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आवाज़ें
Writer: प्रकाश गुप्ता, Lohagate keshri Nagar, Indrapuri, Patna, Bihar


# आवाज़ें

Writer: प्रकाश गुप्ता, Lohagate keshri Nagar, Indrapuri, Patna, Bihar

आज मेरी जब आंख खुली तो ऐसा लग रहा था कि बहुत सालों बाद मेरी आंख खुली है। और मैं एक ऐसी जगह पर खड़ा हूं, जहां पर मुझे दो रास्ते दिख रहे थे। हालांकि मुझे परेशान होना चाहिए था कि मैं कहां आ गया, लेकिन मैं कौतूहल से उन दो रास्तों को देख रहा था कि यह रास्ते कहां जाते हैं! एक रास्ता, घने धुंध जैसा पूरा सफेद था और एक काले धुंआ सा घिरा हुआ; जैसे कहीं पर आग लगती है तो कैसे काले धूओ का बड़ा सा गुच्छा आसमान में बिखर जाता है, ठीक वैसे। नहीं...नहीं... उससे भी डरावना, मैं वह रास्ता देख कर डर गया। मैंने झट से अपनी नज़र वहां से हटा ली, और घने सफेद धुंध पर डाल ली। कुछ पा लेने की आस में... अब मैं उसे बहुत कुछ उम्मीद करने लगा था, और धुंध साफ होने का इंतजार करने लगा। काफी देर हो गई यह ढीठ ढूंढ साफी ही नहीं हो रहा था। मैं पूरा नीरस हो गया ...अब मुझे फिक्र होने लगी थी कि मैं यह कहां आ गया... जाने यह कैसी जगह है? मैं तो सो रहा था, यह कहां आगया मैं...

मुझे अचानक फिर एक आवाज़ सुनाई दी। वह अंजान आवाज़, अंजान कोहरे से आ रही थी, "मुबारक हो आपको लड़का हुआ है।" फिर एक बच्चे की रोने की आवाज़ सुनाई देने लगी। पता नहीं मेरे अंतर्मन में कितने सवाल उठने लगे कि मैं उनके जवाब ढूंढने के लिए बिना सोचे-समझे घने धुंध में निकल पड़ा... एक बच्चा रो रहा था। मैंने देखा सब लोग एक आदमी को बधाई दे रहे थे, "मुबारक हो... मुबारक हो..."

यह सब इतना धुंधला था कि मुझे उस आदमी, बच्चे या उस को जन्म देने वाली मां का चेहरा नहीं दिख रहा था। (कुछ सवालों के जवाब हमारे सामने होते हैं, लेकिन वह इतने धुंधले होते हैं कि हम उन्हें साफ नहीं देख पातो...)

फिर मैं उस कोहरे में और अंदर घुसता चला गया सवालों के जवाब के लिए। फिर मुझे और भी आवाजें सुनाई देने लगी, जैसे एक बच्चा तोतली जुबान में 'मम्मी-पापा' बोलने की कोशिश कर रहा है। मुझे कुछ ठीक से दिख नहीं रहा था, पर अचानक मेरे बगल से एक छोटा बच्चा भागते हुए गया और उसके पीछे एक बूढ़ा आदमी। यह देखकर मुझे याद आया कि छोटे पर मैं भी दादाजी की छड़ी लेकर भाग जाए करता था और वह मेरे पीछे आते थे इसी तरह। तभी मेरी नज़र एक बच्चे पर गई, वह गुल्लक में से पैसे निकालते हुए मुझे देख रहा था और वह गुल्लक उसकी नहीं थी। शायद वह किसी और की थी, उसके बड़े भाई की? क्योंकि उसके चेहरे पर पैसे मिल जाने की खुशी तो थी लेकिन डर भी था, चोरी का डर। मैंने उसको आवाज दी, "रुको क्या कर रहे हो तुम? चोरी करना गलत बात है। उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं, जैसे मैं वहां हूं ही नहीं। हां, शायद नहीं हूं... और कभी था भी नहीं...!

इर्द-गिर्द ऐसी बहुत सारी चीजें चल रही थी। मैं सबको देख रहा था कि तभी मुझे एक एक ट्रेन की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ धीरे-धीरे साफ होती गई। मैंने पाया कि मैं रेलवे स्टेशन पर खड़ा हूं। तभी मैंने देखा कि एक बच्चा चिल्ला रहा है 'मम्मी- मम्मी...'। शायद वह बिछड़ गया है वह रो रहा था। वह रोते-रोते मेरे पास आ रहा था, इस बार मुझे कोई घबराहट नहीं है हुई, क्योंकि मैं जान चुका था कि वह मुझे देख नहीं सकता, कि तभी मैंने अपने हाथ पर एक हाथ महसूस किया। यह उसी छोटे बच्चे का हाथ था, वह बोला, "भैया आपने मेरी मम्मी को देखा है?"

मैं घबरा गया, मैंने उसका हाथ अपने हाथ से झट से हटाया और कहा कि, "नहीं... नहीं... मैंने नहीं देखा।"

उसने कहा, "मेरी मम्मी को ढूंढो दो ना, वह कहीं चली गई है..."

"चली गई है?" तभी मुझे एक आवाज सुनाई दी, "आपने मेरे बेटे को देखा? वह 10 साल का है..."

मैं खुश हो गया, कि उसके बेटे को उसकी मां मिल गई और एक मां को उसका बेटा। मैंने थोड़ा नाराज, थोड़ा खुशपन से बोला कि, "यह रहा आपका बेटा। तब से आप को ढूंढ रहा है, कहां चली गई थी आप?" (मैंने उस औरत से ऐसे बोला जैसे मेरा हक है उस पर, जैसे मैं उसे बरसों से जानता हूं।) मेरे बोलने के बाद पता नहीं क्या हुआ, उसने मुझे बहुत गुस्से से देखा और चली गई। मैंने लड़के से बोला, "अरे तुम्हारी मम्मी जा रही है, जाओ उनके साथ... रोको उन्हें..."

तो लड़का रोते हुए बोला, "भैया मेरी मम्मी को फिर से ढूंढ दो ना..."

मैंने उसको एक जगह बैठाया और उसकी मम्मी को ढूंढने के लिए खुद निकल गया। (कभी-कभी पुरानी खोई हुई चीज़ बाद में जाकर बहुत याद आती है, उसकी मम्मी को ढूंढते वक्त मुझे ऐसा ही लग रहा था कि मैं अपनी कोई पुरानी खोई हुई चीज ढूंढ रहा हूं, या जब वह औरत मुझ पर गुस्सा करके गई थी तो ऐसा लग रहा था कि पुरानी यादे याद आई और झट से चली गई; जैसे किसी कैमरे का फ्लैश हो... )

उस बच्चे की मम्मी नहीं मिली तो में वापस आ गया उस बच्चे के पास। आया तो देखा वह बच्चा वहां पर नहीं था और फिर मैं इर्द-गिर्द घूमते लोगों से पूछा तो किसी ने जवाब नहीं दिया। मुझे महसूस हुआ कि वह लोग मुझे देख-सुन नहीं पा रहे हैं पहले जैसे। मैं इस बार डर गया, ऐसा लग रहा है था कि मैंने कुछ खो दिया है। मैं मायूस हो गया, क्या मैंने सच में खो दिया? पर किसे? यहां तो मेरा अपना कोई नहीं है। फिर किसे खो जाने की मायूसी है? फिर किस को ढूंढने की तलब है? मैं कहां आ गया? अब बहुत दुख है... डर है, पर क्यों? किसके लिए? यहां लोग क्यों हैं? मैं क्यों हूं? क्या ढूंढ रहा हूं? यह क्या है? मेरा अतीत है? मेरा भविष्य है? या, यह मेरे वर्तमान है? या जो है वह सच में है?

मुझे क्या हो रहा है? मैं सच और झूठ के बीच का जवाब नहीं ढूंढ पा रहा हूं। कहां मिलेगा जवाब? कहा? कहां?

मेरी जब आंख खुली तो देखा मैं यथार्थ की चौखट पर खड़ा हूँ। में काफी देर तक यथार्थ की चौखट पर खड़ा रहा। डर के साथ-साथ, इंतजार में कि कोई आए, उस सच की दुनिया से और मुझे अंदर बुलाए। कहे कि, "आओ तुम्हारा ही घर है..." (हम कई बार सच के लिए दरवाजे पर खड़े रहते हैं लेकिन हमें सच बुलाता नहीं है, क्योंकि सच को बुलाने की जरूरत नहीं है, आप सच के पास खुद ब खुद जाते हैं, सच मौन होता है। लेकिन झूठ आपको चिल्ला-चिल्ला कर पुकारता है, आवाज़ देता है...)

मैं काफी देर तक खड़ा रहा कोई नहीं आया, और मैं चौखट के इस पार आ गया, मैं अंदर नहीं गया। फिर मैंने पाया कि यथार्थ की चौखट धीरे-धीरे गायब हो रही है। मैं अंदर जाना चाहता था लेकिन मुझे मेरा दंभ रोक रहा था। फिर उसकी जगह कल्पित चौखट बन गई। और मैं उस चौखट पर खड़ा हो गया। मैंने पाया कि मुझे आवाज़ सुनाई देने लगी पहले जैसे। और यह सुनकर मैं खुश हो गया। क्योंकि कुछ देर पहले मैं यथार्थ की चौखट पर खड़ा था, और इंतजार कर रहा था कि कोई आए, मुझे आवाज़ दे और जब मैंने यहां "कल्पित" की चौखट पर अपना नाम पुकारते सुना तो मैं खुश हो गया। और मैं पूर्णता से सम्मोहित होकर अंदर घुस गया। अंदर घुसते ही मैंने पाया कि हर जगह आग लगी है। घना काला धुआं फैला हुआ है और झूठ की ऊंची-ऊंची दीवारें हैं, जहां सब लोग हैं, और मुझे देख रहे हैं। मुझे सुन पा रहे हैं और यह सब देख कर मैं बहुत खुश हो रहा था।

अब यही मेरी दुनिया है। सब कुछ अच्छा लग रहा था। सब कुछ निश्चित था। फिर मैंने पाया कि जो बच्चा अपनी मां से बिछड़ गया है अब वह दोनों मिल गए हैं। पर खुश नहीं हैं। खैर मुझे क्या करना है मैं तो बस उन दोनों को मिलते देखना चाहता था। अब मैं यही रहूंगा, और मैं खुश हूं।

में एक दिन निकास द्वार पर बैठा था। कि मैंने देखा कि एक लड़का बाहर एक मोड़ पर खड़ा है और उसे दो रास्ते दिख रहे हैं। ठीक वैसे-जैसे मुझे पहली बार दिखे थे। और वह इस दुविधा में है कि वह कहां जाए? उसने एक बार मेरी तरफ वाले रास्ते को देखा। और फिर उसने सफ़ेद धुंध से भरे रास्ते को देखा। मैंने उसको आवाज लगाई, "अरे सुनो यही रास्ता चुन लो, क्योंकि तुम्हें अंत में आना यहीं है।"

उसने मेरी बात को अनसुना करते हुए, जैसे मैं वहां था ही नहीं। उसने दूसरा वाला रास्ता चुन लिया। और मैं मन ही मन उसका इंतजार करते हुए मुस्कुरा दिया।
( समाप्त)


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