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पितृ ऋण

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पितृ ऋण
Writer: संजय कुमार गुप्ता, लहरतारा, नियर इंद्रप्रस्थ, वाराणसी, उत्तर प्रदेश


## पितृ ऋण

Writer: संजय कुमार गुप्ता, लहरतारा, नियर इंद्रप्रस्थ, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

हम लाख आधुनिकता में ढल जायें व पाश्चात्य संस्कृतियों को कितना भी प्रश्रय दे दें, पर हमारी सभ्यता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वह हमारे संस्कारों को किसी-ना किसी रूप में जीवंत रखे हुए हैं। वह आज भी हमारे समाज में रिश्ते- नातों की डोर को बिना गांठ पड़े अपने अटूट शक्तियों द्वारा इतनी मजबूती से बांधे रखते हैं जो उन्हें सदा स्फूर्त रखते हैं और गर्माहट देते रहते हैं।

यह कहानी प्रेम, बलिदान व जीवन संघर्ष की अदभूत दास्तान है जिसका प्रत्येक चरित्र अपने कर्तव्य निर्वाह के लिए सतत् प्रयत्नशील रहता है।

मेरे पिता सूरजभान एक जिंदादिल, कर्मठ व निष्ठावान व्यक्ति थे। उनके मुख से मैंने आज तक किसी के लिए 'ना' शब्द नहीं सुना था। दोपहर की चिलचिलाती धूप हो या दिसंबर की बर्फीली सर्दी, यदि कोई मदद मांग देता तो उनके कदम उस ओर फौरन ही बढ़ जाते। सभी की समस्याओं का निदान होता था उनके पास। उनका उत्साह व तर्कशक्ति देखकर बड़े-बड़े भी घुटने टेक देते थे। संयुक्त परिवार के वटवृक्ष तले पले-बढ़े पिताजी को बड़े-बुजुर्गों का आदर्श की छत्रछाया में संस्कारों की ऐसी बेड़ियां डाल दी गई थीं जो शायद उनके विरुद्ध कभी सही- गलत का बोध होने नहीं दिया। जिस घर में पिता नहीं हो तो उस घर में बड़ा भाई पिता समान होता है, यही सिखाया गया था उन्हें शुरू से। अतः अनुज धर्म का पालन करते हुए वह सदा अपने बड़े भाई और भाभी के प्रति अंधानूभक्ति में लीन रहे। जो भी वे कह देते उसे ही लकीर मानकर अपने परिवार के प्रति समर्पित कर देते। यही कारण था कि मां भी उनकी बात काटने या विरुद्ध जाने का साहस नहीं जुटा पाती थीं। अतः उन्होंने भी घर की सुख-शांति के लिए सब कुछ नियति पर छोड़ दिया था।

कालचक्र भी अपना खेल नियत समय पर ही खेलता है। अमावस की काली रात की छाया भी इस परिवार पर पड़ चुकी थी। बड़े भाई और भाभी के मन में भी लालच के जमे पांव ने उनकी बुद्धि पर ऐसा ताला जड़ा कि छोटे भाई की सारी संपत्ति हड़प ले गए और बंटवारे में उसके जीवन यापन के लिए थोड़ी संपत्ति के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा। हम पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। मेरे पिता के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी। उन्हें बस अंधकार के सिवा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। अपने सगों से धोखा मिलने पर वह इस कदर टूट चुके थे मानों अब उनके अंदर कोई इच्छा ही नहीं बची थी। इस घुटन भरे माहौल में परत-दर परत पिछली बातें याद कर उन्हें दीमक की भांति चाट रहे थे। अपने बड़े भाई पर उसने इस कदर भरोसा रखा कि उसने जो भी कमाया लाकर आंख मूंद कर उन्हें सौंप दिया। अपने लिए उसने आज तक कुछ सोचा ही नहीं। सिर्फ 'हमारा' का मन में भाव लिए सब कुछ न्यौछावर करता रहा। आज उसके भरोसे का ही सिर्फ खून नहीं हुआ था, अपितु उसके सारे सपने भी उस माले की मोतियों की भांति टूट कर फर्श पर बिखर चुके थे। अब इस घर में अपनों के बीच पराया बनकर जीना असहनीय हो गया था। जिस खून-पसीने से सींचा और जज्बातों की दीवारों से बना यह घरौंदा अब उसे चिढ़ाने लगा था। उसे चारों तरफ सिर्फ आग की लपटें और धुआं- धुआं दिखाई दे रहा था। और एक दिन उसने अपने को मजबूत किया कि जब दिल में ही दरार आ गया तो फिर किस लिए यहां रहना। इस निश्चय के साथ अपनी पत्नी व बेटे के साथ छोड़ दिया उसने अभागे रिश्ते को, घर को, गांव को।

अब शहर ही उसका बसेरा था। उसने फिर से अपने आशियाने को एक नया रंग-रूप देने में लग गया। समय ने फिर करवट ली, घर में फिर बरकत-ही बरकत होने लगी। शहर में नए रिश्ते-नातों ने पनपना शुरू कर दिया था। पर एक बार अविश्वास व धोखा की डोर टूटने के बाद फिर वह खुद को संभाल नहीं पा रहा था। पुरानी बातों को याद कर उसका खून खौल उठता था। उसके अंदर का घाव अब नासूर का रूप ले चुका था। इस कड़वी सच्चाई को भुलाने के लिए सहारा ढूँढने लगा था। किसी ने दिखा दिया था रास्ता उसे मयखाने का। पीने लगा था हर रोज शराब वह, या फिर कहिए शराब हीं पी रही थी उसे हर रोज। ससुरी लत ही ऐसी है, एक बार लग गई तो जन्नत तक साथ नहीं छोड़ती है। नशेबाज कहता है कि अगर इस से दोस्ती हो गई तो फिर चाह कर भी यह साथ नहीं छोड़ती। जब अच्छे- अच्छे दोस्त भी दगा दे जाते हैं तब भी यह साथ रहती है हमेशा, बिल्कुल अपनों जैसा सारे गमों को हर लेती हैं। बिल्कुल निश्चिंत रह सकते हैं आप इस से दोस्ती करके। शायद इसी सूरादैत्य ने मेरे पिता को अपने नागपाश में ऐसे जकड़ लिया जिस से निकलना मुश्किल हो गया था। धीरे-धीरे वह अपने परिवार, धर्म व कर्तव्य से विमुख होते जा रहे थे। उनको न दिन का ठिकाना था, ना रातों की फिक्र।

मां कितनी तल्लीनता से पिताजी के पसंद का खाना बनाती थी। गांव की वो चीजें भी जो शहर में बामुश्किल मिलती हैं, कहीं-ना कहीं से मंगवा लेती थी जो पिताजी को प्रिय थीं। दरवाजे पर नजर टिकाए इंतजार करते-करते उनकी आँखें पथरा जाती। कभी एक बजे तो कभी दो बजे रात को आना पिताजी की दिनचर्या बन चुकी थी। नशे में धुत झुमते- झामते घर में घुसते, "सुमन तुम अभी तक सोई नहीं!! अरे!! बाबा कितनी बार कहा है, मेरा इंतजार मत किया करो।"

"आप हाथ मुँह धो लीजिए, मैं आपके लिए खाना परोसती हूं।"

"नहीं बाबा, मुझे भूख नहीं।"

"थोड़ा सा खा लीजिए, मैंने आपकी पसंद की साग बनाई है..."

"अच्छा इतनी जिद करती हो तो खा लेता हूं, लो बस खुश हो गई ना।"

मां के लिए उनका इतना खा लेना ही मानों संतोष दे देता था, खाना खाते ही बिस्तर पर निढाल हो जाते थे।

सुबह होते ही जब पिताजी का नशा फटता तो मानों वे शर्मिंदा से मुँह छिपाना चाहते हो "सुमन, मैं तुम्हारा गुनहगार हूं। तुम मुझे कितना सहती हो। मैं क्या करूं छोड़ना तो चाहता हूं शराब, पर मजबूर हो जाता हूं। दिल पर ना जाने कैसा बोझ लिए ढो रहा हूं, नहीं रोक पाता खुद को।"

माँ बस चुपचाप उनकी बातों को सुनती, पर शिकवा ना शिकायत, पता नहीं किस मिट्टी की बनी है। शायद दूसरी स्त्री होती तो घर में रोज महाभारत होता। पर इतना होने के बावजूद हमारे घर में बिल्कुल शांति ही शांति। कहते हैं, मां शुरू से ही ऐसी है। अथाह समुद्र सी गहराई लिए हुए जो सारी पीड़ाओं को अपने में समाहित कर लेना चाहती हों। ना जाने उनमें विश्वास का कौन सा वटवृक्ष है जो उन्हें ज़रा भी डिगने नहीं देता था। धैर्य की तो मानों प्रतिमूर्ति थीं वो। उनका अटूट विश्वास था कि वे अपनी मर्जी से पीते हैं तो खुद ही एक दिन पीना छोड़ देंगे। अपने पिता पर तरस आता है जो मां के पवित्र प्रेम व तपस्या को वे नहीं देख पा रहे थे। कहते हैं जिस घर में शराब का प्रवेश हो जाता है उस घर के बर्तन भी गिरवी रखे जाने लगते हैं। जिस पति से रत्ती भर भी सुख नसीब ना हो वहां औरत नागिन सी फुफकारती है। उन पर ताने कोसती है, उसे सही रास्ते पर लाने के लिए तरह- तरह से सबक सिखाती है। पर मां यहां न जाने किस स्त्री धर्म का निर्वाह कर रही थी, यह पूछने की कभी हिम्मत नहीं हुई। और वह पुरुष भी कैसा जो गम को भुलाने के लिए बुजदिल की तरह ऐसी चीजों का सहारा ले रहा था। जिसे वह सहारा समझ रहा था वास्तव में वह विष था, जो उसे अंदर ही अंदर खोखला करता जा रहा था। आखिर शराब भी किसी की दवा बनी है आज तक!! यह मीठी जहर मनुष्य को अपनी गिरफ्त में ले उसे एक जिंदा लाश बना कर छोड़ देती है। आखिर पिताजी के साथ भी ऐसा ही हुआ।

सोये से अचानक जगे थे उस दिन जब उन्हें मृत्यु की छाया से सीधे साक्षात्कार हुआ था। अचानक ही गिर पड़े थे वे, उनके दोनों गुर्दे खराब हो चुके थे। कभी भी जीवन उनका साथ छोड़ सकती थी और मृत्यु अपने आगोश में लेने को मचल रही थी। मनुष्य की नियति ही है खुद ठेस लगती हैं तभी वह चेतता है। जिस जीवन को उन्होंने पल-पल तरसाया अब वही उसके साथ खेल खेल रही थी। ं अब अपने जीवन के प्रति प्रेम का अंकुर फूट पड़ा था, अब उनमें जीने की एक लालसा का जन्म हो चुका था। अब वह जीना चाहते थे अपनी सुमन के लिए, अपने बेटे साकेत के लिए। जीवन भर प्यार व स्नेह के लिए तरसते रहे जिसे वह ना दे सके थे। पिताजी अपने को ग्लानी व अपराध बोध के महासागर में डूबते व उतराते हुए मां से एक याचक की भांति विनती कर रहे थे, "मुझे बचा लो सुमन, मुझे बचा लो। मैं तुम लोगों का अपराधी हूं। सुमन! मुझे तुमने कभी रोका क्यों नहीं? मैं तुमसे पल-पल दूर जा रहा था और तुम चुपचाप खामोशी से सहती रही। तुम्हारा जो मुझ पर हक था उसी खातिर कभी तो टोकती!"

मां की डब -बाई आँखें पूरे आवेग से झर्र- झर्र झरने के समान फूट निकली थी। उन्हें अपने धैर्य पर फक्र था। उनका विश्वास आज टूटने से बच गया था। सुमन को प्रतीत हो रहा था उसके जीवन में जो कैक्टस उग आए थे और दूर-दूर तक मरुस्थल ही नजर आ रहा था वह अचानक किसी नदी रुपी जल से भर गए हों। पति के न्यौछावर करते प्यार को पाकर उसका आंचल लबालब छलक रहा था। पर जिंदगी जितनी करीब लग रही थी, वस्तुस्थिति वह उनसे दूर होती चली जा रही थी।

डॉक्टर की कही एक- एक बात मेरे मन: मस्तिष्क पर वज्र की भांति पड़ रहे थे, "यदि इनके गुर्दे जल्द-से जल्द नहीं बदले गए तो बस यह चंद दिनों के मेहमान हैं।" अचानक ही प्रकाश से अंधकार में मन डोलने लगता। मैं मां की जीवन भर की तपस्या को यूं ही व्यर्थ जाने नहीं देना चाहता था। कितने बरस के बाद तो देखे थे पिता की आँखों में मां के लिए प्यार और मां की सूखती आँखों में अचानक से उतर आए मोतियों से चमक को। जिस मां के पास पहले समय ही समय होता था, अब वह कैसे दिन से रात और फिर रात से दिन आँखों-ही आँखों में काट देती थीं। पर वह अब एक पल भी जाया होने देना नहीं चाहती थीं, मानों सारे सुखों को एक बार में ही उड़ेल देना चाहती थीं उन पर। एक पल के लिए भी उनकी आँखों से ओझल नहीं होती थीं। कैसी स्त्री हैं यह? कितना त्याग करेगीं वह, अपनी तो सुध- बुध रहती नहीं, दिन- रात पति की सेवा- सुश्रुषा में लगी रहती थीं। जब पिताजी को आंख लग जाती तो वह घोर निराशा से भर जाती मानों किसी अनजाने आशंका ने उन्हें घेर लिया हो। मां के चेहरे पर उतर आए शिकन मानों मुझसे चीख- चीख कर कह रहे हो, "बेटा साकेत! बेटा, अपने पिता को किसी तरह बचा लो।"

मेरे माता-पिता के बगैर कोई अस्तित्व नहीं था। मां के सुख के लिए मैंने जो तड़प देखी थी, उनके प्रति मेरा रोम- रोम गिरवी था। अब समय आ गया था कि मैं अपने पितृ ऋण को चुका कर मां के जीवन में उजाला ही उजाला बिखेर सकूं। मां से कुछ कहे बिना पिताजी के रूटीन चेकअप के लिए अस्पताल की ओर मेरे कदम चल दिए। पर मेरा दृढ़ निश्चय कुछ और ही निर्णय ले चुका था। अस्पताल के बॉन्ड पेपर पर मैं हस्ताक्षर कर रहा था, "मैं अपनी स्वेच्छा से अपने पिता को अंगदान किडनी के रूप में दे रहा हूं, इस प्रक्रिया में यदि किसी प्रकार का खतरा या दुर्घटना होती है तो उसके लिए स्वयं उत्तरदाई होऊंगा" — साकेत।

अस्पताल के मेल वार्ड में बेड नंबर 19 और 20 पर हम पिता-पुत्र एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे। पिताजी की आँखों से कृतज्ञता के बड़े- बड़े बूंद बहकर ताकिये को पूरी तरह गीला कर चुके थे। तभी मां बदहवास सी भागी- भागी आती है। वह हम दोनों को बिस्तर पर लेटे-लेटे देखकर एक अनजान आशंका से सिहर उठती हैं, तभी डॉक्टर उन्हें सारी बातों से अवगत कराते हैं। मां बस मुक् हो कभी मुझे देखती है तो कभी पिताजी को। फिर उसके अंदर का सैलाब फट पड़ता है। वह दोनों बेडों के बीच घुटनों के बल बैठ जाती है और अपने दोनों हाथों को फैलाकर एक हाथ मेरे हाथ पर तथा दूसरा हाथ पिताजी के हाथों पर रखकर हमें ऐसे जोड़ देती है जैसे टूटे हुए सेतु पर बांध बन गया हो।
( समाप्त )


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