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फ़्रेंडशिप
Writer: इन्दु सिन्हा, रतलाम, मध्यप्रदेश


## फ़्रेंडशिप

Writer: इन्दु सिन्हा, रतलाम, मध्यप्रदेश

"सुनो, कल तुमने मुझे इग्नोर किया था या तुम जल्दी में थीं?"

सागर की गहरी आवाज सुनते ही नैना के कदम रुक गए, उसने उदास नजरों से सागर की तरफ देखा, लेकिन कोई जबाब नहीं दिया।

"मुझे लगता है तुमने मेरा प्रश्न ठीक से सुना नहीं , मैंने तुमसे कुछ पूछा है नैना। जबाब क्यों नहीं देती?"

सागर के चेहरे पर हल्की सी झुँझलाहट के भाव साफ-साफ देख रही थी नैना, लेकिन बोली फिर भी नहीं। "क्या बात है? नैना तुम बोलती क्यों नहीं?" सागर की आवाज इस बार तेज और गुस्से भरी थी। नैना ने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया और तेज-तेज कदमों से क्लास रूम की तरफ जाने लगी।

"नैना, जवाब दो!" सागर ने फिर कहा।

नैना की तरफ से कोई जवाब नहीं मिलता देख सागर ने कहा, "ठीक है, तुम अभी जवाब नहीं देना चाहती तो मत दो। परसों संडे है। शाम पाँच बजे मैं ट्रेजर आइलैंड के बाहर तुम्हारा इंतजार करूँगा। बाय नैना..."

सागर ने नैना के जवाब का इंतजार करना भी जरूरी नहीं समझा और तेजी से कदम बढ़ाता हुआ अपनी क्लास में चला गया। नैना और सागर दोनों ही गुजराती कॉलेज के स्टूडेंट थे। दोनों की मित्रता पूरे कॉलेज में प्रसिद्ध थी। एक आध विषय को छोड़कर दोनों के सभी विषय समान थे। नैना पढ़ाई के साथ ही महादेवी वर्मा काव्य संसार पर शोध कर रही थी। उसको साहित्य में यूँ भी बहुत कुछ अच्छा लगता था पर कुछ साहित्यकार उसके विशेष प्रिय थे, जिनमें महादेवी वर्मा, डॉक्टर धर्मवीर भारती की 'गुनाहों के देवता' उसकी प्रिय किताब थी। बचपन से ना जाने कितनी बार वह इस किताब को पढ़ चुकी थी। लेकिन मन इस किताब से भरता नहीं था, चंदन और विनती उसके प्रिय पात्र थे। मोहन राकेश की 'अंधेरे बंद कमरे' भी उसकी प्रिय पुस्तक थी। हरबंस की मानसिक उलझन कशमकश उसे लगता था कि उसकी अपनी है। इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते नैना की उदासियाँ ज्यादा गहरे होते थे। मन किसी और छोर पर पहुँचना चाहता था, पर बेचैनियाँ हद से ज्यादा बढ़ने लगती और उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। ऐसी मनःस्थिति में ह्रदय के भाव कभी कविता के रूप में, कभी लघु कथा के रूप में, पन्नों पर बिखरने लगते; उसे पता नहीं चला। ऐसे में उसने कब अपने आप खामोशियों के बीच में चैट कर लिया उसे नहीं मालूम। रचनाओं के प्रकाशित होने का सिलसिला भी लगभग बारह-तेरह वर्ष पूर्व शुरू हुआ; वो आज भी चल रहा है।

कॉलेज में भी एक दो ही उसकी मित्र थी। शोरगुल, आधुनिकता दिखावे से उसे चिढ़ थी। सच्चा मित्र वह बस पुस्तकों को मानती थी, इसलिए कि वो कभी भी बेवफाई नहीं करती। यह बात भी सही है कि नैना को तलाश है अच्छे पुरुष मित्र की, जो उसकी भावनाओं को समझ सके और उससे वह सब कुछ कह सके। मित्र तो उसकी रोमा भी थी, लेकिन वह भी आज के युग के अनुरूप आधुनिक तो थी ही, साथ ही रिश्तों को यथार्थ की धरती से जोड़कर देखती थी। मन-ह्रदय से जुड़कर वह किसी रिश्ते में विश्वास नहीं करती थी। बस यही बात नैना को पसंद नहीं आती थी। उसे लगता था, हम किसी भी रिश्ते को बनाएं, चाहे वह रिश्ता कोई भी हो, उसमें हम ईमानदारी रखें।

झूठ से नैना को चिढ़ थी, लेकिन रोमा को लंबे समय तक किसी भी रिश्ते के लिए इंतजार करना पसंद नहीं था। वह फास्ट फूड वाली शैली में जिंदगी पसंद करती थी। नैना का मानना था कि ऐसे रिश्ते बन तो जल्दी जाते हैं पर निभाते नहीं है, और मन को सुकून भी नहीं देते हैं। मन की शांति और विश्वास के लिए मित्रता में ईमानदारी चाहिए। रिश्तों में तड़क-भड़क अंधाधुंध एक दूसरे पर रुपए लुटाने और महेंगे गिफ्ट देने के रिवाज भी नैना को पसंद नहीं थे, उससे एक प्रकार की दिखावट, बनावट का एहसास होता था। फिर आज मित्रता में स्वार्थ और लालच ने इतना स्थान बना लिया है कि सच्चाई के लिए कोई जगह नहीं बची है।

आज शनिवार है, और कल शुक्रवार को सागर ने कॉलेज में ही अगले संडे को ट्रेजर आईलैंड में मिलने कहा है। क्या करूं, जाऊँ या नहीं?

नैना को ट्रेजर आइलैंड में जाना बिल्कुल भी पसंद नहीं था, वही तड़क-भड़क और आधुनिकता की जीती-जागती तस्वीर, ए. सी. केबिन, स्टेचू से घूमते हुए वेटर नैना को अच्छे नहीं लगते। महेंगे कपड़ों से सजे शॉपिंग मॉल, मॉडर्न युवतियॉ, महिलाएँ, बच्चे, चमकती-दमकती गाड़ियाँ, फास्ट फूड की तरह तेजी से बदलती जा रही जिंदगी के अजीब रंग; नहीं, इन रंगों में स्वाभाविक चमक नहीं है। तभी तो इतने बेजान-बनावटी दिखते हैं तेजी से भागते लोग, 'समय के साथ कदम-से कदम मिलाने में पीछे न रह जाए' शायद इस बात का भी डर हो सकता है।

सोचते-सोचते नैना पलंग पर सीधे लेटते ही सामने की दीवार पर नजर दौड़ाई। एक विशाल पेंटिंग पूरी दीवार को घेरे हुए थे। ये ऑइल पेंटिंग नैना को बहुत पसंद थी। पेंटिंग का पूरा दृश्य नैना को अजीब सा सुकून देता था। सागर तट का प्यारा सा दृश्य था, तट के किनारे एक नाव बंधी थी, तट के किनारे ही एक लड़का बैठा हुआ था, डूबे शाम के नजरें को देख रहा था अपनी उदास आँखों से। सुरमई शाम की उस पेंटिंग में उस लड़के की आँखों में अजीब सा आकर्षण था। नैना बचपन से ही अपनी सुंदर आँखों की तारीफ सुनती आ रही थी। उसे अपनी आँखों पर नाज भी था, नैना को भी पूरे व्यक्तित्व में खूबसूरत आँखों का आकर्षण अधिक खींचता था। पेंटिंग वाले लड़के की आँखों में और सागर की आँखों में कुछ समानता लगती थी। सागर की आँखों में शांति और एक अजीब सी सच्चाई झलकती थी, लेकिन इस सच्चाई पर नैना को कभी-कभी शक भी होने लगता, कहीं आँखों में झलकती सच्चाई फरेब तो नहीं? झूठ तो नहीं? तभी एक तेज हवा का झोंका नैना के कमरे की खिड़की के पर्दे को हिला गया, खिड़की के बाहर छोटे से बगीचे में बाहर से झाँकती हरियाली मुस्कुरा पड़ी और हँस दिए कचनार के फूल, गुलाब के खूबसूरत पीले गुलाबी फूल, एक खुशबू सी आकर नैना के सलोने से चेहरे को सहला गई। नैना ने सागर की गहरी आँखों में डूब कर फिर एक बार अपनी सोच की दिशा बदली।

रोमा उसकी मित्र थी, दोस्ती थी पर ना जाने क्यों उसकी स्वतंत्रता में उसे एक स्वच्छंदता का एहसास होता था। उसे उसकी थिरकती चंचलता में विश्वास कम होता, उसे लगता रोमा के स्वच्छंदता, विचारों की आधुनिकता उसे डूबो ना दे। यूँ तो आधुनिकता की हिमायती नैना भी थी। विचारों में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास नैना को पसंद नहीं, पर प्रकृति पर उसे विश्वास था, मित्रता में उसे यकीन था, कपड़ों की तरह बदलने वाली मित्रों की लंबी लाइन से उसे चिढ़ थी। नैना का सोचना था कि मित्रता में जल्दबाजी हमेशा दुख का कारण बनती है, मित्रता में सोच-समझ कर, एक-दूसरे की रुचियों को जानकर ही मित्रता करें तो ज्यादा अच्छा रहता है। क्योंकि मित्रता निभाना इस जमाने में बड़ा मुश्किल काम है। पूरी जिंदगी मैं अगर एक भी सच्चा मित्र आपको मिलता है तो आप से बड़ा भाग्यशाली कोई नहीं।

रोमा के दोस्त रॉकी से उसे बड़ी चिढ़ महसूस होती थी। लंबे-लंबे हिप्पी कट बाल, सिगरेट के छल्ले बनाकर रोमा के चेहरे पर उड़ाता था। रोमा खुशी के मारे नाच उठती थी। जब-तब क्लास छोड़कर रॉकी के साथ लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाती थी। पूरे कॉलेज में रोमा और रॉकी का अफेयर चर्चा में था। इसे अफेयर को 'प्रेम' का नाम नहीं दे सकते। रॉकी जैसे कई दोस्त रोमा की लिस्ट में थे, जिनके साथ अक्सर घूमने जाती थी। लेकिन प्रेम की गंभीरता जैसी कोई बात नहीं देखी थी। वो इसे दोस्ती कहती थी, लेकिन कई बार उसे पेड़ों के झुरमुट में अलग-अलग मित्रों के साथ चुम्बनरत देखा था। इस पर नैनाने रोमा को रोका भी था, पर उसने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हमेशा बातों को ऐसे हवा में उड़ा देती थी जैसे रॉकी सिगरेट के छल्ले बनाकर हवा में उड़ा देता है। उसके बाद जहां तक नैना को याद है, उसने रोमा को टोकना बंद कर दिया था। रोमा भी कभी इस विषय पर बात नहीं करती थी, उसे नैना की आदर्शवादिता से नफरत थी। नैना को खाओ, पियो, एन्जॉय करो की आदत पसंद नहीं थी। फिर भी नदी के दो किनारों की तरह दोनों की दोस्ती थी, जो मिलते नहीं पर साथ साथ चलते जरूर हैं।

अचानक मोबाइल की मीठी सी धुन बजने लगी। नैना विचारों के समंदर से बाहर निकली तो मोबाइल पर देखा खूबसूरत नीले अक्षरों में सागर चमक रहा था। उसने तुरंत ही मोबाइल उठा लिया, "मेरे बारे में सोच रही थी ना?" सागर की गहरी आवाज नैना को भली लगी। लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया खामोश रही।

"बोलो भी..." सागर की आवाज फिर आयी।

"हाँ, यही समझ लो..." फिर उसे अचानक याद आया कि कल ट्रेजर आईलैंड जाना है। तो वो बोली, "ट्रेजर आईलैंड नहीं मिलेंगे सागर।"

"तो आप ही फरमाइए आप कहाँ मिलोगी?"

"'चोखी ढाणी' चले?" नैना ने पूछा।

"अच्छा ठीक है बाबा, 'चोखी ढाणी' चलेंगे। बस अब ठीक है!!" सागर पराजित योद्धा के अंदाज में कहा।

"ठीक है..." नैना ने कहा।

"ओके, कल शाम पाँच बजे रीगल टॉकीज के सामने इंतजार करता हूँ।"

"ओके बाय," नैना ने कहकर मोबाइल ऑफ कर दिया।

सागर से मिलने मात्र की कल्पना से ही नैना की भूख-प्यास जैसे पँख लगा कर कहीं दूर उड़ जाती थी। मन में एक अजीब सी बेचैनी छाई रहती थी। मन किसी काम में नहीं लगता था। ऐसा लगता था बस सोचते रहो, सागर के ख्यालों में डूबे रहो, ख्यालों के भंवर से निकलो फिर उसी में डूब जाओ; ना जाने कैसी प्यास है, जो बुझती ही नहीं।

"नैना! ओ... नैना... अब उठो भी... कहाँ खोयी हो? खाना नहीं खाओगी? चलो जल्दी से आ जाओ। डिनर टेबल पर सभी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं," नैना की आंटी कहती और अपने काम में लग गई।

नैना ने आंटी की आवाज सुनी तो खयालों के घेरे से बाहर निकली, घड़ी की तरफ नजर डाली तो रात के आठ बज रहे थे। इसका मतलब लगभग सारी दोपहर से रात आठ बजे तक वो सोचती रही। उसे सागर की आकर्षक गहरी आँखों में इतना नहीं डूबना चाहिए कि सब काम-धाम ही भूल जाओ। उसे तो आज नोट्स भी तैयार करना था पर पूरा शनिवार यूं ही बर्बाद हो गया। यही सब सोचते-सोचते वो डिनर की टेबल पर आयी तो देखा खाना आंटी जी लगा चुकी हैं, अंकल जी और भाभी- भैया डिनर की टेबल पर जम चुके हैं। सभी ने खामोशी से खाना खाया। अंकल जी को खाने के दौरान किसी भी प्रकार की बातचीत करना पसंद नहीं था। उन्हें अनुशासन के खिलाफ किसी का भी जाना पसंद नहीं। नैना उनके दिवंगत बड़े भाई की इकलौती बेटी थी, इसलिए वह उसकी पढ़ाई-लिखाई का ध्यान रखते थे। नैना के माता-पिता की मृत्यु के बाद आंटी ने ही नैना की देख−भाल की। जब नैना कक्षा बारहवीं में पढ़ती थी तभी एक हादसे में नैना के माता-पिता दोनों की मृत्यु हो गई थी।

खाना खाकर नैना ने अपने कमरे की राह पकड़ी, यह सोचकर कि कुछ पढ़ाई भी कर ली जाए। यही सोचकर वह अपना अधूरे नोट्स ले कर बैठ गई। लगभग रात्रि के ग्यारह बजे तक वह पढ़ाई में डूबी रही। तभी एक मेसेज की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ देखा तो सागर का मेसेज था कि 'कल शाम पाँच बजे'। नैना तुरंत जवाब भेज दिया, "मुझे याद है।"

उसके बाद नैना का मन पढ़ाई में नहीं लगा, सागर के साथ कल बिता जाने वाले पलों को सोचकर वह रोमांचित हो उठी। एक अजीब सी सुखद अनुभूति उसके मन में होने लगी, कितना अच्छा लगता है सागर के साथ बात करना। लेकिन सागर कम बोलता है, कभी-कभी उसे चिढ़ होती उसके कम बोलने पर, वही बोलती रहती है सागर सिर्फ सुनने का ही काम करता है। हां, हूं के के अलावा जबाब नहीं देता। एक ही काम आता है उसे, अपनी गहरी नजरों से नैना को देखना। ऐसा लगता है उसकी आँखें कहीं भीतर तक उतरती जा रही है। एक अजीब सी मदहोशी छाने लगती है। कुछ बोलने को शेष नहीं रहता। सागर के ख्यालों में डूबती-उतरती नैना नींद के आगोश में सिमटती चली गई। बादलों की ओट से चाँद निकल कर खिड़की से झाँकने लगा था, दूधिया चाँदनी बिखरने लगी थी, सितारे फुलझड़ी से लग रहे थे, नैना के माथे पर खिल रहे थे सपनों के फूल, रस बरसा रहा था आसमान।

रविवार की अलसाई हुई सुबह ओस की बूंदों को मोती सा चमकाता, इतराता पीला गुलाब सुबह की शोख-चंचल हवाओं के झोंकों से झूम रहा था। सूर्य की सुनहरी किरणों का जादू धरती पर बिखर जाना चाहता था। सितार की मीठी ध्वनि पूरे घर में एक अलौकिक सा वातावरण बना रही थी, अगरबत्ती की खुशबू भी घर में चार और बिखर रही थी। मतलब यह, आँटी जी सुबह अपने सितार के रियाज में व्यस्त हैं, अंकल जी स्नान के बाद पूजा कर रहे हैं, थोड़ी देर और लेटा जा सकता है। आंटी जी रियाज के बाद तुरंत ही नैना को उठने का आदेश दे देंगी। यह सोचकर नैना ने फिर अपनी आँखें बंद कर ली। खिड़की से आती हवाओं ने नैना के बिखरे बालों से अठखेलियाँ शुरू कर दी थी; नैना को उठना पड़ा।

आज तो मॉर्निंग वॉक पर भी जाना रह गया। घड़ी पर नजर डाली, सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। अगर वह फ्रेश होने के बाद निकलती है तो आठ बज जाएँगे। रहने देते हैं, यह सोचकर किचन की तरफ चल दी। पहले चाय की छुट्टियों के साथ डाक से आई पत्रिकाओं और पत्रों पर नजर डाली जाए।

कुछ पत्रिका देखने के बाद उसने पत्रों पर भी नजर डाली। पत्रों में ऐसा कुछ विशेष नहीं था; वही लेखन की तारीफ या फिर अपनी भावनाएं प्रकट की गई थी। पत्रों में एक पत्र ने जरूर ध्यान आकर्षित किया; गोवा की जेल से एक कैदी का पत्र। कैदी का नाम था रितेश कुमार। उसने कादंबिनी में छपी कविता "मां" की तारीफ की थी। बेहद भावुकता में पत्र लिखा था, उस पत्र नैना के दिल को झकझोर कर रख दिया। वो रितेश को पत्र लिखने बैठ गई। बस पत्रों का जवाब देते-देते ही और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ़ने में ही दोपहर गुजर गई। नैना ने आंटी जी को पहले ही बोल दिया था कि वह सागर के साथ 'चोखी ढाणी' जाएगी। अंकल-आंटी जी की स्वीकृति मिल चुकी थी। नैना ने अपने मनपसंद रंग पिंक और नेवी ब्ल्यु कॉम्बिनेशन वाला सूट चुना। वो भी जानती थी, सागर तड़क-भड़क पसंद नहीं करता। बस हल्के से काजल से नैना की बोलती आँखें ज्यादा सुंदर लगने लगती है। तिलक नगर से रीगल टॉकीज तक टैक्सी से जाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। नैना की टैक्सी जैसे ही रीगल टॉकीज पहुंची और किराया देने के लिए पर्स खोला ही था कि सागर की बाइक टैक्सी के पास आकर रुकी। बस फिर क्या था, अगले ही पल वह बाइक पर।

सागर बाइक तेज चलाता था। नैना को सागर के विशाल कंधों पर सिर टिका कर बैठने में सुकून मिलता था। बाइक इंदौर की चौड़ी खूबसूरत सड़कों पर दौड़ने लगी। शाम के आंचल का रंग गहरा होने लगा था, मौसम में हवाओं की रूमानियत बढ़ने लगी थी। नैना की पलकें मानो बोझिल सी हो रही थी। अचानक बाइक रुक गई, नैना मानो सपने से जागी, "क्या हुआ सागर?"

"कुछ नहीं," सागर ने बाइक पर पलटकर नैना से कहा।

"तो फिर चलो ना!!" नैना का अंदाज मासूम था। सागर के घूमते ही नैना को लगा सागर की सांसों से मानो हरसिंगार झर रहा हो। उसकी रूह में समाता जा रहा है हो।

"नैना कॉफी पीते हैं, फिर चलते हैं..." सागर ने कहा।

"ठीक है..." कहती हुई नैना सड़क के किनारे की बनी कॉफी शॉप के पास खड़ी हो गई। कॉफी की चुस्कियो के साथ सागर का साथ नैना को सुकून दे रहा था। सितारे धीरे-धीरे बादलों की ओट से निकलना चाहते थे और नैना के नीले आँचल में सिमट जाना चाहते थे। अचानक नैना की नजरें सागर के चेहरे पर आ गई। सागर उसे ही देख रहा था, नैना शरमा गई। सागर की आँखों में दीप जल उठे, सपनों के दीप। जब वो 'चोखी ढाणी' पहुंचे तो अंधेरे ने अपने पंख हल्के से पसार लिए थे। 'चोखी ढाणी' में हर एक वस्तु में राजस्थानी अंदाज था। छोटे-छोटे कॉटेज भी ग्रामीण संस्कृति की झलक पेश कर रहे थे, सजावट भी उसी तरह से की गई थी। एक तरफ बंदर का नाच दिखाया जा रहा था तो दूसरी ओर कठपुतली का खेल चल रहा था। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बनी लालटेननुमा बत्तियां जल चुकी थी, एक सुंदर सा वातावरण बना रही थी।

राजस्थानी नृत्य के लिए भी 'चोखी ढाणी' के दूसरे कोने पर खुला स्टेज बना था। जहां कालबेलिया नृत्य चल रहा था। नैना सागर को वही ले गई। दोनों नृत्य देखने में तल्लीन हो गए। उन जैसे अनेकों जोड़े अपनी रुचि से अपने मनोरंजन में व्यस्त थे। कई परिवार-सहित पिकनिक मनाने आए थे। बच्चों को भी टीवी चैनलों से दूर इस ग्रामीण अंदाज में मजा आ रहा था। कोई बंदर नाच के लिए जिद कर रहा था, कोई राजस्थानी नृत्य के लिए जिद कर रहा था।

पूरा वातावरण किसी छोटे से गांव की भांति सुंदर लग रहा था। 'चोखी ढाणी' में थोड़ी-थोड़ी दूर पर बने कॉटेज के बाहर लालटेन जल रही थी। वही बाहर खाट भी पड़ी थी, आप खाट पर बैठकर भी पूरी 'चोखी ढाणी' की सुंदरता को निहार सकते हो। आसमान में तारों की झिलमिल के बीच चांद तारों की शरारतों को देख-देख कर खुश हो रहा था तभी सागर ने नैना का हाथ अपने हाथ में ले लिया, नैना के शरीर में एक सुकून और शांति की किरणें दौड़ने लगी। नैना को एक सुरक्षा का अहसास होने लगा। दोनों धीमे-धीमे कदमों से 'चोखी ढाणी' में टहलने लगे। टहलते-टहलते दूर एकांत में सीमेंट से बनी बेंच पर सागर बैठ गया और बोला, "नैना यहां से देखो 'चोखी ढाणी' कितनी खूबसूरत लगती है।"

नैना ने बेंच पर बैठकर सागर के विशाल कंधों पर अपना सिर टिका लिया, हल्के से अपना चेहरा सागर के कंधे में छुपा लिया। फिर हल्के से बोली, "सागर तुमने इग्नोर करने वाली बात पूछी थी ना?"

"हां नैना, तुमने उस बात का तो जवाब ही नहीं दिया था!"

"नहीं सागर, तुमको तो मैं सपने में भी इग्नोर नहीं कर सकती। तुम जानते हो ना शेक्सपियर की वह बात की 'रोने के लिए या तो कमरा हो या फिर किसी का कंधा जहां कभी रो कर हम अपने दुख को हल्का कर सकें जिससे सुकून मिल सके।'"

"नैना!!" सागर ने कहा, "क्या हुआ था उस दिन बोलो?"

"उस दिन मम्मी ओर पापा की बहुत याद आ रही थी, इसलिये मूड खराब था। मम्मी-पापा का दर्दनाक हादसा नहीं भूल पाती।"

नैना की बात सुनकर सागर की आँखें भी भर गयी थी। सागर ने नैना के सर को अपने सीने में समेटकर उस पर अपने होठ रख दिये। नैना की आँखों से निकल रहे आँसू सागर के सीने को भिगोने लगे थे।

"सागर ..." नैना ने कुछ कहना चाहा।

"कुछ ना कहो। देखो खामोशी की आवाज..." सागर की आवाज में हल्का सा कम्पन था, "ये खामोशी बहुत कुछ कह रही है सुनो। ये खामोश पेड़, उस पर धीमी-धीमी चलती हवाएं..."

कालबेलिया नृत्य करती लड़की के घुंघरू की धीमी सी आवाज पहुँच रही थी। नैना मन-ही मन ईश्वर से दुआएं मांग रही थी, "ये सुकून, प्यार, यूँ ही बना रहे।"

बादलों की ओट से चांद सागर की खामोशियों को देख लेता था, फिर किसी बादल की ओट में छिप जाता था यह सोच कर की चोरी कहीं पकड़ी ना जाए।

"सागर..." नैना बोली।

नैना की आवाज सुनकर सागर ने अपनी गहरी आँखें खोली। सागर की आँखों में सितारे झिलमिलाने लगे थे, मुस्कान झरने में घुली ओस सी पवित्र लग रही थी। "सागर, मै कितनी शांति महसूस करती हूं तुम्हारे साथ। प्लीज यह मित्रता, फ्रेंडशिप जीवन भर रहेगी ना?" नैना ने पूछा।

"हां नैना, मेरा विश्वास करो, तुम मेरे लिए किसी पूजा की थाली के समान हो, जैसे ईश्वर की पूजा करते हम पूजा की थाली सजाते है। उसमें हम छल कपट नहीं करते। वैसे ही, जीवन में तुमसे कभी भी छल कपट नहीं करूंगा। तुम मेरी अच्छी दोस्त तो हमेशा रहोगी, तुम मेरा प्यार भी हो," सागर ने कहा।

"क्या कह रहे हो सागर?" नैना को विश्वास नहीं हो रहा था।

"हां नैना, मेरा विश्वास करो, तुम मेरे विचारों जैसी हो। सादगी तुम्हारी मुझे पसन्द है," सागर ने कहा।

फिर एक बार नैना ने अपना चेहरा सागर के सीने में छुपा लिया। 'चोखी ढाणी' में नृत्य की आवाज तेज होने लगी थी और रात के आँचल में सितारों की चमक गहरी हो चली थी।
( समाप्त )


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