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गुमनाम मोहब्बत - Part 2

Hindi Short Story

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गुमनाम मोहब्बत - Part 2
Writer: सुरभि सिंह, लखनऊ
( Winner January, 2022 )


## गुमनाम मोहब्बत - Part 2

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वो उसे 'विशेष' की मौत का जिम्मेदार ठहरा रहीं थीं। एक दिन तो वह लतिका को अपने घर से निकालने को तैयार हो गईं ये कहकर कि, लतिका का इस घर और जायदाद में कोई हिस्सा नहीं है।

उस रोज हमारी सहनशक्ति ने जवाब दे दिया। हम आगे आये और लतिका के लिए आवाज उठाई। माँ से उनके बर्ताव की वजह पूछी तो वह बड़ी बेरुखी से बोली थीं, जब बेटा ही नहीं रहा तो बहू कैसी?

हम ठगे से खड़े थे उन दोनों के बीच। एक तरफ माँ की आँखें अंगार उगल रही थीं, वहीं दूसरी तरफ वो खड़ी थी जमीन पर पड़े हुए अपने सूटकेस के पास, जैसे कोई भावविहीन पत्थर की मूरत। अब तो उसकी आंखों से आँसू भी नहीं बहते थे। वह कुछ बोलती भी तो नहीं थी। खाती-पीती भी कहाँ थी। उसे देखकर ऐसा लगता मानो वो सांस लेने के अलावा बाकी सबकुछ भूल चुकी हो। अपनी माँ का रवैया और उसपर बाबूजी का मौनव्रत देखकर हम काफी शर्मिंदा थे। इसीलिए हमें वो फैसला लेना पड़ा जिसे स्वीकार करना हम दोनों के लिए बहुत कठिन था। पति को मरे हुए छः महीने भी ना गुजरे हों और दूसरी शादी करना!!

सच में, किसी भी इज्जतदार लड़की के लिए ये फैसला जहर पीने जैसा था, और उसने ये जहर पिया। हमारे फैसले को चुपचाप सिर झुकाकर स्वीकार कर ली। शादी करली हमसे। पर शादी की पहली रात ही साफ-साफ कह दिया था उसने, "अपने बच्चे के लिए ये शादी किया है हमने। पति के रूप में आपको स्वीकार नहीं कर सकते..."

गंगा कसम, हमें जरा सा झटका नहीं लगा। आखिर हमने भी तो अपने इश्क के लिए ये शादी की थी। वो इश्क जो हमारा होकर भी हमारा ना था, जो हमारी लकीरों में तो था पर उनके दिल को गंवारा ना था।

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आशीष की डायरी बन्द करते ही लतिका फफककर रोने लगी। शादी के साल भर बाद उसे आशीष की गुमनाम मोहब्बत का पता चला तो वह अपने जज़्बातों को संभाल ना सकी। आशीष अच्छा इंसान था, उसकी परवाह करता था; उसे सम्मान देता था और सबसे बढ़कर उसने उसके बच्चे को बाप का प्यार दिया था। शुरुआती दिनों में लतिका उसके साथ काफ़ी बेरुखी से पेश आई थी। हमेशा उखड़ी-उखड़ी सी रहती थी। खैर इसमें पूरी तरह से उसका दोष नहीं था। परिस्थितियों ने काफ़ी चिड़चिड़ा बना दिया था उसे। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, हालात भी करवट बदलने लगे। बच्चे के आ जाने पर तो खुशियों ने फिर से उसका दरवाजा खटखटाया था। उसके दिल पर जमी बेरुखी की बर्फ़ अब आशीष की परवाह की आँच पाकर पिघलने लगी थी। अपने बच्चे के लिए आशीष का प्यार देखकर, उसका सुलझा हुआ स्वभाव देखकर, लतिका के दिल में भी कुछ एहसास पनपने लगे थे। वह उसे स्वीकार करने लगी थी अपने पति के रूप में। तभी तो अब वह अपने कपड़ों के साथ- साथ आशीष की शर्ट भी प्रेस कर दिया करती थी। ऑफिस से लेट आने पर उसका इंतजार किया करती थी। उसकी पसंद और ना-पसन्द का भी ध्यान रखने लगी थी। अब वो थोड़ा बहुत सजने-सँवरने लगी थी, जैसा आशीष को पसंद है। वह आशीष के रंग में रंगना चाहती थी, शायद इसीलिए उसे आशीष की बेपरवाही कुछ-कुछ खलने लगी थी। उसका स्नेहापेक्षी मन अब खुद से शिकायत करता था। पूछता था कि, क्यों कभी आशीष उसे नज़र उठाकर नहीं देखता? उसके काम की, उसके पकवान की हर चीज़ की तारीफ़ करता है, लेकिन उसकी तारीफ़ क्यों नहीं करता? अपनी तरफ़ आशीष की बेपरवाही उसे खटकती थी। उसकी नज़रें आशीष की आंखों में अपने लिए प्यार देखने के लिए तड़प रही थीं। अभी दो महीने पहले जब वह अपने घर आई थी तो उसने अपने दिल का हाल वैष्णवी से बताया था, जो बचपन से इसी मोहल्ले में रहती थी। और स्कूल के दिनों में आशीष की ही क्लास में पढ़ती थी।

"यार मुझसे ग़लती तो हुई है इन्हें पहचानने में, लेकिन अब मैं सब कुछ ठीक करना चाहती हूँ। इनके दिल में अपने लिए जगह बनाना चाहती हूं," लतिका के इतना कहते ही वैष्णवी बोल उठी थी, "इम्पॉसिबल है यार। क्योंकि आशीष का दिल खाली नहीं है।"

"मतलब?" लतिका हैरान हो गई थी।

"मतलब क्या यार, पूरे क्लास को ये बात पता थी कि आशीष किसी लड़की से बड़ी शिद्दत वाली मोहब्बत करता है। उसके दिल में कोई और है लतिका," वैष्णवी ने लतिका के सिर पर ऐसा बॉम्ब फोड़ा था कि वो कुछ समझ ही नहीं पा रही थी। कहने को बस उसके मुँह से इतना ही निकला था, "कौन थी वो?"

"पता नहीं यार। पर जो भी थी, कोई बेवकूफ ही थी। सुनने में आया था कि आशीष की गुमनाम मोहब्बत अधूरी ही रह गई। यार कभी-कभी तो मुझे आशीष पर तरस आता है। प्यार में बेवफाई मिली और बीवी के नाम पर परजाई मिली," वैष्णवी हँसी थी लेकिन लतिका नहीं हंस पाई। बहुत बेहूदा मज़ाक किया था उसने। वैष्णवी मुँहफ़ट स्वभाव की थी// लतिका को उसकी खरी-खरी बातों का कभी बुरा नहीं लगा था, पर उस दिन उसकी वो बात दिल को भेद गई थी। बहुत चुभी थी उसे दिल में; इतनी कि, उसकी बातें याद करके लतिका रात-रात को जाग जाया करती थी। बाहर कमरे में आकर दिवान पर लेटे हुए आशीष को घंटों निहाराती थी। कभी आँसू बहाती थी, तो कभी सूनी आँखें उसके चेहरे पर टकटकी लगाए रहती थीं। उस वक्त वो यही सोचा करती थी कि इस देवता के निश्छल प्रेम को कौन नहीं पहचान सका? कौन है वो अभागन, जो उसके गुमनाम मोहब्बत को मुक़म्मल मोहब्बत का करारनामा ना दे सकी?

आज लतिका के हर सवाल का जवाब इस डायरी ने दिया था। आज उसे पता चला था कि वो अभागन कोई और नहीं बल्कि वो ख़ुद है, जो कस्तूरी की तलाश में जंगल जंगल भटक रही है। जबकि आशीष रूपी कस्तूरी उसके मांग के सिंदूर में महकती है, सुहाग की चुड़ियों में खनकती है, और पैरों में लगे चटक महावर के रंग में दमकती है। हकीकत से रूबरू होते ही लतिका डायरी को सीने से लगाकर बस रोये जा रही थी।

"लतिका देखो लवी रो रहा है," आशीष कमरे में आया तो लतिका को रोता देखकर घबरा गया। वह तुरंत उसके पास आया लेकिन अगले ही पल दूर हो गया। अभी तक लतिका ने उसे करीब आने की इजाज़त नहीं दी थी। "क्या हुआ?" आशीष के पूछते ही लतिका उससे लिपट गई। लतिका के सीने से लगते ही आशीष को यूँ लगा मानो आत्मा का कोई खोया हुआ टुकड़ा उसे वापस मिल गया। अपनी मोहब्बत को अपनी बाहों में भरने के लिए उसका दिल मचल उठा। लेकिन अगले ही पल आशीष ने अपने दिल में उमड़ते जज़्बातों पर काबू पा लिया। वह यूँ ही खड़ा रहा। "अरे लतिका! बताओ तो सही। क्या हुआ है? मेरी जान निकल रही है।"

वह सच में परेशान था। लतिका के आँसू उसकी कमज़ोरी थी। वो उन सागर जैसी आँखों से बहते मोती नहीं देख सकता था।

"मुझे लगा मुझ पर तरस खाकर आपने मुझसे शादी की है। पहले क्यों नहीं बताया कि मैं ही आपका वो गुमनाम इश्क़ हूँ?" लतिका सुबकते हुए बोली तो आशीष हैरानी में पड़ गया। अचानक से ये बात कहाँ से आ गई? वह सोच ही रहा था कि तभी उसकी नज़र उस भूरी डायरी पर पड़ी जिसे वह पहले कभी लिखा करता था। उस वक़्त वो तन्हा महसूस करता था लेकिन वक़्त बीतने लगा। पहले लतिका की देखभाल और फिरअब उसका बेटा लवी। वह परिवार में रम गया। लवी और लतिका के आगे पीछे उसकी दुनिया घूमती थी, भला अब तन्हाई में बैठने का समय कहाँ था उसके पास। लेकिन लतिका के हाथों में डायरी देखकर वह समझ गया कि आज तन्हाई ख़ुद उससे अलविदा लेने आई है। "मैं बहुत परेशान हो गई थी।" सुबकते हुए लतिका आगे बोली तो आशीष की तन्द्रा टूटी। "क्यों? परेशान क्यों हो गई?" वह मुस्कुराया था, आज फिर लतिका की मासूमियत पर वह अपना दिल हारने को तैयार था।

"अरे क्यों का क्या मतलब? कौन सी बीवी सुखी होगी अपने पति की गुमनाम मोहब्बत के बारे में सुनकर?" लतिका ने आहिस्ते से कंधे पर चपत लगाई थी। यूँही झूठी नाराज़गी में उसने अपनी मोहब्बत जताई थी।

"मम्म... पति.. हाँ..? तुम मुकर रही हो अपनी बातों से लतिका," होंठो पर शरारती मुस्कान लिए आशीष ने अपनी बात पूरी भी नहीं की कि लतिका ने अपनी हथेलियां उसके होंठों पर रख दी। आँखों में आँखें डालके बोली, "आशीष! अगर मैं कहूँ कि मैं अतीत की हर बात से मुकरना चाहती हूँ तो? अगर मैं कहूँ कि इस रिश्ते की नई शुरुआत करना चाहती हूँ तो..."

"तो लतिका मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान होऊँगा जिसे उसका गुमनाम इश्क़ मुक़म्मल हुआ है," कहते हुए आशीष ने लतिका का माथा चूमा और उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसकी गुमनाम मोहब्बत उसकी बाहों में सिमटी हुई मुस्कुरा रही थी।
( समाप्त )


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