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प्रथम प्रणय की पहली बारिश

Hindi Short Story

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प्रथम प्रणय की पहली बारिश
Writer: Indu Singha, Indor, M.P


# प्रथम प्रणय की पहली बारिश

Writer: Indu Singha, Indor, M.P

आज सुबह से ही दिल बड़ी जोर से धड़क रहा था, ना जाने क्यूँ? रह-रह कर तुम्हारा चेहरा मेरी नज़रों के सामने आ जाता था और मेरे हाथ तेजी से घर का काम पूरा करने में लगे हुये थे। ऐसा महसूस हो रहा था कि ना जाने किस पल तुम आ जाओ फिर जब मैं दरवाजा खोलने जाऊँ तो मेरी अस्त-व्यस्त दशा में मेरी कोई बात तुम्हें बुरी ना लग जाये और तुम कहीं मुझसे नाराज हो गये तो? नहीं-नहीं बिल्कुल नहीं, तुम्हें नाराज नहीं करना है। बचपन से जिस चेहरे की तलाश थी मुझे, आज इस मोड़ पर तो सामने आया है। फिर उसकी नाराजगी? न-न, तुम्हारी नाराज़गी की कल्पना से ही मेरा दिल काँप जाता है। मैं तुम्हें अपने से नाराज तो कभी देख ही नहीं सकती। तुम अगर मुझसे रूठ गये तो मैं क्या तुम्हें मना पाऊंगी? इसलिये मैं तो तुम्हारे नाराज होने की बात भी ख्यालों में कभी नहीं लाती। क्या करूँ मन है कि वही सोचता है जो उसके रोम-रोम में बस जाये।

आज सुबह जब चार बजे उठी तो मन पढ़ने में भी नहीं लगा। किताब के हर पेज पर तुम्हारा मुस्कराता हुआ चेहरा झाँकने लगता था। ऐसा लगता था, तुम अभी-अभी बोलने ही वाले हो -'हैलो, कैसी हो?' और फिर वहीं दिल का जोर से धड़क उठना। एक अजीब सी घबराहट हावी हो जाती थी जब तुम मुझे देखते थे। ऐसा लगता था मैं किसी मोम की भाँति पिघल रही हूँ। सच! क्या इसी को प्रेम कहते है? नहीं-नहीं, शायद नहीं? लेकिन फिर मैं क्या करूं? कैसे सामना करूँ उन पलों का जब तुम मेरे सामने हो और मुझे कुछ कहना हो।

अचानक तेज गंध सी आयी। ओ-भगवान!! ये तो जलने की बू है; मैं तेजी से किचन की तरफ दौड़ी। चाय का पतीला पूरा काला पड़ चुका था और उसमें से धुंआ निकल रहा था। याद आया मैंने चाय रखी थी बनने को, पर तुम्हारे ख्याल, सच हर कहीं सामने आ जाते हैं।

जुलाई का महीना था, लगता है रात में तेज बारिश हुई है। मैंने सोचा छत पर थोड़ी देर टहल लिया जाये। फिर कुछ समय बाद फ्रेश मूड से पढ़ने का कोशिश की जाये। ये सोचकर मैं छत पर चली गयी। पूरी छत पर मेरे अलावा काई नहीं था। पूरा अपार्टमेंट नींद की आगोश में था। ये सब जल्दी क्यों नहीं उठ जाते? फिर याद आया रविवार था, सण्डे को देर से बिस्तर छोड़ना पंसद करते हैं लोग। अपाटमट के पीछे दूर तक घने वृक्षों की कतारें तथा हरियाली थी। बारिश की बूंदें वृक्षों के पत्तों पर ठहरी हुई थीं। किसी वृक्ष पर नन्हीं-नन्हीं रंगीन जंगली चिड़िया बैठी थी, तो कहीं किसी वृक्ष की डाली पर कोई तोता चुपचाप बैठा था। मानो प्रकृति के इस सुन्दर रुप का मन ही मन आनंद ले रहा हो। पक्षी कीतना अधिक प्रकति के नजदीक होते हैं। हवाओं की ठण्डक हम मनुष्य तो अहसास करते हैं और पक्षी तो उन ठंडी हवाओं के मध्य से गुजर कर उसे अंतर में उतार लेते हैं। कितना सुकून मिलता होगा उन्हें प्रकृति की गोद में।

'सुकून' मुझे कब मिला था? ये क्या? वहाँ दूर हरे घने वृक्षों की शाखों के पीछे से ऐसा लगा तुम्हारा चेहरा मुस्कराया हो धीरे से। मुझे देखकर तुम वापत उसी वृक्ष की घनी शाखों के पीछे छिप गये हो। हरियाली और खामोश पेडों की गहरी चुप्पी ऐसी लग रही थी कि कोई मुनि, साधु गहरे ध्यान में खोया हुआ हो। कभी-कभी खामोश रहकर भी खामोशी को कहीं भीतर तक उतारना अपने आप में एक अलग ही सुकून देता है जिसे कि शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। तभी हल्की सी फुहार शुरु हो गयी। धीमी-धीमी मैंने सामने घने वृक्ष पर बैठे तोते को देखा तो पाया उसे रिमझिम फुहारों से कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। वो वैसा ही तटस्थ बैठा था या फिर भीगने का आनंद उठा रहा था। तोता बेहद स्वस्थ व चमकीला था। मन कर रहा था उस तोते को पकडकर उसके शरीर पर से वर्षा की बूंदों को साफ करके धीमे से उसे चूम लूं, पर ऐसा नहीं हो पायेगा, हमारे बीच बहुत फासला है। वृक्ष दूर भी है, ऊँचा घना भी; सिर्फ ख्याल था खूबसूरत सा।

मुझे याद आयी तीन दिन पहले कॉलेज की वो शाम जब इन्हीं रिमझिम फुहारों ने मुझे रोक लिया था। सुबह से ही तेज धूप और खुले मौसम के कारण मैं छतरी लेकर कॉलेज नहीं गयी लेकिन दोपहर के बाद से ही आसमान पर बादलों का साँवलापन अधिक गहराने लगा था। मेरा हिन्दी का पीरियड खत्म होते-होते बूंदाबांदी शुरु हो गयी। मैं अन्य गर्ल्स के साथ लायब्रेरी के बाहर ही खड़ी हो गयी। क्योंकि लायब्रेरी का दरवाजा सड़क पर ही खुलता था जहाँ से कोई दिख जाये तो घर पहुंचू। इतने में तुम कार पार्किंग से अपनी कार निकलते हुए दिखे। अचानक कार को मोड़ते हुए तुम्हारी आँखों से मेरी आंखें टकरायीं। तुमने लायब्रेरी तक आते-आते कार धीमी की। मुझे देखकर गहरी मुस्कान होंठों पर आयी। बोले, 'प्रीत आओ तुम्हें घर छोड़ दूँगा।' मैं यंत्रचालित सी आयी। तुम कार का दरवाजा खोल चुके थे। मैंने दरवाजा बंद किया लेकिन ठिक से बंद नहीं हुआ था शायद। तुमने थोड़ा नजदीक आकर दरवाजे को ठीक किया। उतने ही पल में तुम्हारा करीब आकर दरवाजा लॉक करना, वो हल्का सा स्पर्श, वो भीनी-भीनी सी खुशबू मेरे अंतर में उतर गयी थी। कार धीमे-धीमे सड़क पर चलने लगी। बारिश होने से तुम धीमे ड्राईव कर रहे थे। वाइपर अपने काम में लगे थे।

-'प्रीत क्या सोच रही हो?' पराग ने सड़क पर देखते हुये कहा। मैंने उसकी ड्राइविंग का फायदा उठाया। कई बार उसे मैंने चोर नजरों से देखा क्या पता क्या था उसके चेहरे में, मन था कि बँधा रह गया अनजानी डोर से। आँखे थीं कि उसकी मुस्कान को देखना चाहती थीं, थक जाने की हद तक। लेकिन ना हो सका। अजीब सा लगेगा उसे; सोचेगा कैसी लड़की है? क्या वो भी ऐसा सोचता है, पसंद करता है जितना कि मैं। पता नहीं? बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी।

-'प्रीत, कॉफी पिओगी?' पराग की नजरें अब भी सड़क पर थीं। प्रीत की नजरें पराग के चेहरे पर। विवश होकर नजरें हटानी पड़ी।

-'मैंने तुमसे पूछा है, कहाँ हो तुम?' पराग का स्वर इस बार थोड़ा ऊँचा था।

-'कहीं नहीं-बोलो। क्या, कॉफी? नहीं पराग, देर हो जायेगी।' मैंने अचानक हडबडा कर कहा।

-'छोड़ो भी यार, नहीं होगी देर। मैं कॉफी हाऊस गाड़ी मोड़ रहा हूँ।'

मैं कुछ कहती तब तक पराग गाड़ी जावरा कपाउण्ड से रीगल टॉकीज की ओर मोड़ चुका था।

-'क्या फिल्म दिखाने ले जा रहे हो?' मैंने थोड़ा हल्के मूड में कहा।

-'नहीं-मुझे फिल्म देखना वैसे भी पंसद नहीं; तीन घण्टे एक ही जगह। न बाबा न... मैं नहीं बैठ सकता इतनी देर।' पराग ने कहा।

-'फिर हम कहा जा रहे हैं।' मैंने पूछा।
-'हम इन्दौर कॉफी हाऊस जा रहे हैं, समझी...'

इन्दौर कॉफी हाऊस एम.जी. रोड पर पड़ता है। ये पता था मुझे। पराग ने गाड़ी पार्क की। फिर करीव आकर बोला -'अब उतरो भी...'

-'पराग बारिश है, भीग जाएंगे।'

-'चलो अब नखरे छांडो, सामने दो कदम की दूरी तक चलना ह समझी...'

पराग जब 'समझी' कहता था तब बड़ा अच्छा लगता था। खैर जब हम अन्दर पहुँचे तो दो तीन टेबल को छोड़कर पूरा पूरा कॉफी हाऊस खाली था। पराग ने कोने की एक टेबल पर कब्जा जमाया फिर मुझसे पूछा -'काफी के साथ क्या लोगी?'

-'जो तुम्हारा मन कहे।'

-'अब बोलो भी।' पराग के अंदाज में थोड़ी झंझलाहट भरी थी और मुझे अच्छा लग रहा था।

- पनीर पकोड़े चलेंगे?' पराग की नजरें फिर मेरे चेहरे पर जम गयी।

-'चलेगा।' मैंने इससे अधिक कुछ नहीं कहा। कॉफी आने तक मैं पराग के सामीप्य का पूरा-पूरा आनंद उठाना चाहती था।

-'प्रीत...' पराग का धीमा नशीला सा स्वर उभरा।

-'हाँ कहो?' मैंने कहीं डूबते हुये जवाब दिया।

-'कुछ नहीं,' कहकर पराग मुस्करा दिया।

काफी हाऊस में हल्का गुलाबी प्रकाश फैला हुआ था। उफ!! कितनी जानलेवा मुस्कान है। कहीं ऐसा तो नहीं मैं ही ज्यादा सोचती हूँ पराग के बारे में, शायद। वेटर कॉफी के साथ पनीर पकौड़े रखकर जा चुका था। कॉफी की धीरे-धीरे उठती भाप हम दोनों के चेहरों के मध्य किसी चिलमन सा काम कर रही थी। तभी पराग ने पनीर का एक पकौड़ा उठाया धीरे से मेरे होंठो की तरफ बढ़ाया। मैंने शायद एक पल ही सोचा होगा फिर होंठ खोल दिये, लेकिन ये क्या सिर्फ आधा ही पकौड़ा खिलाकर शेष बचा पकौड़ा पराग ने खुद खा लिया। उसका वो अंदाज गहरे तक उतर गया। जब हम कॉफी हाऊस के बाहर निकले तब तक बारिश हल्की हो चुकी थी। घर पहुँचने तक हम दोनों ही चुप थे, कार से उतरते समय पराग ने प्रश्न किया-'प्रीत अब कब मिलोगी?'

मैं कुछ बोल नहीं पायी।

-'अच्छा ठीक है मैं इस सण्डे को घर आता हूँ। बॉय-बॉय।' देखते-ही देखते पराग की गाड़ी धीरे-धीरे नजरों से ओझल होती चली गयी।

अचानक तेज आवाज में कोई जंगली चिड़िया मेरे पास से गुजर गयी। मैं ख्यालों के भँवर से वापस आ गयी। तेजी से सीढ़ियाँ उतरती हुयी घर आ गयी। अभी सब सोये हुये थे। चलते हैं... थोड़ी पढ़ाई कर लेते हैं- ये सोचकर थीसिस पर कुछ कार्य करने का सोचा पर एक पेज पलटते ही फिर तुम्हारा चेहरा। सोचा तुम्हें फोन कर लूँ। मोबाइल उठाया। जैसे ही मोबाइल पर तुम्हारा नंबर आया बहुत देर तक मैं तुम्हारे नाम के साथ वो नंबर देखती रही। लेकिन कॉल करन का साहस न हुआ। सच, जो हमें प्रिय होता है, उसकी छोटी-छोटी बात भी हमें बेहद पसंद आती है, चाहे वो उसका मोबाइल नम्बर ही क्यों ना हो, देर तक उस नम्बर को भी निहारना कितना अच्छा लगता है। ना जाने कितनी देर तक मोबाइल पर पराग का नंबर देखती रही। इतने में दरवाजा जोर-जोर से बजाया जाने लगा। मेरे दिल की धड़कनें एकदम से तेज हो गयी और घबराहट के मारे मोबाइल फर्श पर। दौड़कर कर दरवाजा खोला तो देखा, कामवाली बाई थी। मेरी धड़कनें सामान्य हयी।

सारा दिन मुझे चैन नहीं आया। हर आहट पर दिल तेजी से धड़कने लगता और मैं पसीने से नहा उठती। ना जाने कितनी बार उसका नाम हथेली पर लिख-लिखकर मिटाया। कभी धीरे से उस नाम को होठों से स्पर्श किया, पर इंतजार के पल लम्बे होते चले गये। पराग नहीं आया। मन में आया फोन करके आने का समय पूछ लूँ, लेकिन साहस नहीं हुआ।

दोपहर के लगभग दो बजे जब खाना खाकर अपने कमरे में गयी तब भी मन अशांत था, कब आयेगा परागं। समय क्यों नहीं बताया? थोड़ी देर कर लेते हैं इंतजार, शायद शाम को आये। आँखों में नींद का पता भी दूर-दूर तक नहीं था। अजीब सी बैचेनी मेरे पूरे दिलो-दिमाग पर छायी थी। मुझे पूछना था पराग से कि वो कब आयेगा? हो सकता है उसने यूँ ही कह दिया हो। नहीं, यूँ ही वो कैसे कह सकता है, मजाक है क्या? थोड़ी देर टी.वी. ही देख लिया जाये, शायद समय बीत जाये- सोचकर टी.वी. ऑन किया तो फिल्म 'मंजिल' का गीत दिखाया जा रहा था-
'रिमझिम गिरे सावन
सुलग-सुलग जाये मन...' - फिर वहीं बारिश, मेरे ख्यालों में पार्किंग से कॉफी हाऊस तक हल्की बारिश में साथ-साथ भीगते हुये जाने के चित्र उभरने लगे। पराग का साथ कितना सुरक्षित लगता है, कितना सुकून भरा। ना जाने कब आयेगा? अरे, चेहरा तो ठीक से सँवारा नहीं, एक बार ठीक से फ्रश हो जाऊँ... नहीं तो सुस्ती बिखरी रहेगी चेहरे पर; ना जाने क्या सोचेगा? यही सोचकर वाश बेसिन पर जाकर ठण्डे पानी से चेहरा धोया तो हल्का सा महसूस हुआ। उदासी चेहरे पर छायी बैचेनी को साफ देखा जा सकता था। आँखों में अजीब सा खोयापन तैर रहा था। दर्पण में एक दूसरी ही 'प्रीत' का अक्स था। मुझ लगता है चेहरे पर आँखें, होंठ विशेष होते हैं। इन्हें ही अधिक खूबसूरत होना चाहिये। आँखें तो मेरे पास खूबसूरत हैं। कुल मिलाकर मुस्कराहट की तारीफ भी अक्सर गर्ल्स करती हैं। लम्बाई भी अच्छी है, रंग गोरा नहीं साफ कहा जा सकता है। बालों को खुला रखू या रंगीन स्कार्फ से बांध कर रखू?

इतने में कॉलबेल की तेज आवाज ने मेरी दिल की धड़कनों को एकदम से बढ़ा दिया। पूरा शरीर एकदम से काँप उठा, कपोल एकदम से गर्म हो उठे। मैं लगभग भागती हुयी दरवाजे के पास पहुँची एक पल सोचकर मैंने एकदम से दरवाजा खोल दिया। दरवाजे पर धोबन खड़ी थी, प्रेस के लिये कपड़े लेने को। उसे देखते ही मेरा इंतजार एक तीखे गुस्से में बदल गया। मैंने कठोरता से कहा -'ये कोई समय है कपड़े माँगने का?'

-'मेमसाब, दोपहरी के बाद ही तो हम आते है कपड़े लेने को। आप देख लें कितना बजा है?'

मैंने तुरन्त घड़ी की तरफ नजर डाली; शाम के पाँच बच चुके थे। ओह... शाम हो चुकी है। तब तक मेरे इंतजार की घड़ियाँ चरम सीमा पर पहुँच चुकी थीं, मैंने बुझे मन से धुले हुए कपड़े निकाले और धोबन को प्रेस के लिये दे दिये। दरवाजा बंद करके जब अपने कमरे में आयी ऐसा लगा कि इंतजार की जगह अब गुस्से ने ले ली है। मैंने क्यूँ नहीं पूछा कि वो कब आयेगा? काश! मैंने पूछा होता। ये इंतजार! हर आहट पर इतनी बेचैनी, घबराहट, क्या करूँ मैं? ना वो आया ना फोन किया। फिर कब आयेगा? हर दस्तक मेरा दिल धड़का देती है। हर आहट पर मैं घबरा जाती हुँ। ओह! किस बात पर मैं इतनी बैचेन हूँ, और मैं फूट-फूट कर रो पड़ी। तकिया मेरी तन्हाई में बहाये आँसूओं का गवाह बन गया। रोते-रोते ना जाने कब मेरी आँख लग गयी, पर उस सण्डे को पराग नहीं आया तो नहीं आया।

सोमवार को भी मेरा कॉलेज जाने का मन बिल्कुल नहीं कर रहा था। फिर वही कल का जानलेवा और मीठा कसक भरा इंतजार नजरों के सामने घूम गया। गुस्सा भी इतना आ रहा था पराग पर कि मन कर रहा था कि मैं उससे कभी बात न करूँ। जब वो दो-चार दिन बाद अपनी कार लेकर कॉलेज के गेट पर मिल जाता है तो भूल जाती हूँ पुरानी शिकायतें। आज कॉलेज नहीं जाऊँगी; करने दो जनाब को इंतजार। कुछ दिन इंतजार, एक-एक पल को धीरे-धीरे जाते हये देखना फिर भी खबर नहीं आना, फोन नहीं आना, एस.एम.एस. नहीं मिलना। कम-से कम पन्द्रह दिनों तक कोई बात नहीं करूँगी; ना ही फोन करूँगी, ना ही किसी प्रकार का एस.एम.एस.। मित्रता की कोई पहचान नहीं? दोस्तों के साथ भी ऐसा सलूक? आश्चर्य है।

सबह के सात बजने को थी, मम्मी ने अभी-अभी चाय टेबल पर रखी की चाय का कप लेकर मैं बालकनी में आ गयी। मौसम में हल्की ठण्डक पली हई थी। लगता है सारी रात बारिश हो रही थी। पेड़ों की ताज़गी देखते ही बनती थी। अभी फिलहाल बारिश बंद थी पर नन्हीं-नन्हीं फुहारें रुक-रुक कर जारी थी। बादल ऐसे लग रहे थे मानों पेड़ों के शिखर पर पसर गये हों; रात भर बरसने के बाद थककर आराम कर रहे हों। फिजा में नमी थी। इस नमी ने भी उस वातावरण को रोमांटिक बना दिया था। मौसम बेहद खुशनुमा था। ऐसे में पराग का ये व्यवहार बड़ा तकलीफ देता है वो क्यों नहीं समझता इन गुलाबी बातों को, गुलाब सी खुशबू में पगे हुए ख्यालों को। कैसा कठोर दिल है पराग का? उसके दिल में क्या ये सब बातें नहीं आती? किस बात का घमण्ड है उसे? दौलत कां? अपनी स्मार्टनेस का? पता नहीं किस बात पर इतनी अकड़ दिखाता है। अब जब भी मिलेगा तो जरुर पूछूँगी । ऐसा व्यवहार वो करता क्यों हैं?

आज तो मूड खराब होने से नींद भी देर से खुली। मार्निग वॉक पर भी नहीं जा पायी। पराग भी... परेशान करके...? पता नहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें दूसरों के दु:ख से सुखी होने की आदत होती है। पराग शायद उन्हीं में से हो। लगता तो नहीं। फिर कहा क्या जा सकता है, उसके अंतर में क्या छिपा है; भगवान जाने। मुझे सोचना था परग से दोस्ती से पहले; लेकिन विचारों की समानता ही हमारी दोस्ती का आधार बनी थी।

मन कर रहा था पराग के साथ कहीं दूर इस धीमी-धीमी बारिश में चल कर भीगा जाये जंगल में कहीं... ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच, भीगे पेड़, भीगी सड़कें, भीगा-भीगा हर फूल, धुली निखरी हर बात बिल्कुल उजली सी। सुबह भी सफेद कोरे कागज सी कितनी सफेद है। लिख दूँ इस पर कोई अच्छी कविता या फिर पराग की कोई प्यारी सी गजल। मझे याद आया अलीपुर द्वार का झील का वो सुन्दर नजारा जहाँ चमकते सफेद गोल पत्थर झील के किनार में कितने सुन्दर दिख रहे थे। बाँस से बनी खूबसूरत कॉटेज जो दिखने में किसी चित्र की भांति लग रही थी पर करीब देखने पर ही मालूम हाता कि काटज है। ऐसी ही सुन्दर सी कॉटेज में पराग के साथ चलकर इस बारिश का जमकर आनंद लिया जाये। लेकिन उसकी ये बात-बात पर रुठने वाली आदत परेशान कर देती है मुझे। दोस्तों में ये नखरेवाली आदत तो होनी नहीं चाहिए। क्या पता कब छोड़ेगा अपनी ये रुठने की आदत।

-'प्रीत, आज कॉलेज नहीं जाओगी?' प्रीत के कानों में मंमी की आवाज जैसे ही पड़ी वह पराग के ख्यालों से बाहर आयी। प्रीत की मम्मी अपनी बेटी के चेहरे पर छाये उतार-चढाव को देख रही थी। सो मुलायम स्वर में बोली, 'आज सोमवार है। कॉलेज का पहला दिन। जाओ तैयार हो जाओ।'

-'नहीं मम्मी, आज मूड नहीं, पराग भी परेशान करता है। कल कहा था आने को, नहीं आया,' मेरा मूड खराब था।

- 'अच्छा देखो कॉलेज में मिले तो उसे डाँट देना,' मम्मी बोली।

-'नहीं मम्मी, डाँट भी सुनकर मुस्करा देता है,' मैंने कहा।

-'अब तू जाने और पराग। मैं चली, घर में काम भी पड़ा है।' मम्मी चली गयी। 'मैं भी चली जाती हूँ कॉलेज लेकिन पराग से बात नहीं करूँगी' सोचते-सोचते मैं कॉलेज के लिये तैयार होने लगी।

घर से कॉलेज की दूरी मुझे विशेष नहीं लगती थी। मुझमें एक आदत है, जब भी मैं पराग के संबंध में सोचना शुरु करती तब समय तो मानो पंख लगाकर ना जाने कहाँ उड़ जाता। पता नहीं चलता घण्टों कैसे गुजर जाते हैं। उसका एक ख्याल ही मुझे रातों को बैचेन किए रहता। रात में 2 बजे तक मैं बैचेन सी केवल आसमान में सफर करते चाँद को देखती रहती। बड़ा परेशान करता है ये लड़का मुझे। क्या करें उसकी इस इंतजार कराने की आदत का। मिलने दो कॉलेज में, बिल्कुल बात नहीं करनी, कैसा दोस्त है! अपनी दोस्त की परवाह नहीं करता। उसे अहसास नहीं इंतजार करने में कितनी तकलीफ होती है।

मेरा पीरियड यूँ भी सेकन्ड था। फर्स्ट पीरियड तो मुझे यूँ भी खाली रहना ही था। इसलिये विशेष जल्दी नहीं थी। यही सोचते-सोचते मधुमिलन टॉकीज तो निकल ही गया। कॉलेज जावरा कम्पाउण्ड में था। पहला जो खाली पीरियड था उसे लायब्रेरी में बिताते हैं, पिछली बार वो शिवानी की पुस्तक तलाश रही थी, शायद वो मिल जाये? यही सोचकर मैंने पर्स में लायब्रेरी का कार्ड निकाला ही था कि पराग की कार की झलक दिखायी दी। कुछ पलों बाद कार मेरे ठीक सामने खडी थी।

-'मैं तुमसे बात नहीं करूँगी कभी नहीं कदापि नहीं। तुम परेशान करते करवाते हो। समय के पाबन्द बिल्कुल नहीं हो तुमको। पता है, कितनी नकलीफ होती है इंतजार करने में,' बोलते-बोलते मैं अपने आँसू रोक ना सकी और आँसू मेरे गालों पर बह निकले।

'अरे-अरे प्रीत ये क्या?' पराग बेहद घबरा गया तुरन्त कार का दरवाजा खोलकर नीच उतरा। मुझे कंधों से पकड़कर तुरंत ही कार की अगली सीट पर बैठाया, तेजी से दूसरी ओर खुद आकर बैठ गया। कार धीरे-धीरे ड्राइव करनी शाम कर दी। साथ ही मुझे समझाने भी लगा, 'प्रीत आगे से ऐसा नहीं होगा... प्लीज...चुप हो जाओ।'

-'नही होना मुझे चुप। बोलो क्या करोगे?' मैं जोर से बोली।

-'प्लीज प्रीत रियली वेरी सॉरी।' पराग ने कहते-कहते मुझे अपने में समेट लिया। मेरे आँसू उसके कँधे को भिगोने लगे थे। बारिश शुरु हो गयी थी, धीमे-धीमे।
( समाप्त)


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