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दो तस्वीरें ज़िन्दगी की

Hindi Short Story

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दो तस्वीरें ज़िन्दगी की
Writer: गौतम कुमार सागर, वडोदरा, गुजरात


# दो तस्वीरें ज़िन्दगी की

Writer: गौतम कुमार सागर, वडोदरा, गुजरात

# पहली तस्वीर
"आज दो ही रोटियाँ खाऊँगा।"

सुलभ ने ऑफिस से घर आते ही बता दिया ताकि उसकी पत्नी पूर्वी जो तवे पर रोटियाँ सेंक रही थी, उसकी गणना सही बैठे। सुलभ की इस घोषणा के पहले ही उसकी चार रोटियाँ सेंकी जा चुकी थीं।

"आज दोपहर में बाहर खाये हो क्या?" पूर्वी ने अपनी सुराहीदार गर्दन पैतालीस डिग्री के कोण तक घुमाते हुए पूछा।

"तुमने जो लंच दिया था वही खाया..." उसने मुलायम स्वर में उत्तर दिया।

"देखो झूठ मत बोलो। बाहर कहाँ पार्टी की है?" पूर्वी ने गैस बर्नर ऑफ कर उससे दरयाफ्त पर उतारू हो गई।

"हाँ, आज बाहर का खाना खाया।" सुलभ ने सामान्य बातचीत के लहजे में बताया।

"क्यों? लंच तो था ना!"

सुलभ कुछ न बोला।

"तुम हमेशा झूठ बोलते हो।"

चुप!

"तुम मुझसे छुप-छुप कर काम करते हो।" पूर्वी के स्वर में क्रोध की चिंगारी थी।

"क्या छुपकर यार ... खाना ही तो खाया है। ऑफिस में बॉस ने इनसिस्ट किया तो क्या करता।"

"हाँ, हाँ ... एक फोन नहीं कर सकते थे कि दोपहर को पार्टी हो गई है, शाम को तुमलोग रूखा-सूखा बनाकर खा लेना। मैं बस एक दो रोटियाँ अहसान करने के लिए खा लूँगा।"

सुलभ ने अपना बचाव किया, "मैंने फोन किया था, तुम्हारा फोन बिज़ी था।"

पूर्वी को यह बात नागवार लगी। उसे लगा कि सुलभ उसे अप्रत्यक्ष रूप से कह रहा है कि, तुम मायके बात कर रही थी।

"वाह! एक और झूठ..." पूर्वी की आवाज़ का पिच हाई था।

"ओह! बाबा, मेरा फोन देखो इसमें कॉल हिस्टरी ..."

"तुम बहुत शातिर हो! खुद ही फोन करके तुरंत काट दिये होगे..."

"ओह! मैं कैसे समझाऊँ?" सुलभ व्यग्र हो गया।

दोनों के चार और कंटीले वाक्यों का आदान –प्रदान हुआ। "देखो, पूर्वी अब तुम कुछ ज्यादा ही बोल रही हो।" सुलभ ने भी ऊंचे स्वर में कहा।

"मैं ज्यादा बोल रही हूँ। गलती तुम करते हो और दोष मुझे? तुम हर बात मुझसे छुपाते हो, देखो अपने भाइयों को, देखो मेरे भाइयों को... वे सब कुछ अपनी बीवियों को बताते हैं। और तुम तो मुझे केवल एक दाई समझते हो, हर बात छुपा कर रखते हो।"

"नहीं खाना आज मुझे!!" सुलभ ने भी गुस्से में कह दिया।

"हाँ, हाँ, मत खाओ! केवल मैं खाना बनाती रहूँ और तुम बाहर ऐश करते रहो।"

सुलभ थका–हारा और पूर्वी के बोल–वचन से आहत चुपचाप कमरे में जाकर लाइट ऑफ करके लेट गया। थोड़ी देर बाद पूर्वी बगल में आकर लेट गई। कुछ देर दोनों के बीच खामोशी रही। खामोशी टूटी, "मुझे नेकलेस सेट खरीदना है..."

वह चुप रहा।

"सुन रहे हो!" पूर्वी ने ज़ोर से कहा।

"अरे यार, इतने रुपये कहाँ से आएंगे?"

"मेरे लिए ही तुम्हारे पास पैसे कब रहते हैं?"

"समझा करो, आज ही गिट्टू की स्कूलफी भरी है। अभी गाड़ी लेने की प्लानिंग कर रहा हूँ। उसमें डाउन पेमेंट करना होगा।"

वह बिदक गई। "हमेशा तुम मेरे लिए कोई न कोई बहाना बनाते हो। कल सुबह से मेरी तबीयत ठीक नहीं है, है चिंता तुमको?"

"क्या हुआ है..."

"क्या हुआ है, पूछते हो? कल से मुझे सर्दी हुई है।"

"तो दवा ला दूँगा... याद दिला देना।"

"सब मैं ही याद दिलवाऊँ ... "

"यार क्यों दिमाग खराब कर रही हो..."

फिर वो शुरू हो गई। "तुम लड़ाकू हो, तुम स्वार्थी हो। तुम केवल अपना ही भला देखते हो। दिन भर घर में मैं मरती रहूँ उसका कुछ नहीं।"

"तो क्या मैं आराम करता हूँ! घर का काम में भी हाथ बँटाता हूँ। देखो ... मैं अपने कपड़े खुद धोता हूँ। बाहर से, तेल से लेकर तरकारी तक एक-एक सामान मैं खरीद –खरीद कर लाता हूँ। और तुम मुझे ही..."

"तुम बेशरम हो..." पूर्वी अनायास चीखी। सुलभ का हाथ उठ गया, लेकिन खुद को रोक लिया। पूर्वी ज़ोर-ज़ोर से चीख रही थी। आस-पास के फ्लैट्स में आवाज़ जा रही थी। सुलभ उसे शांत रहने को कह रहा था लेकिन वह उसके खानदान का नाम लेकर गाली –गलौज पर उतर आई। सुलभ उसका मुंह बंद करने की कोशिश करना लगा। "चुप रहो, चीखो मत, आस –पास लोग क्या कहेंगे, प्लीज!" वह उसकी बांह पकड़ कर समझाने का प्रयास करने लगा।

"ओह! माँ... बचाओ..." वह और ज़ोर से चीखी, "तुम मुझे पीट रहे हो..."

"मैं पीट रहा हूँ तुमको?" हड़बड़ा कर उसने हाथ छोड़ दिया। फिर पूर्वी जोर-ज़ोर से रोने लगी, "हे भगवान! कैसे राक्षस पति से मेरा पाला पड़ गया है, यह मुझे जान से मारना चाहता है।"

तब तक गिट्टू भी आ गया। वह भी मम्मी को रोता देख कर रोने लगा। रात के दस बज चुके थे। सुलभ गुस्से और दुख से बाहर निकल गया। रात के ग्यारह बजे वह लौटा। एक बार फिर पूर्वी झगड़ी, "तुमने पिछली बार मुझे मारा था, देखो मेरा गर्दन अभी तक दुखता है।"

"मैंने कब मारा...मैंने केवल तुम्हें रोका था..."

"हाँ मारा था, मारा था, मारा था..."

"मारा नहीं, तुम्हें रोका था, तुम चीजों को फेंक रही थी गुस्से में।" सुलभ ने बेचारगी से कहा।

"बात मत बनाओ!" पूर्वी आपे से बाहर थी।

सुलभ उसे मनाने की कोशिश किया, "चलो अब छोड़ो गुस्सा ... माफ करो ... "

"नहीं ...तुम बहुत बुरे हो...जाहिल हो ..." वह बोली।

"ठीक है... मैं बुरा हूँ, प्लीज अब शांत हो जाओ, आस-पास में लोग क्या कहेंगे?"

पूर्वी ने क्रोध में उसे बेड रूम से बाहर कर दिया। वह ड्राइंग रूम में आकर सोफ़े पर लेट गया। रात का तापमान छह डिग्री था। सुलभ ठंडी से कांप रहा था। रात के बारह बजे वह उसे फिर मनाने गया ... उसके बगल में लेट कर उसे बाहों में भरना चाहा। वह तुनक गई; वह लौट गया। रात एक बजे! उसने देखा वह सो चुकी है। वह सोफ़े पर करवटें बदलता रहा। मच्छर भी थे। उसके आँखों से आँसू झरने लगे। उसे अपनी माँ की याद आई। जिसे वह फोन पर हर बार यहीं बताता है, वे लोग बहुत खुश हैं। वह किसे कहे...अपना दर्द। वह सोच रहा, काश! वह शादी न करता। हर महीने की सारी कमाई बीवी –बच्चों पर जाती है। ईएमआई पर मकान है। वह अपने लिए कभी कोई ब्रांडेड चीज़ नहीं खरीदता, लेकिन पत्नी की हर पसंदीदा चीज़ वह खरीद देता है। वह जूते भी मरम्मत करा कर पहन रहा है, कि जब तक चले तब तक क्यों खरीदा जाए। उसकी आलमारी में पाँच साल पुराने कपड़े भी हैं, लेकिन पत्नी एक साल में ही कपड़े खराब न भी हो तो भी उसकी छँटाई कर देती है। उसने न शराब को हाथ लगाया न सिगरेट। लेकिन फिर भी घर में आए दिन अशांति छाए रहती है। उसे याद आया कल उसका ऑफिस में प्रेसेंटेशन है। उसकी भी तैयारी करनी है। वह लैपटॉप खोलता है लेकिन मन अशांत है। वह लैपटॉप बंद कर देता है। रात के 2 बजे ... नींद उसकी आँखों से कोसों दूर है। उसका सिर घूम रहा है। उसने गुस्से में खाना भी तो नहीं खाया। रात के 3 बजे। वह सोने की कोशिश करता है। उसका सायनस बढ़ने लगा है ... वह थोड़ा विक्स मलता है। सुबह के चार बजे। सोसाइटी में एक दो गाड़ियों की आवाज सुनाई देती है। सुबह के पाँच बजे। ओह पूरी रात गुजर गई। वह मुंह ढाँपता है। वह सोने की दिशा बदलता है, वह पानी पीता है। उधर बेडरूम से पूर्वी की नाक बजने की आवाज आ रही है। सुबह के छह बजे वह अब उठकर पानी पीता है। पुरानी स्वेटर पहनता है और डेरी की ओर दूध लाने चल देता है। वह बाथरूम में नहाकर निकलता है। पूजा करता है ... पूजा के समय प्रार्थना गाते हुए उसके आँख से दो आँसू टपक पड़ते हैं। सुबह के आठ बजे वह दूध गरम करके ... दो ब्रेड उसमें डुबोकर खाता है। ऑफिस जाने की तैयारी में लग जाता है। आज नाश्ता या लंच मिलने की कोई उम्मीद नहीं। पत्नी सो कर उठ चुकी है लेकिन चेहरे पर तमतमाता हुआ भाव है। वह इस्तरी करके शर्ट पहनता है, पैंट पहनता है टाइ बैग में रखता है। वह ऑफिस के लिए निकल देता है। रात भर नींद न आने के कारण उसका सिर भारी है और वह बार –बार प्रसेंटेशन के पॉइंट्स भूल जा रहा है। उसे पता है वहाँ भी उसे डांट मिलने वाली है। वह बस में बैठे –बैठे किसी को याद करना चाह रहा है जिससे उसका मूड ठीक हो, माँ का चेहरा सामने आता है। वह आँख बंद किए-किए सपना देखता है, वह अपने गाँव जाएगा ... वहाँ खुश रहेगा ... फिर पुराने दिन लौट आएंगे। एक ज़ोर की चीख कान में सुनाई देती है जैसे वह आवाज़ उसकी पत्नी की हो, सामने एक लेडी खड़ी है वह गुर्रा रही है, "दिखता नहीं सीट के नीचे मैंने सामान रखा है!!"

वह उठ जाता है, अब कोई सीट नहीं है। वह बस के हैंगर पकड़ कर खड़ा हो जाता है, उसे पता है अभी एक घंटे वह खड़े –खड़े आँख मूँद कर भी सो सकता है ... कम- से कम अपने गाँव के, घर के सपने देख सकता है, अपनी माँ और बाबा का चेहरा देख सकता है।

"वहाँ सब ठीक हैं ना बेटा ... "

"हाँ माँ! एकदम फ़र्स्ट क्लास!!"
( continue ...)


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