधाम से मीता और मनजीत परिणय-सूत्र में बँध गए। काश्मीर की कली बाबुल की गली छोड़ अपने पिया संग चली। मीता अपने पिता के घर से विदा होकर अपनी गृहस्थी बसा ली। बड़े खुशियों के पल गुजर रहे थे। लेकिन इस सोने की लंका में न जाने किसकी नजर लगी। अचानक डिपार्टमेंट की ओर से मैसेज आया कि बॉडर पर मनजीत डयूटी ज्वाईन कर ले। उसका बॉडर पर पहुँचना बहुत जरूरी था। इधर मीता की कोख में फूल -सा बच्चा पल रहा था। अब मनजीत को समझौता करना था कि वह किसको चुने। आखिरकार जीत आजादी के परवाने की ही हुई। उस समय पुत्रमोह भी आजादी के रंग के सामने फीका पड़ गया। अजीब कसमकस की स्थिती पैदा हो गई थी। यह ऐसा पावन मलयागंधो से उद्बोधित समय था जिसे मनजीत खोना नहीं चाहता था। उसके आँखो के सामने सिर्फ एक ही चेहरा उभर रहा था, वह था भारत माता के पैरो में पायलो की झनकार की जगह गुलामी की जंजीरों से लदी खनक ही सुनाई पड़ रही थी तथा न्याय की गुहार लगाती भारत माता का बेबस एवं लाचार चेहरा।

मनजीत चल पड़ा, बसंती चोला पहने सरफरोशी की तमन्ना आज हमारे दिल में है; देखना है जोर कितना बाजुएँ कातिल में है... मदहोशी का धुन गुनगुनाता हुआ आजादी का मशाल जलाने। इधर मीता के लिए एक -एक पल पहाड़ की भांति गुजर रहे थे, विरह की अग्नि में तप रही थी। आखिरकार इंतजार की घड़ी समाप्त हुई। लेकिन हाय! ये कैसा क्रूर मजाक इस नवविवाहिता के साथ!! विधाता को भी तरस नहीं आई ऐसा जुल्मों सितम ढ़ाते हुए। उस पत्थर को भी पिघला नहीं पाई, वो हृदय विदारक चीखे भी उसे ऐसा जुल्म ढ़ाने से रोक नहीं सकी। इंतजार की घड़ी समाप्त हो गई। जो आस था वह भी निराश कर गया। बुरी तरह से टूट गई मीता। मुश्किल से छह महीने बीते थे कि यह हादसा उसे बुरी तरह झकझोर गया। उस समय मीता पर क्या गुजर रही होगी इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। मनजीत की मौत मीता के लिए एक तरह का खौफ ही था। वह मरना चाहे तो भी वह मर नहीं सकती थी, क्योकि जाते -जाते मनजीत एक अजीब बंधन में बाँध गया था जिससे वह छूट नहीं पा रही थी। एक वर्ष बीत गए इस हादसे के हुए और मीता को वैधव जीवन व्यतीत करते हुए। अब उसकी गोद में एक फूल -सा बच्चा था जिसकी परिवरिश वह बड़े लगन से कर रही थी। वह अपने बच्चे के नामकरण के पश्चात उसका नाम दिया 'अखिल '। वह अखिल को पढ़ा -लिखाकर डॉक्टर बनाना चाहती थी। लेकिन अखिल अपने शहीद पिता के अधूरे अरमानो को पूरा करना चाहता था तथा वह पिता के नक्शेकदम पर चल पड़ा। वह कमांडो की तैयारी में जुट गया। वह बड़ी लगन के साथ अपने लक्ष्य को सपना बनाकर कोशिश करने लगा। इस बात की भनक तक उसकी माँ को नहीं लगी। इस बात का पता तब लगा जब डाकिया ने ज्वाइनिंग लेटर मीता को दी। जब मीता ज्वाइनिंग लेटर को पढ़ती है तो उस पर वज्रपात हो जाता है। वह खुश होने के बजाय अत्यंत दुःखित हो जाती है। उसके पैर तले जमीन खिसकने लगती है। उसके गुलाबी चेहरे का रंग नीला स्याही हो जाता है। उसके आँखो के सामने वही कालच्रक एक -एक कर घूमने लगा और वह वहीं बेहोश हो गई। अखिल अपनी माँ को बेहोश पड़ा देखकर हतप्रभ रह गई। वह अचानक किसी अनहोनी की आशंका से भीतर तक काँप उठा। वह सकते में आ गया। वह तेजी से उठा और पानी की छींटे अपनी माँ के चेहरे पर मारा। पानी के छींटो से मीता को होश आया। होश आते ही मीता अखिल पर विफर पड़ी। वह उस ज्वाइनिंग लेटर को फाड़ देनी चाही कि तभी अखिल उस ज्वाइनिंग लेटर को अपनी माँ के हाथ से छीन लिया। मीता उस पर बरसती हुई बोली, "मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि तुम्हें कमांडो में नौकरी मिल गई है, बल्कि दुःख तो इस बात का है कि तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं रहा। तुमने मेरे विश्वास की डोर को तोड़ा है।"

मीता की आँखो से आँसू मोतियो की भांति झड़ पड़े। अखिल अपने -आपको संभालते हुए बोला, "माँ! मैं कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहता जिससे तुम्हारे दिल को ठेस पहुँचे, लेकिन तुम तो एक माँ हो; तो फिर तुम एक दूसरी माँ को गुलामी की जंजीरों में जकड़ा कैसे देखना पसंद करोगी। तुम तो आज मुझ पर विफरकर अपनी मातृत्व को प्रकट कर रही हो, लेकिन वह माँ जो सदियों से खामोश रहकर स्वयं गुमनामी के अँधेरों में रहकर मुझे अपना लहू पिलाती आई है, उससे मैं अपनी ऐशो-आराम के लिए उससे वेवफाई करूँ क्या यह उचित है? तुमने तो मुझे अपना सिर्फ दूध पिलाया है; उसने तो मुझे अपना लहू पिलाया है। मेरे लिए वह न जाने कितनी अग्नि परिक्षाओं से गुजरी हैं, इसका अंदाजा है तुम्हें? मैं तुम्हारी जज्बातों की कद्र करता हूँ, लेकिन जिस तरह तुम मुझसे आस लगाए बैठी हो उसी प्रकार भारत माँ का भी हक बनता है कि वह सदियों संघर्ष के बदले अपने बेटों से कुछ अपेक्षा करें। और फिर अगर मैं अपने खून का एक -एक कतरा भी उसके लिए बहा दूँ तो भी मैं उसके अहसानों के तले दबा ही रहूँगा। जिसने अपने बेटे के लिए सारे दुःख -दर्द तथा गमों को सहती आई उसे एक बेटा होने के नाते क्या मेरा भी फर्ज नहीं बनता कि उसकी थोड़ी -सी सेवा करूँ। तुमने तो मुझे सिर्फ नौ महीने अपनी कोख में रखा, लेकिन वह न जाने कितने अरबों वर्षो से हमें शरण देती आईं..."

मीता को ऐसा लग रहा था कि उसके पिता ने जो बाते उसकी माँ को उसकी शादी तय करने के समय समझाया था, वही पुःन दोहराया जा रहा है। मीता की आँखें डबडबा आई। वह अपराध बोध की भांति बोली, "बेटा! मुझे माफ कर दो। मैं पुत्रमोह में फँस गई थी। मुझसे कितना भारी गलती होने जा रहा था इसका शायद मुझे अंदाजा भी न था। मैं एक माँ होकर भी एक माँ की पीड़ा को नहीं समझ पाई। मेरे आँखों पर जो आजतक पुत्रमोह की पट्टी बंधी थी उसे तुमने खोल दिया। मैं एक चाँद से पति को तो खो दी थी। लेकिन 'एक और चाँद' को खोना नहीं चाहती थी। मैं कितनी नासमझ थी कि एक छोटी -सी बात को नहीं समझ पाई। इसी डर ने मुझे इतना कमजोर बना दिया था। मुझे तो फक्र है कि मेरे पति देश की सेवा के लिए शहीद हुए थे और 'मेरा एक और चाँद' इसी पगतल के सहारे नभतल छूने की तमन्ना रखता है।" तभी किसी रेडियो पर किसी कवि की कविता का धुन बजता है,
"भरा नहीं भावों से जो बहती जिसमें रसधार नहीं, हृदय नहीं वह पत्थर है; जिसमे स्वदेश के प्रति प्यार नही..."

मीता इस धुन को सुनकर सुकून भरी सांस लेती है। वर्षो खोयी मुस्कान उसके चेहरे पर तैर जाती है और उसका चेहरा फूल-सा दमक उठता है और वह कह उठती है, "मैं देशभक्त भगत की माँ नहीं, लेकिन एक देशप्रेमी की माँ अवश्य हूँ।"

अखिल मीता का पाँव छूकर आर्शीवाद लिया और राहतभरी निगाहों से अपनी माँ को देखकर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। सचमुच उसका एक चाँद दूसरों के लिए प्रकाश की झिलमिल आस बनकर झिलमिलाता रहेगा।
( समाप्त )


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