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हुरमा

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हुरमा
Writer: संजय जनागल, लालगढ़, बीकानेर, राजस्थान


## हुरमा

Writer: संजय जनागल, लालगढ़, बीकानेर, राजस्थान

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कई बार यह ख़्याल आया कि हुरमा भी किसी का नाम हो सकता है? और अगर है तो इसका मतलब क्या है? क्यों रखा होगा किसी ने यह नाम? क्या इस नाम के अलावा कोई और नाम नहीं हो सकता था? आज यह ख़्याल शिद्दत से मेरे ज़हन में उभर रहे थे। और यह भी सच है कि हर नाम के पीछे कोई न कोई वजह होती है। ऐसी ही कोई वजह इस नाम के साथ भी होगी ही। इन विचारों में गुम था कि अचानक रेल्वे स्टेशन का मुख्य द्वार दिखा और मैंने गाड़ी रोकी और स्टैण्ड पर जमा करवाई; और दौड़ता हुआ ट्रेन में जा बैठा। ट्रांसफर हुए अभी एक महीना ही हुआ है।

सर्दियों का समय है। सुबह जल्दी उठना और दौड़ते-भागते स्टेशन पहुंचना और रोजाना अप-डाउन करने वालों के ग्रुप में शामिल हो जाना, यही दिनचर्या बन गयी थी। कुछ दिन तो ट्रेन का सफर बोझिल लगा, लेकिन फिर जैसा कि हमेशा होता आया है कि माहौल में ढल गया। या यूं कहूं कि एक रूटीन बन गया। अलग-अलग ऑफिसों में, स्कूलों में काम करने वाले लोग एक ही डिब्बे में बैठते, हंसी-मजाक और गपशप में कब समय बीत जाता मालूम ही नहीं चलता।

कुछ दिन से देख रहा था कि ट्रेन में एक अधेड़ औरत सबके आगे हाथ फैलाती और चुपचाप खड़ी रहती। मैंने समझा शायद गुंगी है। और फिर सभी अपने हिसाब से कुछ-न कुछ पांच-दस रूपये उसके हाथ में रख देते, हमारे एक दोस्त ने मना भी किया कि अगर रोज इसको यूं ही पैसे देते रहे तो इसका भी रूटीन बन जायेगा। लेकिन हम सबने उसकी बात सुनी-अनसुनी कर दी। समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा। और हम लोगों का रूटीन भी वहीं बना रहा। वो अधेड़ औरत भी प्रतिदिन आती लेकिन बदलाव यह हुआ कि धीरे-धीरे मेरे दूसरे साथियों ने उसे पैसा देना बंद कर दिया, लेकिन मालूम नहीं मैं उसको प्रतिदिन दस रूपये देने का क्रम रोक नहीं पाया। मेरे दोस्त मुझे भी उलाहना देते लेकिन मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया। वो जब भी मांगने के लिए हाथ आगे करती तो उसके हाथ पर गुदा हुआ एक नाम नजर आता, लेकिन मैं प्रथम अक्षर ही पढ़ पाता। और अगले ही पल वह रूपये लेकर आगे बढ़ जाती। प्रथम अक्षर 'हु' ही पढ़ पाया था मैं। कभी उसे बोलते नहीं सुना। इसी ख़्याल से कि वो गुंगी है उसको पूछना मुनासिब नहीं समझा। मेरी जिज्ञासा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी कि इस 'हु' के आगे के अक्षर क्या हैं?

आज ट्रेन में बहुत भीड़ थी। त्यौंहार के कारण काफी-कर्मचारी अवकाश पर जा रहे थे और अन्य यात्री भी काफी तादाद में थे। इस आवाजाही की वजह से भीड़ कुछ आम दिनों से ज्यादा थी। मुझे बैठने के लिए जगह मिल गयी। थोड़ी देर बाद लगा कि यहां बैठने से तो दूसरे डिब्बे में खड़ा रहना ज्यादा मुनासिब था, क्योंकि पास ही एक शराबी बैठा हुआ था। उसके मुंह से निकलती शराब की बू मुझे विचलित कर रही थी। मेरे दूसरे दोस्तों ने भी इशारा किया कि दूसरे डिब्बा में चला जाए। फिर सोचा, भीड़ इतनी ज्यादा है कि अब तो उस डिब्बे में खड़े रहने की जगह भी मिलना मुश्किल हो चुका होगा। यहीं ठीक है, हम सबने बदबू से बचने के लिए मुंह पर रूमाल बांध लिया और चुपचाप बैठे रहे।

इतनी बदबू, उस पर फिर कोई बीड़ी भी पीये तो यूं लगता है कि ऐसे यात्रियों को ट्रेन में बैठाना ही नहीं चाहिए। ट्रेन में इतनी जगह लिखा होता है कि आम जगह पर धूम्रपान निषेध है। जुर्माना भी लगाया जायेगा। लेकिन जुर्माना कौन लगायेगा, और कौन वसूलेगा? इतनी भीड़ में कौन आकर चैकिंग करेगा एक-एक की; असंभव सा लगता है। कभी-कभी तो ये भी लगता है कि आखिर इतनी आबादी है तो देश में ज्यादा ट्रेनें क्यों नहीं चलाई जाती! एक ही ट्रेन है क्या यहां से आने- जाने वालों के लिए! क्यों एक ही ट्रेन में इतनी भीड़ करते हैं। आखिर रेलवे से जो कमाई हो रही है वो कहां जा रही है? ट्रेनों की संख्या क्यों नहीं बढ़ाई जा रही है? मन इन्हीं उलझनों और सवालों में डूबा हुआ था कि इतनी भीड़ में भी वो हाथ दिखाई दिया जिसको सिर्फ हाथ देखकर ही मैं पहचान सकता हूं। मुझे लगा कि इतनी भीड़ होने के बावजूद वो हाथ आज खाली ही रहेगा। आज मेरे दिमाग में भी एक अजीब सी खलल थी कि सोचा, मैं भी आज उसे भीख नहीं दूंगा। देखता हूं आज कौन देता है?

वो हाथ धीरे-धीरे लोगों के चेहरे के आगे से गुजरने लगा; देख रहा था कि चेहरे या तो झुक जाते या दूसरी ओर देखने का अभिनय करने लगते, ठीक उसी तरह जैसे किसी चलते खिलौने से चाबी निकाल ली जाये और वो खिलौना बे-जान हो जाता है। अचानक क्या देखता हूं कि वो हाथ उस शराबी के आगे पहुंचा तो शराबी ने वो हाथ पकड़ लिया। उस औरत ने हाथ को अपनी ओर खींचने की कोशिश की लेकिन उस शराबी ने उसका हाथ जकड़ लिया था। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। शराबी भयंकर नशे में था और ऐसा लगा कि उस पर वासना का भूत भी सवार हो रहा था। वह उस औरत को अपनी ओर खींचने लगा। तभी उस औरत ने दूसरे हाथ से एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ा और उसके मुंह पर थूक दिया। तमाचा इतना तेज था कि उस डिब्बे में मौजूद सभी मर्दों को अपने गाल पर महसूस हुआ। तमाचा लगाने के साथ ही वह जोर से चिल्लाई। आज पहली बार उसकी आवाज सुनी। वह बोली, "अभी इस हुरमा में इतनी ताकत है कि तेरे जैसे कई नामर्दों को धूल चटा सकती हूं।"

अच्छा तो 'हु' यानि हुरमा। यह रहस्य खुला। हुरमा नाम है। "तेरे जैसे भेड़ियों को मैंने खूब ठीक किया हुआ है," इतना कहकर हुरमा ने उसके बाल पकड़े और उसको नीचे पटका और उसकी पिटाई शुरू की, साथ में वो गाली-गलौच भी कर रही थी। शराबी का नशा हिरन हो चुका था, और वो मौका देखकर भाग छूटा। आज मेरे मन में हुरमा के प्रति एक असीम श्रद्धा उत्पन्न हुई। आज मुझे वो भिखारिन नहीं सिर्फ एक मजबूत औरत दिखाई दी। वो मजबूत औरत जो समाज की दूसरी कमजोर औरतों को एक नई राह दिखा सकती है। मैं मन-ही मन हुरमा को सैल्यूट कर रहा था।

गाड़ी एक स्टेशन पर रूकी। हुरमा दरवाजे की तरफ जाने लगी। मैं भी यंत्रवत उसके पीछे-पीछे भीड़ में से रास्ता बनाते हुए जा पहुंचा। हालाँकि यह स्टेशन मेरा गंतव्य नहीं था। लेकिन पता नहीं हुरमा के साथ मैं भी प्लेटफार्म पर था। मैंने आगे बढ़ती हुई हुरमा को आवाज लगाई, "हुरमा जी!" उसने पीछे मुड़कर देखा और उसके कदम वहीं ठहर गये। मैंने अपनी जेब से कुछ रूपये निकाले। आज दस-बीस के मोह से बहुत ऊपर उठ चुका था। हुरमा के प्रति मेरी यह श्रद्धा असीम थी। मैंने हुरमा के पांव छुए, देखा हुरमा के आंखों में आंसू थे। मैं आज फिर सोच रहा था कि थोड़ी देर पहले एक बिगड़े मर्द को ठीक करने वाली मार्शल लेडी के रूप में थी और अब एक ममतामयी मां के रूप में।
( समाप्त )


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