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उड़ान

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उड़ान
Writer: Rafique shah, khanpur, New Delhi


# उड़ान

Writer: Rafique shah, khanpur, New Delhi

अंधेरे और धुंध में लिपटी तेज तर्रार नदी बह रही थी,
समुद्र से मिलने की उतावली में, राह के पत्थरों को उलटती पलटती
झागों का ताज पहने प्राणवान और सनातन,
चट्टानी बाधाओं को काटती और रास्ते के सभी वनस्पतियों को अमृत बाटती जीवो को पानी,
और खाली कुओ को विचारों से भर देती,
अपना ज्ञान निरंतर बांटते हुए नवीन पुष्प खिलाती हुई बस बहे जा रही थी।
उसी के किनारे एक केकड़ा सूर्य की किरणों में नहा रहा था।
सबसे ऊंचे पत्थर पर बैठे जहां से नदी बहत नीचे गहराइयों में गिर रही थी या मिल रही थी या मिलन था उसका
वहां मिलन का सुख निहार रहा था,
बहुत ही खूबसूरत दृश्य है,
वहां से समुद्र की गहराइयां क्या नापी जा सकती हैं?
नदी को आता देख और समुद्र को रुका देख, दोनों का मिलन देख वहां अचंभित और चकित था
हालांकि वहां यह रोज देखता था और हर बार यही सब सोचता था,
खैर इसी बीच जब केकड़ा अपने विचारों में गुम था तभी अचानक,
एक बगुला जिसके पंख खून से रंगे थे
उसके सीने में एक घाव था, आकाश से गिरकर वहां उस पत्थर पर गिरा जहां पर केकड़ा विचार मग्न था,
धरती से टकराने की वजह से उसके मुंह से एक चीख निकली और वहां पत्थर पर पड़ा जीवन से निराश अपने पंख फटकने लगा।
केकड़ा डरकर तेजी से भागा लेकिन शीघ्र ही उसने देख लिया कि पक्षी मौत के किनारे पहुंच चुका है और वहां एक आध मिनट में ठंडा हो जाएगा
सो वहां उस घायल पक्षी के पास लौट आया और ताने कसते हुए उसके कान में कहा-
"क्या तुम्हारे प्राण पखेरू उड़ने वाले हैं?"

"क्या मेरे प्राण पखेरू उड़ने वाले हैं?" गहरी सांस भरते हुए बगुले ने कहा, "ओह 'उड़ान...' मैंने क्या खूब उड़ानें भरी हैं... क्या खूब जीवन जिया है... आसमान की ऊंचाइयों मैंने नापी है...मैंने सुख का उपभोग किया है तुम धरती के कीड़े कभी भी आकाश की उस तरह से सेर नहीं कर सकते जैसे कि मैंने की है..."

"आकाश वहां क्या है?
निरा शून्य, किस काम का है तुम्हारा आकाश?
क्या मैं आकाश में चल सकता हूँ?
क्या मैं आकाश में तेर सकता हूँ?
उससे तो यह किनारे कहीं अच्छे हैं, जहां गर्माहट भी है और शीतलता भी।" इस प्रकार केकड़े ने बगुले से कहा और मन-ही मन सोचने लगा, क्या फर्क पड़ता है इससे की अगर कोई चलता है या उड़ता है अंत तो सबका एक ही होना है, सबको इसी धरती पर मरना है, उसकी धूल में ही वापस लौट जाना है।

एकाएक बगुले ने अपना सर उठाया और आकाश को निहारने लगा, बगुले ने अपनी समूची शक्ति बटोरी और शोक तथा आकांक्षा से चिल्ला उठा-
"ओह, आकाश में वहां उड़ान अगर मैं एक बार और उड़ सकता
अपने साथियों को पीछे करता और खुद आकाश में गोते लगाता
अपने शिकार को पकड़कर दबोच लेता अपने सीने में दबा कर उसका सर कुचल डालता
अपने रक्त की गर्मी से उसका दम घोट देता
ओह, संघर्ष, का वहां सुख।"

केकड़े ने सोचा अगर आकाश में रहना वास्तव में इतना उत्तम ना होता तो बगुले के हृदय से कभी इतनी वेदना पूर्ण चिख ना निकलती। उस चीख की वजह से केकड़े के हृदय में स्नेह का भाव जागा और उसने बगुले से कहा रेंग कर चोटी के किनारे पर आ जाओ, और लुढ़क कर नीचे गिर पडो शायद तुम्हारे पंख अब भी काम दे जाएं, शायद हवा पंखोका साथ दे दे और फिर तुम आकाश में उड़ने लगो हमेशा की तरह।

यहां सुनकर बुगले का बदन खुशी से थरथरा उठा। उसके मुंह से गर्व भरी हुंकार निकली और वह वहां रेंग कर पत्थर के किनारे आ गया मिट्टी और काई की फिस्लन दार परत का सहारा लेते हए; कगार पर पहुंच कर उसने अपने प्रशस्त पंख फैला दिए, गहरी सांस फेफड़ों में भरी और अपनी आंखों में एक चमक छोड़ शून्य में कूद गया। और बगुला पत्थर की भांति तेज गति से गिर चला। गति इतनी तेज थी कि उसके पंख टूट-टूट कर बिखरने लगे। एक लहर ने उसे लपक लिया, उसका रक्त धोकर साफ किया। झागो ने उसे लपेटा और नदी उसे बहा ले गई। पक्षी चला गया समुद्र के व्यापक विस्तार में ओझल हो गया।

केकड़ा बहुत देर तक उसी जगह पढ़ा हुआ सोचता रहा पक्षी की मौत के बारे में, आकाश के प्रति उसके प्रेम के बारे में। वज वहां पड़ा रहा और सोचता रहा। और उसने शून्य में आंख जमा दी, जहां सपने जन्म लेते हैं और बेचैन हृदय को दिलासा देते हैं, क्या खूबी देखी उस अभागे बगुले ने इस शून्य में, इस अंतहीन आकाश में? ऊंची उड़ान भरने की अपनी आकांक्षा से यह पक्षी दूसरों की शांति में क्यों खलल डालते हैं? आकाश में ऐसा क्या भेद है जिस पर पक्षी इतना गर्व करते हैं? एक ही उड़ान में चाहे वह कितनी ही संक्षिप्त क्यों ना हो, मैं सारा भेद मालूम कर लूंगा...

और इस प्रकार बोल कर वह शून्य में उछला और सूर्य की किरणों में नहाता हुआ उड़ चला। लेकिन जो धरती पर चलने के लिए जनमें है वह कभी उड़ नहीं सकते। केकड़ा उछला और नीचे चट्टानों में गिर गया लेकिन गिर कर वहां मरा नहीं वहां हंसा और हंस कर बोला, तो यही है उड़ने का सुख? गिरने का सुख? मूर्ख पक्षी!!

हास्यास्पद पक्षी, तम्हारे शब्द मझे फिर कभी धोखा नहीं दे सकते... अब मुझे सारा भेद मालूम चल गया है। मैंने आकाश को देख लिया। मैं उड़ा, मैंने उसकी सेर की और प्रकाश के बीच से ही में गिरा। हालांकि में गिर कर मरा नहीं, अपने में मेरा विश्वास और भी दृढ़ हो गया है कि वह अपने भर्मो में डूबे रहे, वह जो धरती को प्यार नहीं करते। मैंने सत्य का पता लगा लिया है, पक्षियों की ललकार अब कभी मुझ पर असर नहीं करेगी। इस धरती से मैं जन्मा हूँ, इस धरती का मैं हूँ।

इस प्रकार बोलकर वहां एक पत्थर पर गर्व से अपने पैरों को फैलाए सूर्य की सुनहरी किरणों में नहाने लगा।
( समाप्त )


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