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कौन है वो?

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कौन है वो?
Writer: रोशनी रावत, लखनऊ, उत्तर प्रदेश


## कौन है वो?

Writer: रोशनी रावत, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

आज लगभग दो महीने हुए मुझे कॉलेज में प्रवेश लिए हुए। एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की होने के बाद भी शहर के सबसे प्रतिष्ठित महिला कॉलेज में दाखिला होना मेरे लिए बड़ी बात थी। उस कॉलेज ने मेरे लिए महत्वाकांक्षी संसार में पदार्पण के लिए भी द्वार खोल दिए थे। अभी तक मेरा जीवन मेरे अनुकूल ही चल रहा था। बचपन से ही पढ़ने में मेरी रुचि रही थी। इस कारण टीचर्स की हमेशा से प्रिय रही। इसका एक कारण यह भी था कि मैं अंतर्मुखी थी। घर में माँ-पापा की भी लाडली थी और इस स्नेह को मैंने हमेशा अपना उत्तरदायित्व इस तरह से समझा कि मैं उन्हें कभी शिकायत का अवसर न दूँ। परंतु समय अंततः सबसे शक्तिशाली होता है इतना कि वह ऐसी अकल्पित परिस्थितियां उत्पन्न कर देता है कि शेष सब अनिश्चितता के गर्त में चला जाता है; स्वयं हम भी और हमारी धारणाएँ भी।

सच कहूं तो मुझे बाहर का स्वच्छंद वातावरण भा गया। मैं अब क्लासेज करके घर पर मुरझायी कलि की तरह नहीं बसंती हवा के झोंकों से लहराती हुयी डाली की तरह आती थी। दोपहर का खाना कैंटीन में ही अच्छा लगता था। नये लोगों से मिलने-जुलने में भी अब मैं सहज होने लगी थी। दिनभर क्या-क्या हुआ, मैं सब-कुछ माँ को बताती थी और वो बस चुपचाप सब सुनती जाती थीं। मेरा इस तरह आवश्यकता से अधिक बोलना, अनावश्यक बातें करना या अपनी बातों पर जोर से हँस देना, 'कुछ कारणों' से माँ को बुरा भी लग सकता है, ऐसा मैंने कभी विचार नहीं किया था। मेरे ऐसे स्वच्छंद व्यवहार को देखते हुए हर भारतीय माँ की तरह उन्हें भी मेरी चिंता होने लगी और फिर शुरु हुआ शीत-युद्ध का घरेलू दौर।

कल दोपहर में कब नींद आ गयी, पता ही नहीं चला। शाम को नींद खुली तो देखा सात बज रहे थे; मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलने गई तो देखा माँ सामने खड़ी थीं। माँ काफी गुस्से में लग रही थी। मुझसे बिना कुछ बोले वो तेजी से कदम बढ़ाती हुयी सीधे मेरी अलमारी खोल कर खड़ी हो गयीं। कुछ ढूँढने की कोशिश कर रही थीं, उन्होंने सारा सामान तितर-बितर कर दिया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, मैंने पूछा, "ये क्या कर रही हो माँ?"

उन्होंने कोई उत्तर देना आवश्यक नहीं समझा। अब बारी मेरे बैग की थी। सारी कॉपी-किताबें उन्होंने बेड पर उड़ेल दीं। मेरे कमरे का सारा सामान अस्त-व्यस्त हो चुका था। अचानक माँ ड्रॉवर में से कुछ निकाला और मुझे घूरते हुए बड़ी गम्भीरता से पूछा, "ये क्या है विदुषी?"

मैं तो बिल्कुल सन्न रह गयी। माँ को कैसे पता चला? अब मैं क्या उत्तर दूँ? थोड़ा हड़बड़ायी फिर अपने को स्थिर करते हुए मैंने समझाने की कोशिश की, "ये... ये कुछ खास नहीं, बस घड़ी थी जो..."

"किसने दी है तुझे?" माँ का स्वर अब तीक्ष्ण हो गया।

"अरे माँ ! वो तो बस मेरी सहेली..." इससे पहले कि मैं कुछ आगे कहती माँ फिर ऊँची आवाज में एक-एक शब्द पर जोर देती हुयीं बोलीं, "जब तेरी हर जरुरतों को पूरा करने के लिए मैं हूँ, तेरे पापा हैं, तो क्या जरुरत थी तुझे दूसरे से इतना महंगा सामान लेनी की?"

माँ ने बचपन से ही मुझे सिखाया था कि 'बाहर वालों' से कोई सामान नहीं लेनी चाहिए। उनकी इस शिक्षा, या कहूँ कि नियम का मैंने हमेशा पालन किया। ये नीति जहां बचपन में सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण होती थी वहीं बड़े हो जाने के बाद ये मेरे या मेरी परवरिश की एकल उत्तरदायी मेरी माँ के स्वाभिमान से भी जुड़ गयी थी।

"अब उसने दे दिया तो मैं..." मैंने स्पष्टीकरण देने का असफल प्रयास किया, पर माँ तो कुछ सुनने को ही तैयार न थी।

"ये किसने दी है और क्यों? बर्थ-डे तो है नहीं आज तेरा?" माँ ने फिर सवाल दागा।

"मेरी फ्रेंड है स्नेहा, उसने दी थी। दिल्ली गयी थी घूमने, वहीं से मेरे लिए ले आयी थी," इस बार मैंने दृढ़ता से सब एक साँस में कह दिया। पर माँ को अब भी विश्वास न हुआ, वो बिल्कुल मेरे करीब आ गयीं। अंदर से ज्वालामुखी की तरह धधकती हुयी, पर बाहर से धीर हो कर जैसे मेरी आँखों में कुछ पढ़ती हुयी बोलीं, "तुमने इतनी सफाई से अपने ही घर में झूठ बोलना कब से सीख लिया विदुषी? 'बोलो!!"

"हम्म...मैं आपसे कहने वा..." इससे ज्यादा शब्द मेरे मुँह से नहीं निकल सके।

"कौन है वो?" माँ ने जिस गम्भीरता से कहा था मैं उस तूफान के पहले की शांति को भाँप गयी।

मैं चुप।

"बोलोगी? मैं कुछ पूछ रही हूँ!!" माँ ने चीखते हुए पूछा। इस बार माँ के धैर्य का बांध टूट चुका था, उन्होंने एक जोरदार थप्पड़ खींच कर मेरे गालों पर जड़ दिया। मैं फफक पड़ी। डबडबायी आँखें जमीन में गड़ गयीं। सिर और झुक गया। बड़े-बड़े आँसू टपकने लगे और मुँह से एक शब्द न निकल सका। माँ ने फिर चीखना शुरु किया, "अब मुँह में दही जम गया तुम्हारे, क्यों? तू पागल समझती है मुझे? बस हम लोगों को ही मूर्ख बना सकती है, क्या दुनियावाले अंधे है?" मैं खड़ी थर्रा रही थी। माँ का ऐसा रौद्र रुप मैंने आज तक न देखा था। जमीन पर ही नजरें गड़ाए रही, उनकी तरफ देखने का साहस नहीं हुआ। रोते-रोते मेरी आँखें लाल हो चुकी थीं। माँ इतने पर ही नहीं रुकी, अभी तो बहुत-कुछ सुनना था, "नहीं, तुझे क्या लगता है, ये जो चौराहे तक बाइक पर बैठ कर घर आती है तो मुहल्ले वालों की आँखें फूटी हैं? यही सब करने तुझे कॉलेज भेजा था हमने? और खड़ी तब से बेशर्मों की तरह लगातार झूठ बोले जा रही है?"

अब तो मैं फूट-फूट कर रोने लगी। माँ ने कभी मुझसे इस तरह से और न ही इस तरह की बात की थी। मैं तो जैसे जमीन में गड़ी जा रही थी। वो अभी भी लगातार बोलती जा रही थीं, "अरे! मैं तो समझती थी पड़ोसी जलते हैं, तो चार बातें बनाते हैं। समझदार है तू, पर तू? तूने हद पार कर दी है। एक बार हम लोगों के बारे में भी नहीं सोचा तूने? क्या मुँह दिखाएंगे हम? मेरा वश चले तो तेरी टांगें तोड़ दूँ!! पैदा होते ही क्यों नहीं मर गयी तू? पता नहीं किस जनम का बदला ले रही है, मनहूस!!" माँ कोसती जा रही थीं मुझे। मैं स्तब्ध थी उनके ऐसे व्यवहार पर। रोते-रोते गले में इतना दर्द होने लगा कि अब रो भी नहीं पा रही थी। कैसे समझाऊँ उन्हें, क्या बोलूँ, कहाँ से शुरु करूँ और क्या वो विश्वास भी करेंगी? अब कुछ कहने-सुनने को शेष नहीं बचा था। मैं बेतहाशा दौड़ती हुयी छत पर भाग गयी। छत पर अँधेरा था, एक कोने में दुबक कर बैठ गयी। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी ऐसी शाम भी मेरे जीवन में लिखी होगी। मैं बहुत रोयी इतना कि अब रोया भी नहीं जा रहा था। आँखें सूज गयीं थीं, गले में दर्द हो रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था कि इस पीड़ा के अलावा अब कुछ शेष नहीं मेरे पास, कहीं भी नहीं, न इस जीवन में न इस संसार में। बिल्कुल एकाकी, उस चाँद की तरह जो दूर से देखने में ऐशवर्य में डूबा हुआ, असंख्य चमकते तारों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पर वास्तविकता यह है कि वह एकाकी है नितांत एकाकी, इतना कि वह हर एकाकी मनुष्य के अकेलेपन में उसकी तमाम व्यथा-कथा सुनता है पर उसकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं होता। वह नहीं प्रकट कर पाता अपनी पीड़ा, क्योंकि वो चांद है। हाँ ! और इसीलिए सुन्दर भी, क्योंकि जिस दिन उसने उसको भी समझे जाने का आग्रह किया उस दिन से वह कुरुप हो जायेगा, अत्यंत कुरुप, इतना कि वह चांद नहीं रह पाएगा, कलुषित हो जाएगा।

आज सुबह न तो जल्दी उठने का उत्साह था और न ही मन। देर से उठी, चारों तरफ काफी चहल-पहल लग रही थी। माँ ने आज सुबह जल्दी ही घर का काम-काज निपटा दिया था। कल शाम की नाराजगी कई तरह के क्रीम, पाउडर लगाने के बाद भी उनकी मुख-मुद्रा से प्रकट हो रही थी। तभी दरवाजे पर घण्टी बजी। "इतनी समय कौन आ गया?" माँ बुदबुदाती हुयी दरवाजा खोलने गयीं। दरवाजे पर एक युवक खड़ा था, गौर वर्ण, आँखों में थोड़ा सा संकोच और होठों पर शिष्टाचार की हल्की सी मुस्कान। लपक कर माँ के चरण स्पर्श करके बोला, "नमस्ते आँटी," फिर थोड़ा झिझकते हुए पूछा, "आँटी, विदुषी है घर पर?"

इस साधारण से प्रश्न पर भी माँ ने उसे ऐसी सशंकित नज़रों से देखा मानों वह मेरे विवाह का प्रस्ताव लेकर आया हो पर फिर शिष्टाचार के नाते हल्का मुस्कुराते हुए बोली, "नमस्ते बेटा... हाँ... है विदुषी," फिर औपचारिकता के लिए बोलीं, "अरे! बाहर क्यों खड़े हो, अंदर आ जाओ...क्या नाम है बेटा तुम्हारा?"

"जी, अनिरुद्ध।"

"अच्छा-अच्छा, और विदुषी की क्लास में पढ़ते हो?" माँ को पता था कि मेरे कॉलेज में लड़के नहीं पढ़ते हैं। दरअसल माँ बस इसी प्रश्न के बहाने उसके, या कहूँ कि हमारे बारे में सब-कुछ जान लेना चाहती थीं।

"नहीं आँटी, मैं उसका..." इसी समय मैं सीढ़ियों से उतर कर ड्राइंग रूम में आ गयी और अचानक से माँ और अनिरुद्ध को साथ देख कर जड़ हो गयी।

"अनिरुद्ध यहां क्यों आए हैं और वो भी इस समय? क्या माँ ने उन्हें मुझसे दूर रहने की हिदायत देने के लिए बुलाया है? पर माँ को अनिरुद्ध के विषय में कैसे पता चला? हे भगवान! अब क्या होगा? अनिरुद्ध क्या सोचेंगें मेरे बारे में? या उन्हें खुद ही कुछ काम है, पर क्या, और इसी समय?" इतने सारे प्रश्न मेरे दिमाग में एक पल में घूम गए।

"अरे विदुषी! ये क्या हाल बनाया हुआ है अपना?" अनिरुद्ध ने मेरी सूजी हुई लाल आँखों को देखते हुए पूछा। मेरी नजर माँ पर गयी वो एकटक हम लोगों को ही देख रही थी, शायद हमारी बातों से अपने मन के संदेह को विश्वास में बदल डालने का उपक्रम कर रही थीं। मैंने प्रश्न अनसुना करते हुए अनमने मन से पूछा, "कुछ काम था आपको?"

अनिरुद्ध झेंप गये फिर बताने लगे, "तुम्हारे नोट्स स्नेहा के पास रह गए थे, तो उसने कहा कि अभी ही तुम्हें जाकर दे दूं, क्योंकि हम लोग सप्ताह भर के लिए मामा जी के यहां जा रहे हैं, नहीं तो तुम्हें परेशानी होगी।"

"दीजिए, बैंक यू..." इतना कहकर मै उनके हाथ से नोट्स लेकर सीढ़ियों से ऊपर जाने के मुड़ गयी।

"तुम्हें भी तो आज ..." अनिरुद्ध ने अपनी खीज मिटाने के लिए दो-एक बातें अपनी तरफ से बढ़ानी चाही पर माँ के वहाँ खड़े होने के अहसास से वो इस अनावश्यक प्रश्न को पूरा नहीं कर पाए। वैसे मैं भी नहीं चाहती थी कि ये प्रश्न पूरा हो, क्योंकि मैं इसका पूर्ण उत्तर नहीं देना चाहती थी। इस प्रश्न के सामने आते ही जिस अभाव, जिस एकान्त, जिस उत्तरदायित्व, और जिस वीभत्स घटना के दृश्य से मैं खुद को घिरा पाती थी उसकी कल्पना भी मेरे लिए असहनीय थी और विशेष रुप से इस दिन। मुझे याद है बचपन में मैंने माँ-पापा से कई बार इस बात का जिक्र किया था, पर हमेशा मुझे चॉकलेट पर लपेटे हुए आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। आज वो प्रश्न फिर मेरे सामने था। मैं उत्तर नहीं देना चाहती थी पर पता नहीं उस समय मेरे अंदर क्या टूट गया था कि मैंने हृदय को पत्थर करते हुए, भरे गले से कह दिया, "मेरा कोई भाई नहीं है अनिरुद्ध, और न ही मैंने आज तक किसी को तब से राखी बांधी है। मुझे कभी भाई का स्नेह नहीं मिला।" थोड़ा रुक कर, "तुम्हें पता है? मेरा भी एक भाई था, पर मैं बहुत मनहूस हूँ अनिरुद्ध... आज से 12 साल पहले कार एक्सीडेंट में मर गया वो... मैं तब चार साल की थी, सब कहते हैं मुझे बचाने की कोशिश में वो कार के नीचे आ गया था।" मैं फिर चीखते हुए बोली, "मैंने उसे अपनी आँखों के सामने तड़पता देखा है अनिरुद्ध, अपने सामने... मैं ही क्यों नहीं मर गयी तब, मैं ही मर जाती तो... तो..." और मैं फूट-फूट कर रोने लगी।

मुझे इस तरह रोता देख कर माँ भी भावुक हो गयीं थी। उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए मुझे गले से लगा लिया। शायद आज उनके पास मुझे आश्वासन देने के लिए शब्द नहीं थे। अनिरुद्ध मेरे पास आकर मेरी हथेलियों को अपने हाथों में लेते हुए बोले, "मैं हूँ न विदुषी।"

मैंने आँसुओं से भरी धुंधली दृष्टि से उनकी तरफ देखा। वो आगे बोले, "तुम जानती ही हो कि मैंने कभी तुममें और स्नेहा में कोई भेद नहीं किया। तुम अगर मुझे आज राखी बांधोगी तो मैं तुमसे वादा करता हूँ कि तुम्हें एक सगे भाई से भी अधिक स्नेह करुंगा। जीवन में कैसी भी परिस्थितियां हों मैं हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा।"

मैं वैसे ही बैठी, गम्भीरता से उनकी बातें सुने जा रही थी। वातावरण का तनाव दूर करने के लिए उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरे कंधे पर हल्का-सा हाथ मारते हुए कहा, "तुम कभी खुद को अकेला महसूस न करना अब, तुम्हारा भाई है तुम्हारे साथ। क्यों, अब तो बांधोगी न मुझे राखी?" इतने दिनों के बाद इतनी आत्मीयतापूर्ण बातें सुनकर मेरे आँसू थम गये थे। मैंने आँसू पोंछते हुए "हाँ" में सिर हिला दिया। एक स्नेहिल, निर्दोष मुस्कुराहट के साथ राखी लाने के लिए एक निश्छल शिशु की तरह मैं उठ खड़ी हुयी, एक आहत दृष्टि से माँ की तरफ देख कर कमरे के भीतर चली गयी। माँ स्तब्ध थीं अनिरुद्ध की कही बातों से। शायद हमारा रिश्ता उनकी कल्पना और हमारे "समाज" की मानसिकता से परे था, या शायद इस रिश्ते की पवित्र स्नेहिल डोर की निष्कलुषता, निश्छलता मेरे और अनिरुद्ध के अतिरिक्त और कोई समझ ही नहीं सकता।
( समाप्त )


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