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दादागिरी

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दादागिरी

Writer: H.P.Sarkar, Dhaleswar-13, Agartala, Tripura (W)

✿ एक राज-दरबार में एक दिन एक तगड़ा और हट्टा-कट्टा अपराधी को पेश किया गया। उसका नाम है बिधु। वह बचपन से ही बोल नहीं सकता। उसके खिलाफ कई सौ आरोप है। मगर सारे आरोप एक जैसा ही है, लोगों को मारने-पिटने का आरोप। बिधु जब-तब किसी को मारता-पिटता था।

बिधु को जब राज दरबार में हाजिर किया गया तब सबने देखा कि उसके चेहरे पे कोई भी डर नहीं है, शिकन नहीं है और कोई अपराध बोध भी नहीं है। देखके लग रहा था कि वह बिलकुल् मज़े में है। उल्टा उसके चेहरे पे एक खुशि की लहर थी। ये देखके राजा और महामंत्री को ख़ूब आश्चर्य हुआ। दोनों मन ही मन सोचने लगे, कोई भी अपराधी राजा के सामने इतना निडर, शांत और खुश नहीं हर सकता। ज़रुर कोई बात है। महामंत्री राजा के कान में बोले और राजा ने आदेश दिया कि बिधु को छोड़ दिया जाय।

बिधु खुशि खुशि राज दरबार से चला गया। मगर उसके पीछे पीछे एक गुप्तचर भी चलने लगा। ये बात राजा और महामंत्री के अलावा और कोई नहीं जानता था। बिधु आपने घर की ओर चलने लगा। उस रास्ते में एक साधुबाबा एक पेड़ के नीचे बैठके, हाथ में माला लिए ध्यान कर राहा था। एक नन्हा सा बच्चा टुक-टुक चलते चलते साधु के सामने आते ही ठोकर खाके गिर गया और रोने लगा। रोने की आवाज सुनके साधु ने आँखें तो खुलीं मगर बच्चा को नहीं उठाया और फिर से आँख बंध करके ध्यान करने लगा। नन्हा सा बच्चा नहीं उठ पा रहा था और रो रहा था। दूर से ये सब देखके बिधु भाग के गया और बच्चा को उठाके गोद में लिया। फिर उसने उस साधु के उपर लाथों की बरसात शुरु कर दी। लाथ, घूँसे खाते खाते, अपना माला हात में लिए वह साधु दौड़के वहा से भाग गया।

कुछ दूर जाते ही और एक घटना हुई। एक बहुत ही वृद्ध भिखारी एक दूकन के सामन खाड़ा होके खाना माँग रहा था। अचानक वह दूकानदार बाहर आया और उस भिखारी को धाक्का मारके गिरा दिया। ये देखके बिधु यहाँ भी भागके गया। बिधु को देखते ही सबको मालुम चल गया कि अब क्या होगा। और वह दूकानदार, बिधुको देखते ही पहले से ही सोर मचाने लगे ‘वचाओ वचाओ’। आस पास के लोग आते आते उस दूकानदार के उपर से लाथ-घूँसों का एक तूफान निकल गया। आस पास के सिपाही भी आए और बिधु को फिर से बंदी बनाके राज दरबार ले गए।

वह गुप्तचर भी ये सव छिप छिप के देख रहा था। गुप्त घर में जाके उसने सारी बातें महामंत्री को बातईं। महामंत्री ने तब राज दरबार में सबको सारी बातें खुलके बाताईँ। राजा बहुत खुश हुए और उन्होंने बिधु को नगर सेवक नियुक्त किया। बिधु भी बहुत खुश हुआ और दिल से, निष्ठा से अपना काम करने लगा।
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