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प्यार की नई कहानी

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प्यार की नई कहानी
लेखिका - विनीता मोहता, विदिशा


# प्यार की नई कहानी

लेखिका - विनीता मोहता, विदिशा

। बस स्टॉप पर काफी देर से धूप में खड़ी देवयानी परेशान हो गई थी, तभी सामने एक बस आकर रुकी जो उसके गांव जाती थी। बस पूरी तरह से खचाखच भरी थी। पैर रखने तक की जगह नहीं थी। एक पल को देवयानी उस बस में चढ़ने से खुद को रोक रही थी, तभी उसे ख्याल आया यह बस छोड़ दी तो अगली बस 2 घंटे के बाद आएगी। तब गांव पहुंचते-पहुंचते रात हो जाएगी। मन मार कर दो तीन लोगों को धक्का देते हुए देवयानी जैसे-तैसे बस में अपने लिए खड़े होने की जगह बना पाई।

वैसे ही पसीने में लथपथ हो रही थी। ऐसे में बस की भीड़ उसे और ज्यादा परेशान कर रही थी। बस चलते ही हल्की सी हवा का उसके शरीर को छुआ तो कुछ राहत का अहसास हुआ। मगर यह राहत कुछ पल की थी, अचानक ही उसे अपने शरीर पर किसी के हाथों का एहसास हुआ। कंधे से होता हुआ वह हाथ उसकी पूरी पीठ का जायजा ले चुका था। जाहिर सी बात है यह गलती से नहीं बल्कि जानबूझकर किया गया था। उस स्पर्श से देवयानी के पूरे शरीर में एक कोफ्त सी हुई और उसने पलट कर उस इंसान के गालों को अपने हाथों से लाल कर दिया।

देवयानी के इस अप्रत्याशित व्यवहार से वह व्यक्ति घबरा कर वहां से पीछे चला गया। सभी लोग देवयानी की ओर देखने लगे जब दर्जनों आंखें उसे देख रही थी तब उसके शरीर में उन हाथों के लिजलिजाते स्पर्श से भी ज्यादा झुरझुरी हो गई। तभी उसके सामने देवांश खडा था, वही देवांश जो कभी उसका जानी दुश्मन हुआ करता था। दोनो के बीच लडाई किस बात से हुई थी वो तो शायद वो दोनो भी भुल चुके थे। बस जब भी एक दूसरे के सामने आते अपना रास्ता बदल देते थे।

उसे अपने सामने खड़ा देखकर देवयानी को लगा कि अब देवांश सबके सामने उसका मजाक बनाएगा। मगर उसकी सोच के विपरीत देवांश उसके करीब आया और उसका हाथ पकड़ कर अपनी सीट के पास ले गया। उसे वहां पर बैठा दिया और खुद उसके साइड में इस तरह से खड़ा हो गया कि कोई और देवयानी को छू भी ना सके। देवांश का यह अप्रत्याशित व्यवहार देखकर देवयानी हेरान थी।

गांव पहुंचकर भी जब देवांश ने देखा देवयानी के घर का कोई भी वहां पर नहीं खड़ा था, तो उसने देवयानी का हाथ पकड़कर बस स्टैंड पर खड़ी अपनी बाइक के पास उसे ले गया और उसे बैठने का इशारा करने लगा। मगर देवयानी अपनी अकड़ में मना करके बोली, "रहने दो, मेरी वैसे ही बहुत मदद कर चुके हो। मैं अकेले चली जाऊंगी," कह कर देवयानी आगे बढ़ गई तो देवांश अपनी बाइक स्टार्ट करके उसके पास ले जाकर खड़ा हो गया। देव्यानी फिर उसे अनदेखा करके आगे बढ़ने लगी तो देवांश ने जबरन उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी बाइक पर बिठाया और उसे उसके घर पर छोड़ दिया।

देवयानी ओर देवांश दोनों ही गांव की पढ़ाई पूरी करके शहर में कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे। अब तो हर वीकेंड दोनों साथ में ही गाव आने लगे उन दोनो की दुश्मनी धीरे-धीरे दोस्ती में बदल रही थी। उनकी इस दोस्ती के चर्चे सारे गांव में हो रहे थे। गांव वालों को चर्चा करने का एक मौका और मिल गया।

एक शाम बस से लौटते हुए देवांश और देवयानी दोनों देवयानी के घर की ओर न जाते हुए देवांश के घर पहुंच गए। जहां पर देवांश ने सबके सामने एलान कर दिया कि उस ने ओर देवयानी ने शादी कर ली है। घर वाले ओर कुछ कह पाते इसके पहले ही देवयानी पेर पटकते हुए घर के अंदर चली गई। एक तो अनचाही बहू और उस पर ऐसे तेवर। मगर देवयानी सरपंच जी की बेटी थी तो घर वालों के गले से आवाज तक नहीं निकल पाई। मगर यह खबर जंगल में आग की तरह पूरे गांव में फैल गई। जब सरपंच जी को इस बारे में पता चला वे भागते हुए देवांश के घर आए ओर बोले, " पण्डित जी ये किस जन्म का बदला लिया। आपके बेटे ने हमसे कम-से कम कोई खबर तो कर देते। देवयानी हमारी इकलौती बेटी है; ऐसे भाग कर शादी कर ली। परिवार ओर समाज में तो हमारी नाक कट गयी।"

पंडित जी से बोले, "नाक तो हमारी भी कट गई। पण्डितों के घर मछेलो की बेटी? शिव... शिव... शिव... धर्म ही भ्रष्ट हो गया।"

"इतनी ही धर्म की चिंता थी तो अपने बेटे पर लगाम क्यों नहीं लगाया? पूरा गांव जानता था तुम्हारा बेटा मेरी बेटी के पीछे पड़ा हुआ था," कहते हुए सरपंच जी तनकते हुए वहा से चले गये। पण्डित जी भी इस शादी से कुछ खास खुश नहीं थे। मगर पंडिताईन के तो मानो पेर जमीन पर नहीं टिक रहे थे। अपने देवांश के लिए उन्होने जैसी लडकी का सपना देखा था देव्यानी पूरी तरह उसी के अनुरूप थी। उन्होंने जल्दी ही पूरे गांव में अपनी बहू की मुंह दिखाई का बुलावा भेज दिया।

देवांश की कुछ मुंह बोली बहनों ने देवयानी को तैयार किया और मुंह दिखाई की रस्म के लिए बैठा दिया। मुंह दिखाई की रस्म के दौरान हर कोई उन दोनों की अचानक हुई शादी के बारे में बात कर रहा था। कोई कहता देवांश ने लंबा हाथ मारा है इकलौती लड़की से शादी कर सरपंच जी का पूरा माल अपने कब्जे में ले लिया; तो कोई कहता, यह देवयानी तो शुरू से ही चालू थी, भोले-भाले देवांश को फंसा कर अब सारी जिंदगी ऐश करेगी। जितने मुंह उतनी बातें।

सब लोगों की बातें सुनकर एक बार तो देवयानी के मन में आया की पलट कर सबको जवाब दे दे, मगर फिर कुछ पल के लिए खामोश रहने में ही अपनी भलाई समझी। जब तक मुंह दिखाई की रस्म हुई सुहागरात के लिए उन दोनों का कमरा सज चुका था। देवयानी कमरे में देवांश का इंतजार करने लगी। आस पड़ोस की भाभी और बहने देवांश को कमरे में जाने से रोक रही थी। उनमें से एक भाभी देवांश को छेड़ते हुए बोली, "इतनी भी क्या जल्दी है देवर जी... शहर में तो आप दोनों अकेले ही थे, तो आपने सब कुछ कर ही लिया होगा। इस सुहागरात का क्या मतलब?" कहते हुए सभी लोग जोरों से हंसने लगे। तभी पंडिताइन वहां आई ओर उन लोगों को हटाते हुए बोली, "चलो हटो यहां से, बहुत तमाशा हो गया। अब हमारे बबुआ के आराम करने का समय है। जा रामअवतार की बहू, हमार बबुआ को उका कमरा में छोड़ आ ओर हा, यी ले दुध का ग्लास। अब तो बस बबुआ हमका जल्दी से दादी बना दे," कहते हुए उन्होने देवांश की बलाए ले ली।

देवांश के कमरे में जाते ही देवयानी पलंग पर से खड़ी हो गई और साइड में रखी चेयर पर बैठ गई। कुछ देर तक तो सब लोग उनके कमरे के दरवाजे पर कान लगाए खड़े थे। मगर जब कुछ आवाज नहीं आई तो सब लोग पंडित जी के घर से चले गए। बाहर की खामोशी को देख देवयानी ने एक बार अपने कमरे का दरवाजा खोला बाहर अंधेरा था और कमरे के आस पास कोई ना था। उसने तुरंत कमरे का गेट बंद किया और अपने पहने हुए सारे गहने उतार कर फेंक दिए। कमरे की सजावट अपने हाथों से खराब कर दिया। देवांश उसे यह सब करते देख खामोश खड़ा रहा। उसकी ख़ामोशी देवयानी के गुस्से को और बढ़ा रही थी। वह अपने लहंगे का दुपट्टा हटाकर उसके सामने जाकर खड़ी हो गईं," मिस्टर देवांश, कर लो अपने मन की, यही तो तुम चाहते थे। अब तो तुम ऑफिशियल यह सब कुछ कर सकते हो। मेरी मजबूरी का बहुत अच्छा फायदा उठाया तुमने। अब जब लोगो को सच्चाई पता चलेगी तुम उनकी नजरों में महान बन जाओगे," कहते हुए देवयानी जोरो से रोने लगी।

देवांश ने उसका दुपट्टा उसके कंधे पर रखते हुए कहा, " देवयानी यह सही है की मैं तुमसे प्यार करता हू। हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गया मुझे पता नहीं चला। मगर ये कभी मत सोचना कि मैंने तुमसे शादी करके तुम पर कोई एहसान किया है। बल्कि मैंने तुम्हें दिल से अपनाया है। रात बहुत हो गई है तुम आराम करो, " कहकर उसने पलंग पर देवयानी के सोने की जगह बनाई और खुद जमीन पर दरी बिछाकर सो गया।

अगली सुबह देवयानी पग फेरे के लिए अपने मायके चली गई पंडिताइन देवांश से बोली , "बिटवा तुम्हें देवयानी पसंद थी तो हमसे कह देते, हम खुद सरपंच से बात करके तुम्हारी शादी करवाते। मगर तुमने इस तरह घर से भाग कर शादी क्यों की? हमार इकलौते बेटे की शादी के सारे अरमान धरे- के धरे रह गए। हम तो कौनो शौक भी ना पूरा कर पाए। अब तु जब बहुरिया को लिवाने जायेगा तो ये कुछ गहने हमने तोहार होने वाली महरारू के खातिर बनवाये थे, ओका दे दैयो।"

देवांश ने मुस्कुराते हुए गहनों की पोटली अपने हाथ में ली और कहा , "जब देवयानी वापस घर में आएगी तुम अपने हाथों से उसे यह दे देना।"

पंडिताईन, अपनी श्रद्धा के हिसाब से बेटे के ससुराल बालों के लिए फल और मिठाई लेकर बेटे को बहू को विदा कराने के लिए भेज दिया। सरपंच जी देवांश को देख कर खुश होकर बोले, "आओ बेटा यहां हमारे पास बैठो..."

देवांश ने उनकी ओर पंडिताइन का भेजा हुआ शगुन बढ़ाया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने नौकरों को आवाज दी और कहा , "जाओ आपस में बांट लेना।"

देवांश को अपनी मां का यह अपमान बर्दाश्त ना हुआ मगर वह कुछ ना बोला। भोजन के बाद सरपंच जी ने देवांश से कहा अभी तक जो कुछ भी हुआ उसमें तुम दोनों की मर्जी शामिल थी। मगर अब जो कुछ भी होगा हमारी मर्जी से होगा। देवयानी उस घर में कभी वापस नहीं जाएगी। अगर तुम चाहते हो कि देवयानी और तुम्हारा साथ बना रहे तो तुम्हारे को हमारे घर घर-जमाई बनकर रहना होगा। वरना आगे तो तुम खुद समझदार हो। अपना फैसला हमें सुना देना, "कहकर सरपंच जी खेतों में चले गए।

दूर खड़ी देवयानी उन दोनों की बातें सुन रही थी उसने तुरंत अपनी मां के पास जाकर कहा, " पिताजी को इस तरह देवांश का और उसके परिवार का अपमान नहीं करना चाहिए था। अब देवांश का परिवार मेरा भी परिवार है। इस तरह उन्होंने मेरा भी अपमान किया है और जहां पर मेरा और मेरे पति का अपमान हुआ हो वहां में एक पल भी नहीं रुक सकती," कहकर देवयानी ने देवांश का हाथ पकड़ा और अपने घर लौट आई।

घर पहुंचकर पंडिताइन उसके लिए गहने लेकर उसके पास पहुंची तो देवयानी पहले से ही अपनी मां के दिए हुए गहनों से लदी हुई थी। उसके इतने गहनों के सामने अपने थोड़े से जेवर देते हुए पंडिताइन को शर्म आने लगी। जब बिना कुछ कहे पंडिताइन देवयानी के पास से उठने लगी, तो देवयानी ने उनके हाथ से गहने लेते हुए कहा, "मां, यह गहने मेरे लिए है, क्या?"

उन्होंने धीरे से हमें गर्दन हिलाई। देवयानी ने अपने पहने हुए सारे गहने उतार दिए और तुरंत वह गहने पहन लिए। और पंडिताइन की ओर देख कर बोली, "बताइए आपकी बहू कैसी लग रही है?"

पंडिताइन मुस्कुरा कर उसकी बलाए ले ली।

देवयानी के इस तरह घर छोड़कर चले जाना पर जहां एक और सरपंच जी का गुस्सा और बढ़ गया, वही पर अपने परिवार के लिए प्यार देखकर देवांश का प्यार देवयानी के लिए और परवान चड रहा था।

शादी के कुछ समय बाद ही देवयानी ने सबको खुशखबरी सुना दी तो पंडिताइन के तो पैर जमीन पर नहीं पढ़ रहे थे। देवांश देवयानी का पहले से ज्यादा ख्याल रखने लगा। उसके प्यार की गर्माहट से देवयानी का गुस्सा पिघलने लगा था। अब वह भी मन ही मन देवांश से प्यार करने लगी थी। जल्द ही सातवें महीने में गोद भराई की रस्म हुई।

इस रस्म के दौरान सरपंच जी का भी गुस्सा भी ठंडा हो गया था। उन्होंने पूरे गांव के सामने अच्छी तरह से देवयानी की गोद भराई की ओर पंडिताइन से इजाजत लेकर देवयानी को लेकर अपने घर आ गए ताकि उसकी डिलीवरी मायके में हो सके। मगर अगले ही दिन देवयानी को लेबर पेन होने शुरू हो गए। घबराकर सरपंच जी उसे और देवांश को लेकर शहर के हॉस्पिटल पहुंचे। देवयानी ने एक लड़के को जन्म दिया, घरवालों के अनुसार प्रीमेच्योर डिलीवरी थी जो सातवे महीने में ही हो गई थी, मगर डॉक्टर ने मानने से इनकार कर दिया कहां बच्चा पूरे 9 महीने के बाद ही जन्म ले रहा है। मगर वह थोड़ा कमजोर है इसलिए ब्लड की आवश्यकता होगी। मां का ब्लड ग्रुप तो उसके साथ मैच नहीं कर रहा है पिता का ब्लड ग्रुप मैच कर जाए। उन्हें देवांश का ब्लड ग्रुप बच्चे के ब्लड ग्रुप से मैच करने की कोशिश की मगर ब्लड ग्रुप मैच नहीं हुआ। डॉ देवांश से बोले , "हाउ इज इट पॉसिबल!!! मदर एंड फादर दोनों का ब्लड ग्रुप मेंच नहीं कर रहा है?"

देवांश नज़रें नीची करके बोला , "बिकॉज आई एम नॉट हिस फादर..."

यह बात सरपंच जी ने सुन ली। उन्होंने तुरंत देवयानी से इसके बारे में सवाल किया तो देवयानी ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया। सरपंच देवयानी पर नाराज हो रहे थे, मगर तब तक देवांश बच्चे के लिए ब्लड़ की व्यवस्था करके वहां आ चुका था। सरपंच जी को यू नाराज देख पर देवांश उनके सामने अपनी नजरें झुका कर बोला, "आप अकेले देवयानी पर नाराज ना हो, यह शादी हम दोनों की मर्जी से हुई है। देवयानी कॉलेज में किस लड़के को पसंद करती थी। दोनों अपने प्यार में हद से आगे बढ़ चुके थे। मगर अपनी हद भूलने के बाद उस लड़के ने देवयानी को अपनाने से इंकार कर दिया। देवयानी गांव के बाहर अपने साथ-साथ उस नन्ही सी जान को भी खत्म करने की कोशिश कर रही थी। तभी मैंने बाहर मंदिर में उससे शादी करके इस बच्चे को अपना नाम दे दिया। मगर आप इसे मेरा एहसान मत समझना, बल्कि देवयानी ने मुझे अपना कर मुझ पर एहसान किया है। शुक्रिया देवयानी आज तुम्हारी वजह से मेरा परिवार पूरा हो गया," कहते हुए देवांश ने देवयानी का हाथ पकड़ लिया। ओर उनके प्यार की नई कहानी उस बच्चे के रूप में मुस्कुरा रही थी।
( समाप्त)


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