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उपहार की गति

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उपहार की गति
Writer: सविता मिश्रा, हिल हॉउस, खंदारी


## उपहार की गति

Writer: सविता मिश्रा, हिल हॉउस, खंदारी

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हफ्तों सोचते रहने के बाद मैंने निर्णय लिया कि उपहार में देने के लिए साड़ी ही लूंगी। औरतों के लिए साड़ी से बढ़िया उपहार और कुछ हो भी तो नहीं सकता है। इसलिए मैं अपने मोहल्ले की मशहूर दुकान 'साड़ी महल' में जाने को घर से अकेले ही निकल पड़ी थी। दुकान तक पैदल आते-आते मेरे दिमाग में घनघोर युद्ध चला था। अपने निर्णय पर मेरा विचलित होना स्वाभाविक ही था। अभी तक जितनी भी साड़ियाँ अपने सगे-सम्बन्धियों को मैंने दी थी, तानों की बौझार ही वापसी में मिली थी। कभी उन्हें रंग नहीं भाया था, तो कभी डिजाइन। गलती उन सबकी नहीं हैं, बल्कि उपहार सूचक शब्द की है। इस शब्द में ही कोई विशेष औरा विद्यमान है, जिसके कारण प्राप्तकर्ता को भाता ही नहीं है। मुझे ही कहाँ भाता है किसी का दिया उपहार। लगता है जैसे किसी सेल से खरीदकर मुझे भेंट करके पीछा छुड़ा लिया गया हो। भतीजे की शादी में भेंट में आई थी दो साड़ियाँ, कोई अनाड़ी भी बता देता कि बस रिश्तों की भरपाई के लिए दे दी गयीं हैं। उपहार खोलते ही मेरे माथे पे बल पड़ गये थे। अब किस रिश्ते पर मैं उस बोझ को ठेलती! अतः दीपावली के उपलक्ष में मैंने उन दोनों साड़ियों को कामवाली के सुपुर्द कर दिया था। वह भी खुश, और मैं भी।

'साड़ी महल' के पास पहुँचकर मेरी सोच की तन्द्रा भंग हुई। बगल में ही पर्स एवं लगेज की दुकान दिखायी पड़ी, तो अनायास मैं उसमें घुस गयी। पसीने से बेज़ार हो चुकी थी, वहां ए.सी. के सामने खाली पड़े सोफे पर पसारकर बैठ गयी। दुकान दार दूसरे कस्टमर संग व्यस्त था। दुकान में दो लड़के और भी थे, लेकिन वे भी कस्टमर के साथ माथापच्ची कर रहे थे। शादी-ब्याह का सीजन चल रहा था। इस समय एक कस्टमर, दस कस्टमर के बराबर हो जाता है। उपहार बला ही ऐसी है। दो तो भौं चढ़े, न दो तो। अचानक मैं बुदबुदाई, "उपहार की गति, और मनुष्य की मति को भाप पाना बेहद दुष्कर कार्य है।" फिर खुद ही खुद से कहने लगी, "मैं भी! अपने दिल-दिमाग को कहाँ-कहाँ दौड़ा लेती हूँ।"

दोष मेरा नहीं है। बल्कि उपहार दूसरे से पाती हैं तो दिमाग चलता है, और खुद देती हैं तो दिल की सुनती है। लेकिन येन वक्त पर सब गड्डमड्ड हो जाता है। कहना फिर वही है कि उपहार बला ही ऐसी है।

तभी दुकान दार अपने काउंटर पर रसीद काटता हुआ कस्टमर से बोला, "आपने उपहार देने के लिए पहले जो सूटकेस पसंद किया था, उसके मुकाबले यह कहीं नहीं ठहरता है। जाने क्यों लेटेस्ट डिजाइन की लेते-लेते आप इस पुरानी सूटकेस पर आ गये। सस्ती भले है, लेकिन टिकाऊ और डिजाइन में उसका इससे कोई मेल नहीं है।"

"आप यही दे दो, हमें तो सीधे ढाई हजार सस्ती पड़ रही है यह। वैसे भी उपहारों की कीमत कोई नहीं करता है," कस्टमर बोल पड़ा था।

अपने दावे को सही साबित होते हुए सुनकर मैं खुद को शाबाशी देने लगी थी। गर्मी से राहत मिलते ही दुकान के शोकेस में लगे लगभग हर पर्स को उठा-उठाकर मैंने देखा, लेकिन कोई पसंद नहीं आया, कोई पसंद आया तो उसका दाम आसमान को छू रहा था। दुकान दार ने सामने आकर बोला, "मैडम किसके लिए चाहिए?"

"रिश्तेदारी में उपहार देना है," सुनकर वह हमें दुकान के कोने में ले जाकर बोला, "गिफ्ट के लिए बढ़िया हैं, सुंदर और सस्ते।"

वह इतने आत्मविश्वास से बोल रहा था, जैसे उसे भी पता है कि लोग उपहार में उसी कोने वाली रैक से चीजें खरीदेंगे, सामने लगे शोकेसों से नहीं। मैंने दो-चार उठाकर देखा, फिर च्चिक की आवाज निकालर वहां से निकलकर सीधे साड़ी महल के गेट पर पहुँच गयी। वैसे भी मेरा निर्णय साड़ी ही खरीदने का था। वह तो दिमाग ने उस दुकान में ले जाकर छोड़ दिया था। दरबान ने दरवाजा खोला और मैं सीधे काउंटर पर पहुंचकर बोली, "साड़ी देखनी है, उपहार में देने के लिए।"

उसने गणेश नाम पुकारकर अपने आदमी को बुलाया और बोला, "इन्हें दूसरी मंजिल पर लेकर जाओ।"

सेल्समैन सधे कदमों से भीड़ को चीरता हुआ दूसरी मंजिल पर पहुंचकर साड़ियों का गठ्ठर खोलते हुए बोला, "कितनी चाहिए, दस, पंद्रह या फिर ..."

"अरे नहीं भई, हमें सिर्फ दो साड़ी ही चाहिए, वह भी बढ़िया-सी।"

वह गठ्ठर को एक तरफ करके उठा, और रैक में से चार-पांच साड़ियाँ उठा लाया। खोलकर बोला, "इससे बढ़िया साड़ी, इतने कम दाम में कहीं भी नहीं मिलेगी!"

"तीन हजार की साड़ी, और कम दाम की!" मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखकर कहा था।

उसने उन्हीं में से दूसरी बार्डर वाली साड़ी खोलकर अपना रटा-रटाया प्रलोभन दोहराया। उस साड़ी को देखते ही मेरा मन तड़प उठा था। भतीजी की सगाई पर अपनी देवरानी को ऐसी ही एक स्काई-ब्लू कलर की साड़ी देकर आई थी। उस साड़ी पर हाथ फेरते हुए खो गयी थी मैं। वह साड़ी कई हाथों से होकर दीपावली की घूमती मिठाई सोनपापड़ी की तरह मुझ तक आ जाती तो गनीमत थी। लेकिन उसका हश्र बहुत बुरा हुआ था। सगाई में तो वह साड़ी उसने बड़े ठाट से अपने बदन पर लपेटी थी। देखकर मुझे लगा था, मेरा देना सफल रहा। लेकिन लगभग छः-सात महीने बाद जब मेरा गाँव जाना फिर से हुआ तो दूसरे दिन घर के बाहर लगे समरसेबल पर हाथ धुलते हुए मेरी नजर टैंक में पानी जाने वाले पाइप पर गयी, मैंने उसे एक कढ़ाईदार कपड़े से बंधा हुआ देखा। देखकर लगा कि पहचाना-सा बार्डर है, लेकिन इसका तनिक भी आभास नहीं हुआ कि वह बार्डर मेरे द्वारा दी गयी साड़ी का है। लेकिन घंटे-दो घंटे बाद कमरे में रखे बक्शे पर पड़े कपड़े पर नजर गयी तो तमाचा-सा पड़ा। ऐसी उम्मीद तो हरगिज नहीं थी कि इतनी खूबसूरत साड़ी का यह हस्र देखना पड़ेगा! उस साड़ी के कपड़े पर घूरती नजर डाल, मैंने उससे पूछ ही लिया, "यह साड़ी बदहाल क्यों पड़ी है, तह करके बक्से में रखना चाहिए न!" बस मेरा पूछना था कि साड़ी की इस दुर्गति की कहानी उस सगाई के दिन के जिक्र के साथ सामने आ गयी। कैसे वह साड़ी उस दिन चार घंटे पहनने के उपरांत फाड़कर दो फाड़ हुई। बक्से के हिस्से बीच का कपड़ा आया, और पाइप बांधने के हिस्से में बार्डर गया।

ये कहानी महज उस साड़ी की कहानी नहीं है। उपहार में दी-ली गयी लगभग हर चीज की कहानी कुछ ऐसी, तो कुछ वैसी ही रहती है। उपहारों की नियति में अपने भविष्य के प्रति चिंतनशील हो गोदाम का कोई अँधेरा कोना नसीब होता है, या फिर इस हाथ से उस हाथ तक डोलते रहना। किसी जाने-पहचाने या फिर अनजाने-बेगानों का जन्मदिन हो, शादी हो, सगाई हो, गृह-प्रवेश का समारोह हो, इन सबमें ही उपहारों के बीच धमाचौकड़ी होती है। और कार्यक्रम के बीतते ही फिर से वही अन्धकार से भरा कोना नसीब होता है। जैसा मुंह, वैसा तमाचा की नीति अपनाते हुए उपहारों की भीड़ में से, दबा-कुचला उपहार गड़े मुर्दे-सा उखाड़ लिया जाता है। या फिर सलीके से पटरी पर सजा हुआ उपहार दूसरे घर की दहलीज पर जाकर अपना ठिकाना तलाशता है। उपहारों का भाग्य, पाने वाले के मन पर निर्भर है कि वह शोभायमान होगा, या फिर अँधेरी कोठरी में पड़े-पड़े, अपनी किस्मत जागने की प्रतीक्षा पुनः करनी पड़ेगी। रखा हुआ उपहार देने से पहले तो दिमाग को इस वजह से भी कसरत करनी पड़ती है कि उपहार जिसने दिया है, घूमकर उस तक न पहुँच जाए। या फिर उसके सगे सम्बन्धियों द्वारा तो नहीं दिया गया है। कम से कम उपहारों के प्रति इतनी भलमनसाहत तो बरतनी ही पड़ती है। याददाश्त पर जोर अजमाइश करने के उपरांत दिमाग की हरी बत्ती जलती है। और उपहार खूबसूरती से आवरण-बद्ध हो बड़ी शान से बर्थ-डे, शादी में दमकते दूल्हा-दुल्हन या फिर गृह-प्रवेश के शुभ कार्यक्रमों में अपनी आहुति दे देता है।

सेल्समैन साड़ी दिखाता जाता और बोलता जाता, "आपको जो पसंद हो, उन्हें अलग करते जाइए।"

पसंद तो कई आ रही थीं, परन्तु क्या जिसे देनी है, उसे पसंद आएगी! मेरे सामने सबसे कठिन सवाल तो यह ही था। यही सोचते हुए पसंद आने वाली साड़ियों का अम्बार लग गया था, जबकि लेनी महज दो थी।

कभी-कभी मुझे लगता है कि उपहारों और लड़कियों में कोई खास अंतर नहीं है! दोनों का ही गंतव्य निर्धारित नहीं है। जैसे औरतें मायके से ससुराल, फिर पति के साथ घर में रहकर भी सालो-साल अपना असली ठिकाना ढूँढ़ती रहती हैं, वैसे ही उपहार भी अपने अंतिम पड़ाव के लिए तरसता रहता है। इस सन्दर्भ में स्वर्गीय अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की कविता 'ज्यों निकल कर बादलों की गोद से, थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी' की सी ही स्थिति है। किसी एक की देहरी के भीतर ठहराना होता ही नहीं। जब तक ठिकाना कामवाली बाई, ड्राइवर, स्वीपर, प्रेसवाला या फिर सिक्योरटी गार्ड का घर न मिल जाए। वैसे अंतिम पडाव उनका घर भी नहीं होता है। वे भी उन उपहारों को बड़े प्रेम से अपनी बहन-बेटी को भेंट कर देते हैं। यानि कि बेचारा उपहार खुद ही इस हाथ से उस हाथ तक पहुँचते-पहुँचते लोक लज्जित होकर धूमिल हो जाए, तब तक हारिऔध साहब की कविता ही विचारता रहता होगा।

देवरानी ने साड़ी की जो कहानी बयां की थी, उसे सुनकर मैं क्रोध से भर गयी थी। क्रोध के झूले पर सवार हो जाने कहाँ-से-कहाँ तक विचरण कर आयी थी। विचारो की उग्रता और नम्रता के बीच भी क्रोध के झूले पर झूलते हुए, अब मेरे सामने कही उनकी हर एक बात पेंग भरने का काम कर रही थी, कि तभी देवरानी की बिटिया ने आकर कहा, "चाची, चाय।"

"हंह! हाँ चाय... इस समय इसकी सख्त जरूरत थी।" मैं झट से बोल पड़ी थी।

"दीदी, चाय मीठी है?"

"तुम्हारी चाय ही बस मीठी है," फिर मैं अपने को सामान्य करते हुए बोली, "वैसे मैं कम मीठी पीती हूँ।"

देवरानी ने कहा, "पी लीजिए, शाम को कम मीठी बना दूंगी।"

"और सुनाओ?" मैंने अपने क्रोध को खदेड़ने का असम्भव-सा प्रयास किया था।

"सब ठीक ठाक है।" वह गाँव से लेकर बच्चों तक का सब हालचाल बताती जा रही थी, लेकिन मेरी सुई साड़ी के बार्डर पर ही अटक के रह गयी थी। किसी भी चीज को यूँ ही बर्बाद कर देने के पक्ष में मैं कभी नहीं रही। चाहे उपहार में दी हुई चीज हो, या खुद से खरीदी हुई हो। यदि सगाई में इसके भाई ने टोक दिया था कि 'तुम्हारी साड़ी नीचे से सुकुड़ी हुई थी, बड़ी खराब लग रही थी,' तो घर में ही पहनकर पैसा वसूल कर लेती। यदि वह भी नहीं करना चाहती थी तो किसी और को दे देती। लेकिन नहीं, ये तो लॉट साहिबा हैं। साड़ी कितनी भी कीमती क्यों न हो इनको तो कोई फर्क नहीं पड़ता, आखिर उपहार में जो मिली थी। ऐसो के बारे में ही शायद कहा गया कि 'घर में खाने को नहीं दाने, अम्मा चली भुजाने'। अरे, उसे काटकर बेटियों के लिए स्कर्ट, फ्राक या फिर कुर्ती ही बनवा लेती। लेकिन नहीं, ये तो ठहरी धन्नासेठ। इतना सुंदर कढ़ाईदार बार्डर था उसका..!

"चाची, चाय का कप।" बिटिया ने कप पकड़ते हुए कहा, तब मैंने अपने क्रोध के झूले को रोकने की कोशिश की थी। कैसे चाय का कप से अपनी पकड़ छोड़ते हुए, मेरे मन की हलचल उमड़कर बाहर आ गयी थी। देवरानी की राम कहानी के बीच ही उसे रोककर मैं बोल पड़ी थी, "साड़ी के बार्डर का इस्तेमाल कुछ बनाकर उसकी सजावट करने में कर लेती! अनारकली सूट बनवाकर उसके घेर में ही लगवा लेती! कितना सुंदर दीखता। लेकिन नहीं, तुमने तो उपहार में मिली चीज की कीमत दो कौड़ी की भी न धरी। उसका इस्तेमाल पानी के पाइप बांधने में कर लिया!"

वह सुनते ही फट पड़ी थी, "दीदी, आप अभी भी वही अटकी हैं। अरे आपने मुझे दे दिया था, अब मैं उसे पहनू या फेंकू! इससे आपको क्या?" उसका कहा यह वाक्य बबूल के कांटे-सा अब तक चुभा हुआ है। लेकिन उस समय बात बढ़ाना मुझे ठीक नहीं लगा। दो दिन का जाना होता है, क्योंकर आग में घी डालूं! अपने क्रोध को रोकते हुए भी मैंने निर्णायक तमाचा मार ही दिया था, "आगे के लिए सीख दे दिया तुमने। गलती तो सच में मेरी ही है, मैंने ही अपनी दरियादिली के कारण कमजोर गाल पर जोर का तमाचा जो मार दिया था। बुजुर्गवार ऐसे ही थोड़ी कह गये हैं कि 'जैसा गाल हो, देखभाल करके तमाचा वैसा ही मारना चाहिए'। दुकान दार ने भी मुझे बहुत सही सलाह दिया था, लेकिन मुझे ही शौक चर्राया था की देवरानी-जेठानी के बीच सस्ती-सी साड़ी पहनकर, तुम हीन भावना का शिकार क्यों हो!"

'दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते' कहावत के बजाय कुछ ऐसी कहावत हो कि 'दान में मिले चीजों की कीमत हमेशा कम ही आंकी जाती है।' अब जेठानी की बिटिया की शादी की ही बात को ले लो! कितने मन से मैंने उसके लिए साड़ी खरीदी थी, लेकिन जेठानी ने साड़ी देखकर मेरे मुंह पर ही कह दिया था कि बाहर पहनने लायक साड़ी नहीं है। दो चार दिन घर में ही पहनकर दे देना कामवाली को। वह खुद तो सेल से सौ-दो सौ की खरीदी साड़ियाँ हम सबको भेंट करती हैं, जिसका कभी आंचल तिरछा रहता है, तो किसी में रफ्फू हुआ रहता है। लेकिन दूसरों को बोलने से नहीं चूकती हैं, भला चूकें भी क्यों! कोई दूसरे पर ऊँगली उठाने से कभी चूका है भला, कि वो चूकतीं।

"मैडम! मैडम!" उस आवाज से चौक के 'हुंह...' किया था कि वह बोला, "मैडम जी, आपके सामने साड़ियों का अम्बार लगा दिया, लेकिन दो घंटे खर्च करने के बाद भी आपको एक भी साड़ी पसंद नहीं आई। आप सोच ज्यादा रही हैं। कहिए तो सस्ती साड़ियाँ, लोग जो अक्सर देने-पाने के लिए ही ले जाया करते हैं, वे दिखाऊं?"

"हंह, हाँ दिखाओ, वही दिखाओ।"

"आप ठंडा पानी पीजिए, तब तक मैं निकलवाता हूँ।"

ठंडा पानी पीने के बाद तन-मन को राहत पहुँची थी, लगा जैसे तपती दुपहरी में ठंडी बयार बह आई हो। बंद होती घड़ी की सुई जैसे थोड़ा आगे होती है, फिर पीछे होकर अटक जाती है, वैसे ही मेरे साथ हो रहा था। मेरी सोच आगे को फिर बढ़ चली थी। उपहारों के इस आधुनिक चलन में किसी सम्बन्धी या फिर परिचितों को लाभ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन इन व्यपारियों को अधाधुंध लाभ होता है। इनकी दुकान में पड़ा पुराना-धुराना उपहार भी निकल जाता है। देने वाले को सस्ता उपहार चाहिए होता है, और बेचने वाले को होते नुकसान को फायदे में बदलने का सूत्र हाथ लग जाता है। डीफेक्टेट, पुराना-धुराना गिफ्ट भी चमचमाते रैपर में लिपटकर मुस्कुराने लग पड़ता है।

दुकान दार सस्ती साड़ियों वाला बंडल ले आकर रखता जा रहा था और मैं सोच रही थी कि कह तो दिया लेकिन..!

भीतर से आवाज आई, "लेकिन-वेकिन न सोच, तुम्हें भी तो मिसेज वर्मा ने, जो कि पारिवारिक मित्रता का दम्भ भरती हैं, उन्होंने कैसी-सी साड़ी भेंट की थीं। बिना पहनकर देखे ही तुमने उसे निधि की शादी में पहनने के लिए अटैची में रख लिया था।"

अंदर की आवाज आते ही उस दिन की घटना चित्रवत सामने आ गयी थी। ट्रेन के पूरे आठ घंटे लेट होने के कारण जब जेठानी के यहाँ पहुँची थी। लगभग सभी लोग आधे- अधूरे तैयार हो गये थे। जल्दी-जल्दी बाथरूम में जाकर मैंने हाथ-मुंह धुला था । अटैची खोलकर मुस्कुराते हुए मिसेज वर्मा द्वारा दी गई साड़ी पहनने के लिए निकाल लिया था। मेरी अलमारी में पड़ी ढेरों साड़ियों में से वह बिलकुल ही अलग रंग की थी। इसलिए मेरी नजरें उसी पर जम गयी थीं। और मैंने हौले से बिना सोचे-विचारे उसे ही अटैची में पैक कर लिया था। उसके मैचिंग का सब कुछ पहनने के बाद सबसे अंत में मैंने वह साड़ी बड़े गुमान से खोली थी। देवरानी बोली थी, 'बहुत सुंदर साड़ी है दीदी! आप पर खूब फबेगी। ' मैं सुनकर फूलकर कुप्पा हो गयी थी अपने निर्णय पर।

खूबसूरत चौड़े बार्डर की लिली के फूल जैसे रंग वाली वह साड़ी, प्लेन होकर भी बेहद खूबसूरत लग रही थी। मैं बड़े प्रफ्फुलित भाव से उसे पहनने लगी थी। नीचे का भाग पहनते ही थोड़ी बेढंगी-सी लगी, लेकिन मुझे लगा इसमें मैंने ब्लाउज नहीं कटवाया है, शायद इसलिए यह ऐसी है। फिर मैंने उसे आगे से ज्यादा सा फोल्ड करके पहनने की कोशिश की। लेकिन उसका नीचे का बार्डर दो प्लेट के पहले ही खत्म हो गया। ऊपरी सिरे का बार्डर भी बेतरबी से लगा हुआ था। और प्लेट्स भी बामुश्किल तीन से साढ़े तीन बन पा रही थी उसमें। खीज-सी हो आई खुद पर, और बिन जाने-पहने ही कपड़े रखूं अटैची में!! मन तुरंत ही फ्यूज होते बल्ब की तरह फक्क हो गया था। मैचिंग चूड़ियाँ, ब्लाउज पहनने की मेहनत पानी में बह गयी थी। बिंदी, नेलपॉलिश अब मुझको ही मुंह चिढ़ा रहे थे। बहुत क्रोध आया खुद पर, और उससे अधिक मिसेज वर्मा पर। सब कुछ उतारना फिर सहेजकर अटैची में रखना, बड़ा भारी जान पड़ा था। जल्दी से दूसरी साड़ी निकालने का सोचा। लेकिन कार्यक्रम के मुताबिक गिनती की साड़ी ही ले गयी थी। मन मारकर दूसरी साड़ी, जो सुबह विदाई के वक्त पहननी थी, उसे निकाल लिया। रात के लिए सिल्क की साड़ी ले गयी थी, उस सादी साड़ी को जयमाल के वक्त पहनना मूर्खता-सी लगी। जल्दी-जल्दी उसकी मैचिंग चूड़ियाँ-कंगन पहने। एक तरह से मुझे तैयार होने में दुबारा मेहनत के साथ साथ समय भी देना पड़ा था। ऊपर से सबके व्यंग्य बाण भी झेलने पड़े थे, सो अलग।

जब जेठानी ने व्यंग्य कसा था, 'चार लोगों को तैयार कर रही हो क्या?' सुनकर अपनत्व का ढोंग करने वाली मिसेज वर्मा पर क्रोध निकल जाता, लेकिन ऐसी जगह खड़ी थी कि बड़बड़ाकर क्रोध निकाल भी नहीं सकती थी। अतः मेरे अंदर भभकी क्रोध की आग मेरे चेहरे पर छा गयी थी। ऐसी दो कौड़ी की डीफेक्टेट साड़ी तो आजकल कोई अपने नौकरों को भी नहीं देता है। अरे नहीं देतीं मिसेज वर्मा! कोई जबरदस्ती थी क्या? कहीं ऐसा तो नहीं, कि मैंने उनकी बेटे की शादी में उनकी बहू को अपनी बहू-सी मानकर सोने की अंगूठी देदी थी, इसलिए! दो दिन बाद सम्बन्ध निभाने के चक्कर में उसी वजह से शायद वह साड़ी, मिठाई-और सगुन की कचौड़ी-मठरी का डिब्बा घर आकर बड़े प्रेम से दे गई थीं!

"मैडम, आप बार-बार कहीं खो जा रही हैं। आपके साथ आए ग्राहक साड़ियाँ खरीदकर चले भी गये। और आपके बाद भी आए ग्राहकों को मैंने साड़ियाँ पसंद करवा दी। आँख मूद करके इनमें से ही साड़ियाँ ले लीजिए, दो-चार जो भी लेनी हैं। बहुत अधिक सोच विचार मत करिए। लोग मेरे यहाँ से देने-लेने के लिए हमेशा यही साड़ियाँ लेकर जाते हैं।"

मैंने तपाक से कहा, "डिफेक्टेड साड़ियाँ तो नहीं हैं न! पता चला देने के बाद, पाने वाले के सामने मेरी नाक कट जाए, और रिश्ते में खटास पड़े, वो अलग।"

"अरे नहीं मैडम, बहुत बढ़िया साड़ियाँ हैं। कलर भी देखिए, कितने लुभावने हैं, और दाम भी।"

"ठीक है, पैक कर दीजिए पंद्रह-बीस साड़ियाँ। अच्छी तरह चेक करके दीजियेगा, आपकी वजह से रिश्तेदारी में मेरी भद्द नहीं पिटनी चाहिए।"

"आप तो दो साड़ी लेना चाह रही थीं!"

"जब उसी दो के दाम में कुछ और रूपये लगाकर सब रिश्तेदारों के लिए हो जाएं, तो क्यों नहीं सबको ही खुश किया जाय। उपहार पाने में किसे ख़ुशी नहीं होती है भला! लेकिन जो बच जाएगी, वे लौटा जाउंगी। ये शर्त मंजूर हो तभी देना।"

"बिलकुल मैडम, उसकी चिंता नहीं करिए, वैसे उपहार में दी हुई चीजों की गति तो आप भी जानती ही हैं," कहते ही उसके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान तैर उठी थी। मुझे भी लगा कि उसने इन तीन घंटो में मेरी दुखती रग पकड़ ली है शायद! रसीद बनाते हुए वह बोला, "मैडम, आप कुछ ठंडा लीजिए। बहुत देर से साड़ियाँ देख रही हैं, थक गयी होंगी। या कहिए तो कॉफ़ी मगवाऊं! तब तक मैं इन साड़ियों को गिफ्ट पैक करवाता हूँ।"

"हाँ, थक तो गयी हूँ, दिमाग को भी ताजगी चाहिए। ऐसा करिए कि आप कॉफ़ी पिलवा ही दीजिए।"
( End )


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