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गुमनाम मोहब्बत

Hindi Short Story

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गुमनाम मोहब्बत
Writer: सुरभि सिंह, लखनऊ
( Winner January, 2022 )


## गुमनाम मोहब्बत

Writer: सुरभि सिंह, लखनऊ

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"मोहल्ले का इश्क तो डॉक्टर और इंजीनियर ले जाते हैं। "

हम फिल्म के इस डायलॉग को इतनी गम्भीरता से ले लिए कि पहले प्रयास में जे.ई. की परीक्षा निकाल ली। "अब तो मोहल्ले का ही इश्क है और मोहल्ले का इंजीनियर भी। अब तो उनके पापा मान ही जाएंगे, " उस रोज़ रिज़ल्ट देखकर यही सोचा था हमने। फिर क्या था, उधर बाबूजी बेटे के इंजीनियर बनने का ख्वाब देखने लगे और इधर बेटा यानि कि हम उसे अपनी दुल्हन बनाकर अपने घर लाने के ख्वाब सजा रहे थे। भला इंजीनियर लड़के को उसके बाबूजी कैसे ठुकराएंगे। बेटा आशीष इस बार तो 'दुल्हनिया दिलवाले ही ले जाएंगे, ' मन-ही मन ख्याली पुलाव पकाते हुए हम रुड़की आई. आई. टी. कॉलेज के लिए निकल लिए और बड़ी शिद्दत के साथ इंजीनियरिंग पूरा करने में लग गए। आधी-आधी रात तक बैठ कर असाइनमेंट बनाते थे और जब थककर बिस्तर पर लेटते तो उसका चेहरा ज़हन में उतर आता। गेहुआँ रंग, गोल चेहरा, काली-काली बड़ी सी खूबसूरत आँखें और गुलाबी होठों के पास वो छोटा सा तिल। जब पहली बार उसे देखा था तो वो गुलाबी सूट में सकुचाई हुई सी मेरे दरवाजे पर खड़ी थी। मोहल्ले में नई-नई आई थी तो पानी आने का समय नहीं जानती थी। अपनी माँ के कहने पर हमारे घर पूछने आई थी, तभी देखा था उसे। कंधे पर सरकती उस धानी चूनर को वो गर्दन झुकाये बार-बार ठीक कर रही थी। उसके लहज़े में बड़ी मासूमियत थी, और बस वहीं दिल दे बैठे थे हम। उससे कभी नहीं कहे कि तुमसे प्यार है। पर उसकी शर्माती नजरों ने बयां किया कि उसे भी इककरार है।

कह देना चाहिए था यार। आज ये दिल रोज़ पछताता है। हमारा माथा ठनक गया था जब बाबू जी ने हमसे चहकते हुए बताया कि 'विशेष की शादी तय कर दी है अपने शर्मा जी की बेटी लतिका के साथ।

"लतिका के साथ!!" हमारे पैरों तले जमीन सरक गई थी। गलत सुना हो इसी उम्मीद में दोबारा पूछे थे, लेकिन दोबारा भी बाबू जी का जवाब वही रहा। ऐसा लगा था मानों किसी ने कानों में पिघला हुआ कांच उतार दिया हो। फिर क्या था... दो पल बाद फ़ोन की लाइन डिस्कनेक्ट हो गई, ठीक शादी के दिन हमारा एग्जाम पड़ गया... और बाबू जी ने हमारे हर झूठ को सच मान लिया। हाँ झूठ बोल दिया हमने। ये जानते हुए भी कि हमारे एकलौते भाई की शादी है, हम घर नहीं गए। और क्या करते, हम लतिका को घर लाने का ख्वाब जरूर देखते थे, पर अपनी दुल्हन बनाकर, भाभी बनाकर नहीं।

विशेष की शादी के छः महीने बीत गए लेकिन हम घर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। घर वाले भी हमारी गमज़दी को हमारी मशरूफ़ियत समझते रहे। एक दिन फ़ेसबुक पर विशेष के साथ उसकी एक तसवीर देखी थी हमने। हमेशा की तरह वह उस दिन भी खूबसूरत लग रही थी। बंधानी छाप की वो गुलाबी साड़ी, उसकी श्वेतवर्णी काया पर खूब खिल रही थी। वैसे ही जैसे गुलिस्ताँ में खिला हुआ गुलाब। उसकी कलाईयों में लाल चूड़ियाँ, माँग में सिंदूर। उसके चेहरे से नूर टपक रहा था। सच कहें तो एक पल के लिए हम भूल ही गए कि वह हमारे भाई की पत्नी है, लेकिन जब उसके कंधे पर विशेष का हाथ देखा, तो सब कुछ याद आ गया। ना जाने उस वक्त क्या हुआ था हमें, अपने भाई में प्रतिद्वंद्वी नज़र आ रहा था। उस तस्वीर को देखकर ऐसा लग रहा था मानो विशेष ने हमसे हमारी कोई बहुत खास चीज़ छीन ली हो। मानों हमें कोई ऐसी मात मिली हो जिसका मलाल हमें अंदर-ही अंदर दीमक की तरह खाये जा रहा था। खैर हार भी मिली और मलाल भी। हमने एक पल की देर नहीं की, तुरंत विशेष को फेसबुक पर ब्लॉक कर दिये। उससे बात करना भी बंद कर दिया। जब फ़ोन आया तो काटकर स्विच ऑफ़ कर दिया।

"फ़ोन उठा लेना चाहिये था।" एक और पछतावा हमारे नसीब में लिखा था। लेकिन तब कहाँ पता था कि ये विशेष की आख़िरी कॉल होगी। एक दिन फोन आया कि रोड एक्सीडेंट में विशेष की मौत हो गई। ख़बर सुनते ही हम घर के लिये निकल पड़े। उस वक्त एक पल को भी उसका ख़्याल ज़हन में नहीं आया, लेकिन गेट पर पहुंचते ही क़दम ठिठक गए। विशेष के शव के पास बैठी, वो दहाड़े मारकर रो रही थी। शादी के सिर्फ छः महीने बीते थे और सुहाग उजड़ गया। उसका दुख अपार था, मेरे दुख के आगे। विशेष जाते-जाते हमारे परिवार को अपना अंश देकर गया था। वो विशेष के बच्चे की माँ बनने वाली थी। प्रेग्नेंसी कॉम्प्लिकेटेड थी। डॉक्टर के अनुसार, उसे सहारे, परवाह और प्यार की जरूरत थी। और हमारी माँ को दिमागी इलाज की जरूरत थी। ना जाने आस-पास के लोगों ने उन्हें ऐसी कौन सी पट्टी पढ़ाई थी कि उन्हें अपनी बहू यानि लतिका मनहूस लगने लगी थी।
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