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पानी की जाति

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पानी की जाति
लेखक- गौरव शर्मा, पिता- रामगोपाल शर्मा, लाड़पुरा बाजार, कोटा (राजस्थान)


# पानी की जाति

लेखक- गौरव शर्मा, पिता- रामगोपाल शर्मा, लाड़पुरा बाजार, कोटा (राजस्थान)

ट्रेन के प्लेटफार्म पर रूकते ही वो पाँच-छ: साल का बालक अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर ट्रेन के डिब्बे में खिड़की के पासवाली सीट पर जा बैठा। उस बच्चे की माँ, जो कि एक उच्च वर्ग की पढ़ी-लिखी महिला लगती थी, ने अपना सामान रखकर अपने आस-पास नजरें घुमाई, तो अपने बच्चे के पास बैठी एक उम्रदराज महिला, जो कि पहनावे से एक नीची जाति की लगती थी, को देखकर उसने अपने बच्चे को लगभग खीचते हुए कहा, "बताया था ना मैनें तुम्हें... जहां बोलूँ वहीं बैठना। चाहे जिसके पास बैठ जाता है।" फिर वहीं सामने वाली सीट पर बच्चे को अपने पास बैठा कर उसके कान में धीरे से कहा, "तू नहीं जानता, ये नीची जाति की औरत है।"

ये बात कही तो धीरे से गई थी, परन्तु फिर भी उस महिला के कानों तक पहुँच गई। लेकिन उसने कोई खास ध्यान नहीं दिया, शायद उसे अक्सर ऐसी बातें सुनने को मिलती थी। ट्रेन को चले कुछ ही देर हुई थी कि ट्रेन झटके के साथ किसी खराबी के कारण रूक गई। ट्रेन जहाँ रूकी वहाँ घना जंगल था। मई की तपती दोपहरी में गरमी के कारण सबका बुरा हाल था। इसी दौरान बच्चे को प्यास लगी तो उसने अपनी माँ से पानी माँगा। बच्चे की माँ बैग में पानी की बोतल ढूंढ़ने लगी लेकिन बोतल बैग में नहीं थी। जल्दबाजी में वो पानी की बोतल शायद घर पर ही भूल आई थी। अब जंगल में पानी मिल पाना जाहिरतौर पर नामुमकिन था। उसने बच्चे को समझाया तो बच्चा उस समय तो मान गया, लेकिन था तो बच्चा ही; कितनी देर तक बिना पानी के रह पाता!!

करीब एक घण्टा गुजरने के बाद वो पानी के लिए रोने लगा। वो महिला अपने को इस स्थिति में असहाय महसूस कर रही थी। आस-पास बैठे लोग ये सब देख रहे थे परन्तु कोई भी उसकी मदद नहीं करना चाहता था। क्योंकि किसी को भी पता नहीं था कि ट्रेन और कितनी देर वहीं जंगल में अटकी रहेगी। बच्चे को रोता देख उस उम्रदराज महिला से ज्यादा देर रूका नही गया और उसने अपनी पानी की बोतल थैले में से निकाल कर उस बच्चे की माँ की ओर बढ़ा दी। बच्चे की माँ पानी की बोतल देखकर असमंजस में थी। उसी समय उसकी मनःस्थिति को भांपकर वो उम्रदराज महिला धीमी आवाज में बोली, "बेटी, मैं भले ही नीची जाति से हैं पर ये पानी तो नहीं... " इस सबके बीच बच्चे ने बोतल हाथ में लेकर अपनी प्यास बुझा ली थी और वो खिड़की से बाहर देख रहा था। जबकि उसकी माँ अपनी ही नजरों में छोटा महसूस कर रही थी।
( समाप्त )


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