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मेरी पत्नी की डायरी

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मेरी पत्नी की डायरी
Writer: अजय कुमार गुप्ता, बोईसर, पालघर, महाराष्ट्र


## मेरी पत्नी की डायरी

Writer: अजय कुमार गुप्ता, बोईसर, पालघर, महाराष्ट्र

यूँ तो किसी की व्यक्तिगत डायरी में झाँकना मुझे पसंद नहीं, पर डायरी अगर अपनी पत्नी की हो और स्वयं ही उसे लिखने के लिए कहा हो तो अपवाद हो ही सकता है। परन्तु यूँ पन्ने पलटते देखना शायद महक को पसंद ना आया हो, इसलिए एक पल के लिए उसने मुझे देखा और शायद कुछ करने के बहाने कहीं निकल गयी। महक के लिए यह वर्ष के अप्रैल-मई माह काफी मानसिक कष्ट में बीते थे। डिप्रेशन और एंग्जायटी, ये दो शब्द हमने बहुत बार सुन लिए थे इसके चलते, डॉक्टर के भी चक्कर लगने लगे थे। डॉक्टर के पास भी इस कोविड समय में नींद और बीपी की दवा देने के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं था। पर यह तो नींद से जाने वाले रोग नहीं था। फलतः कुछ उपयोगी नहीं सिद्ध हो रहा था। इधर-उधर की सलाह भी चलने लगी थी। कभी योग के आसन किये जाने लगे, तो कभी किसी बाबा जी के प्रवचन; सब चलने लगे थे। सलाह में सबने कुछ-ना कुछ करने को कहा, और जितना हो सका उतना हमने आजमाया। परन्तु तत्काल कोई आराम नज़र नहीं दिख रहा था। ऐसे भी, प्यास लगने के बाद कुआँ खोदना कहाँ सफल रहा है। मैंने भी डायरी लिखने की सलाह दे डाली थी। सोचा था डायरी से मन का बोझ हल्का हो जायेगा।

हाँ, महक एक आज्ञाकारी शिष्या के समान सब कर रही थी। महक के लिए ऐसे हालत में पहुँचना शायद ही किसी को गले से उतर रहा था। सबने उसके जिन्दादिली को ही देखा था। बैंक के काम हो या घर के काम, वह बड़ी तन्मयता से पूरा कर देती। हमेशा संघर्ष सी करती और पार हो जाती। परन्तु पिछले अप्रैल माह में दीदी के कोविड पॉजिटिव होना और फिर अस्पताल में भर्ती होना, उसको पूरा बदल दिया। उसका पूरा ध्यान दीदी के समाचार पर रहती। बैंक में भी सब अस्त व्यस्त हो रहा था। आवश्यक कार्यालयों की सूची में बैंक आता था, तो बैंक तो खुलना ही था और आपको जाना ही था।

दीदी को ४५ दिन तक अस्पताल में ही रहना पड़ा। पहले ऑक्सीजन पर आई. सी. यू. में ३० दिन तक लड़ना पड़ा। कई ऐसे दवाई दी गयी जिसके नाम भी बोले नहीं जा रहे थे और बाजार में मिल भी नहीं रहे थे। वह समय सहीं में बड़ी मुश्किल से बीते। डॉक्टर ने जब आई. सी. यू. से बाहर किया तब जा कर कुछ राहत मिली। महक उस दिन से ही हमें परेशान नजर आने लगी। हो सकता हो, हमारा ध्यान भी महक पर अभी तक गया ही नहीं था। अस्पताल से केवल डॉक्टर ही बात करते थे। पहले दिन जब अस्पताल से कोई इंजेक्शन के लिए बोला गया था और बहुत ढूँढने पर जब हमें कहीं नहीं मिला तो हम हार कर अस्पताल से बोले थे कि यह कहीं नहीं मिल रहा है, आप ही इंतजाम कर दे तो... महक ने अस्पताल में आखिरी बार बात की थी।

४५, ००० का कोई इंजेक्शन था और डॉक्टर ने कहा था की उसे उसके मैंने जमेंट से बात करनी होगी क्योंकि यह अस्पताल में भी बहुत लिमिटेड ही है। हमने उसकी कीमत जो हो, देने किये हामी भर दी थी। इंजेक्शन लगते हुए एक विडियो भी बाद में शेयर किया गया था। ताकि हमें विश्वास रहे कि इंजेक्शन दे दिया गया है।

"महक अभी तो सब ठीक हो गया है, शी इज आउट ऑफ़ डेंजर।" ३० दिन के बाद जब मैंने कहा था तब उसने केवल "हाँ" कहकर सर हिला दिया था। पर पता चला वह इतने दिन से नहीं सोयी थी, बैंक भी बस जा रही थी।

अब तो केवल मुंबई लोकल में १० लोग ही रहते थे, वह भी काफी दूर-दूर; सब चेहरे ढके हुए। जैसे ऑक्सीजन पाइप वाला मास्क सबके चेहरे पर लगे हुए हों। ऑक्सीजन मास्क उसने दीदी को इंजेक्शन लगने वाले विडियो में देखा था। सारे स्टेशन सुनसान, केवल ऑक्सीजन पाइप वाला मास्क वाले लोग इधर-उधर जा रहे है। अगर आपने मास्क हटाया तो दूसरे पल ही आप मरे, तडप-तडप कर। टीवी पर भी यही दिख रहा था। कहीं ऑक्सीजन नहीं मिल रहा था। ऑक्सीजन के सिलिंडर भरने के लिए लम्बी-लम्बी लाइन लगी थी, तो नदी लाशों से पट गयी थी। लोग चिल्ला रहे थे किसी के पिता मर गए तो किसी के बच्चे। सब जगह सभी परेशान जरा सा कोई आवाज आती, वह चौंक जाती। आई. सी. यू. से बाहर आने के बाद दीदी को फ़ोन मिल गया था, पर दीदी से उसने बात नहीं की थी। शायद उसका सामना करने की हिम्मत अभी नहीं थी। इधर उसकी हालत देखते हुए मैं पास के अस्पताल में ले गया और उसने कुछ नींद की दवा दे दी; और क्या इलाज है? उसने १ हफ्ते भी दवा नहीं खायी। ऐसे सोते रहना कोई इलाज है क्या? बाहर निकलेंगे, दवा नहीं लेंगे। बैंक भी महक ने लगभग भुला दिया था, शायद २ हफ्ते नहीं गयी थी वह।

"तुमने चाय नहीं बनायीं!' मैंने उसे बुलाने के लिए कहा था। उसने कोई जवाब नहीं दिया और मैं भी डायरी के पन्ने पलटने लगा:

२८/०५/२०२१ (शुक्रवार)
आज सुबह उठकर योग करने की कोशिश की, मगर ध्यान साँसों पर कहा जाती है। जब भी साँस पर ध्यान जाता है ऐसा लगता है कि कोई नकाब (मास्क) मेरी तरफ आ रहा है और मेरे चेहरे के चारों और लिपट जा रहा है। मैं और जोर-जोर से साँस लेती हूँ पर साँस नहीं ले पा रही हूँ। विजय ने ही नाश्ता बनाया। मूंग के स्प्राउट्स को बस नाम के लिए छौंक दिए थे, सब कच्चे थे। इनके लॉजिक, स्प्राउट्स कच्चे ही खाने चाहिये; टमाटर, प्याज और कच्चे तेल के साथ। सभी को इम्युनिटी बढ़ानी है। हम सब अभी तक जहर खाए क्या, एक दिन में अमर हो जायेंगे!! मुझे बैंक जाने के लिए कह रहे थे, पर मुझे अब कहीं नहीं जाना। पूरे रास्ते में केवल नकाब ही नज़र आते हैं। आदमी कहाँ हैं? सब मर गए है। दो नकाब उतरे और तीन चढ़े। हर जगह नकाब। बैंक में भी सब नकाब, अमित (हेल्पर) को तो नकाब और हाथ धोने के लिए ही लगा दिया है। फिर भी लोग है कि खासी आएगी तो उल्टा नकाब हटा देंगे। किसको समझाया जाए? नीलम (केशियर) तो चिल्लाती रहती है, "जब ए. टी. एम. में रुपया है तो क्यों अन्दर से निकालना है!" हम तो सेवा के लिए बैठे है; न रुपया दो, तो विडियो बना कर सोशल मीडिया में दिखायेंगे कि बैंक वाले कोई काम नहीं करते।

अच्छा है कि बैंक वाले अब फ़ोन नहीं कर रहे, नहीं तो उन्होंने नींद की गोली के बाद भी सोने नहीं दिया। सब मजबूर है, और हम मजदूर।

अपना झोला लटकाए यह तो निकल लिए। बस अपनी कार उठाये और पहुँच गए बिजली बनाने। आम जनता से सामना नहीं होता न इनका। बस यह और इनके यार। सुकून रहता है कोई सर चाटने वाला नहीं है। बस जाना है क्योंकि पॉवर को भी आवश्यक कार्यालयों की लिस्ट में डाल रखा है। चार लोग से बतिया के आ जाते है इसलिए कोई टेंशन लेते नहीं। कितने लोग मर रहे है, कितनी लाशें नदी से मिल रही है, कोई खबर नहीं। पर इनको तो समाचार से ही नफरत है। टी.वी. चलेगी तो गाने के चैनल।

चलो खाना बनाया जाए। महामृत्यंजय मंत्र पर सभी ऑनलाइन हुए। (दीदी के लिए उनके कुछ दोस्तों ने शुरू किया था। ) दीदी को भी मीटिंग में रखा गया था। मैं ने देखा वह अस्पताल में है। काफी कमजोर हो गयी है। कोई बात नहीं हुई मीटिंग में विडियो मेरा ऑन नहीं था। कभी-कभी ऑक्सीजन लगाने की जरूरत पड़ती है इसलिए अभी डिस्चार्ज नहीं देंगे। कोई सीटी स्कोर होता है उसे भी अभी देखना बाकी है। १ हफ्ते और हो जायेगा। इनकी डॉक्टर से बात होती रहती है। हमें तो कुछ बताना नहीं है। क्या बताएँगे? खैर, महामृत्युंजय के आशीष ने उन्हें वापस बुला लिया। छत पर नए फूल के बीज डाले थे। पर पानी डालने की किसे फुर्सत? दोनों काम करने जायेंगे तो कौन आयेंगे डालने। मीता (नौकरानी) भी छुट्टी लेकर बैठ गयी है। कितनी बार कहाँ मैंने, पर यह और उनका मोबाइल। कोई-न कोई बहाना चाहिए। देखा, बिना पानी के भी कुछ मरते-मरते से अंकुर आ गए है। कुछ गुड़ाई करके पानी पिलाया। इनसे तो कोई काम मत कहो। लो, लिख रही थी कि घंटी बज गयी। आ गए होंगे...

२९/०५/२०२१ (शनिवार)
आज सोचा था की मैं ही नाश्ता बनाऊँगी, पर नींद खुली ७: ३० पर। खटर-पटर शुरू हो चली थी। आज तो बैंक नहीं जाना है, मैंने पहले से ही सोच रखा था। मैं छत पर गयी, सूर्य की किरणों ने सब उज्ज्वल कर दिया था। सो मैंने सारे खिड़की खोल कर रख दिया। मन किया कि दीदी से बात करूँ; आई. सी. यू. से बाहर आये १२ दिन हो गए। पर हिम्मत नहीं बनी। मम्मी को फ़ोन किया। उनको फ़ोन किया, फ़ोन नहीं उठाया दोनों ने। क्या कर रहे है सब? मीना (ए. बी. अच) का फ़ोन आया। पूछ रहा था, कब आ रहे हैं? मेरे जगह पर वही बैंक देख रहा होगा। नीलम भी छुट्टी पर चली गयी है, उसको बुखार आ रहा था। पाटिल (पी. ओ.) को ठीक नहीं लग रहा है। मैंने 'सोमवार से ज्वाइन करुँगी' कह दिया। जोनल ऑफिस से भी फ़ोन आने लगे। ब्रांच को चलाना है। आँख बंद करके लेती ही थी कि सभी फिर नकाब में दिखने लगे। नीलम का नकाब ने उसके चेहरे को कसकर पकड़ लिया है। नीलम चिल्लाती है पर कोई नकाब नहीं निकाल पा रहा है। सबके नकाब अब चेहरे पर चिपक गए है। लो, पाटिल भी गिर गया। अमित भाग कर आता है पर नकाब उसे भी जकड़ लिया है। मीना भी जमीन पर पड़ी है। लोग बैंक में घुसे आ रहे है। कई कैश की तरफ भाग रहे है और कई वॉल्ट की तरफ। कितना बुरा सपना देखा!! शाम को ६ बजे इनके घंटी बजाने से आँख खुली। कोई काम नहीं हुआ...

३०/०५/२०२१ (रविवार)

कल फ़ोन आया था पर मैं तो सो गयी थी। इनको छत पर लगा दिया है पौधों को पानी देने के लिए। मैंने खुद नाश्ता बनाया। मीता (नौकरानी) आज फ़ोन की थी वह कल से खाने के लिए आएगी। एक महीने वह भी घर नहीं आई। दीदी की न्यूज़ ने उसे भी घर में बंद कर दिया था। सब्जी लेने के लिए चलना है। कल के लिए कुछ तैयारी करनी होगी।

३१/०५/२०२१ (सोमवार)

चलो ट्रेन में कोई काम करने को तो मिला, नहीं तो सब अपने में बैठे रहते है। चलती ट्रेन में लिखना आसान नहीं है। मीना जी आये थे, पर बाकी सभी छुट्टी पर चले गए हैं। दोनों ने किसी तरह बैंक के काम समेटे। गवर्नमेंट ने भी कुछ वर्किंग टाइम हम लोगों का कम किया; सो हो गया। नीलम का रिपोर्ट नेगेटिव आ गयी है, फिर भी डॉक्टर ने उसे २ दिन और आराम करने को बोला है। सुबह वाली लोकल में सुभदा मैडम रेलवे वाली मिली थी। ३० दिनों के बाद उन्होंने ज्वाइन किया, पॉजिटिव होकर फिर से सही होकर उन्होंने ज्वाइन किया। दीदी को फ़ोन लगाती हूँ। रात के ११ बज रहे है। दीदी से बात हुई उन्हें कल डिस्चार्ज दे रहे हैं। ४५ दिन हो जायेंगे उनको अस्पताल में। बहुत हिम्मत दिखाया उसने। सामने वाले बेड पर कितने आये और पॉलिथीन में लिपट कर चले गए, पर वह हमेशा ताकत बनाये रखी। कहती है, उसने संकल्प किया कि मुझे पॉलिथीन में नहीं जाना और भगवान ने उसकी सुनी। और मैं बस यूँ ही हार गयी। अरे जो लड़ते है, वही जीतते है। ऐसा मन से हारने से क्या होगा?

०१/०६/२०२१ (मंगलवार)

०२/०६/२०२१ (बुधवार)

०३/०६/२०२१ (गुरुवार)

०४/०६/२०२१ (शुक्रवार)

०५/०६/२०२१ (शनिवार)

०६/०६/२०२१ (रविवार)
डायरी लिखना अच्छा है पर कब लिखूँ, समय नहीं मिलता। दीदी से ट्रेन पर बात करती हूँ हर दिन भले मुझे एक भी शब्द समझ में आये या न आये। अगले सेकेंड - सैटरडे और सन्डे हम उनसे मिलने जायेंगे। ई-पास की व्यवस्था कर रहे है। आज फिर से विजय को छत पर लगा दिया है। फूल भी पौधों में आने लगे हैं। बाहर वैक्सीन अब लगने लगी है। बैंक और बिजली वालो को शायद जल्दी मिल जाए।

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आगे कहीं-कहीं कुछ लिखा था पर मैंने पढ़ा नहीं। शायद और पढ़ने को अब मन भी नहीं बचा था। मैंने डायरी किनारे रख दी थी। महक पास में ही खड़ी थी।
"लो, चाय पियो" चाय की प्याली को सामने पड़े मेज पर रखते हुए उसने कहा था।

फूल जो मैंने छत से लाये थे, वह महामृत्युंजय (शिवलिंग) पर चढ़े हुए थे।
( समाप्त )


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