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भवानी और चोर उस्ताद

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भवानी और चोर उस्ताद

Writer: H.P.Sarkar, Dhaleswar-13, Agartala, Tripura (W)

✿ राज दरबार में एकदिन एक चोर को हाजिर किया गया। बहुत दिन से सैनिकों को उसकी तलाश थी। मगर वह पकड़ में नहीं आ रहा था। अब पकड़ में आया। राजाने उसे प्राणदंड़ दिया।

वह चोर खुद को बहुत सयाना समझता था, बहुत बड़ा उस्ताद समझता था। उसे चोरी करने में मजा आता था और वह समझता था कि कोई उसे नहीं पकड़ सकता। मगर वह नहीं जानता था कि उस्तादों के भी उस्ताद रहते हैं। अब जब उसे पकड़ लिया गया और उसे मौत की सज़ा हुई तो उसे कठिन वास्तव का एहसास हुआ। वह बहुत रोने लगा और महाराज से प्राण भिक्षा माँगने लगा।

राजाने कुछ सोचा और फिर उसे एक शर्त पर छोड़ने के लिए राज़ी हुए। शर्त यह थी कि उसे एक आदमी का नौकर बनके एक साल रहना पड़ेगा। पास के शहर में भबानी नाम का एक आदमी रहता है। वह बहुत ही सज्जन, ईमानदार और ज्ञानी है। चोर को एक साल तक भवानी का नौकर बनके उसके साथ रहना पड़ेगा। एक गुप्तचर हमेशा चोर के उपर नजर राखेगा।

अपना प्राण बचाने के लिए चोर तुरंत राज़ी हो गया। वह मन में सोचा “यह भागने का एक अच्छा मौका है। दो दिन वहाँ रहके मौका देखके भाग जाएँगे। मैं तो भागने में उस्ताद हूँ। ”

राजा ने एक चिठ्ठी और दो सिपाही के साथ चोर को भवानी पास भेजा। भवानी पास जाके चोर ने देखा यह तो एक साधारण घर है। यहा से भागने में कोई दिक्कत नहीं होगी। और भवानी भी बहुत ही दुबला पतला है। एक धकका सँभलना ही उसके लिए मुशकिल हो जाएगा। चोर सोच रहा था राजा ने उसे ऐसी असान छूट क्यों दी है?

घर के पास ही भवानी की थोड़ी सी जमीन थी। वह उसमें ही खेती-बारी करता था। पहले दिन भवानी उस चोर को साथ लेके अपनी ज़मीन में काम करने गए। चोर ज़मीन देखकर दंग रह गया। थोड़ी सी जमीन में ही एसी फसल हई जो बहुत बड़ी जमीन में होती है। वह भवानी के पीछे पीछे चलने लगा और फसलों को देखके हैरान होने लगा। वह समझ गया कि भवानी जमीन और खेती-बारी में माहिर है। वह उत्साह से भवानी को यह-वह पूछने लगा। भवानी भी उसे जबाव देने लगा। बातों बातों में चोर ने जाना, बहुत बार देश के कई हिस्सों में जब फसलें बरबाद होने के कगार पर थीं, राजा ने भवानी की सलाह माँगी और फसलों को बचाया।

भवानी और चोर जब जमीन से घर लौटे तो उन लोगों ने देखा कि एक धनी सेठ हात जोड़े खड़ा था। उन्होंने भवानी को कल अपने घर में खाने के लिए बुलाया। धनी सेठ चला जाने के बाद वहाँ, उस गाँव के एक गरीब किसान आया। उसने हात जोड़के भवानी से कहा “मेरी लड़की की सादी तय हुई है। मगर घर में एक पैसा नहीं है। अब आप ही मेरा सहारा है। आप ही मुझे बचाईए। ” भवानी ने कुछ सोचा और फिर एक चिठ्ठी लिखके उसके हात मे थमा दी। उसने वोला “ कल तुम राज दरबार में चले जाना और यह चिठ्ठी उनको दिखाना। तुम्हें एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ मिल जाएगीं। लेकिन धीरे धीरे आधा रक़म तुम्हें चुकानी पड़ेगी। ” वह गरीब किसान खुशि से रोने लगा। वह भवानी को बहुत दुआएँ देकर चला गया। और चोर वहा खड़े- खड़े हिसाब करने लगा कि सौ स्वर्ण मुद्राएँ चुरी करके जमाने के लिए उसे तिस साल लगेंगे और राजा सिर्फ एक चिठ्ठी पे भरोसा करके उसे सौ मुद्राएँ दे देंगे! उसके मनमें नए विचारों का एक तूफान आया।

अगले दिन वे दोनों उस सेठ के घर गए। जब खाना परोसा गया तो चोर हैरान हो गया। एसा खाना वह कभी देखा ही नहीं था। उसने जाना कि एक बार ईस सेठ को व्यवसाय में बहुत नुकसान हुआ। अपना व्यापार बचाने के लिए उन्होंने भवानी से सहायता माँगी। भवानी के कहने पर राजाने उस सेठ को दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ ऋण दे दी। दस हजार स्वर्ण मुद्राओं की बात सुनके चोर अचंबा रह गया। वह सोच ही न पाया कि दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ कमाने में उसे कितने साल लगेंगे और राजा, भवानी की एक बात पे इतनी सारि मुद्राएँ सेठ को दे दिए! उसके मन में एसा तूफान उठा कि उसके विचार ही बदल गए। वह सोचने लगा “एक भले इंसान अगर अपने विचार और कर्म के गुण से इतना सव कर सकता है तो मैं क्यों गलत रास्ते में जाकर चोरी करके मरने चला था। ”

उसी दिन से वह तन मन से भवानी के पास खेती-बारी सिखने लगा। देखते ही देखते दो, तीन साल बीत गए। बाद में एक दिन वह भवानी के कहने पर राज दरबार में हाजिर हुआ। राजा उस चोर में यहीँ परिवर्तन चाहते थे और वे चोर को इस रूपमें देखके खुश हुए। राजा ने चोर को थोडी सी ज़मीन दे दी। चोर खुशि से वहाँ खेती-बारी करने लगा। वह अपने उस्ताद की तरहा इतना उस्ताद तो नहीं बन पाया लेकिन लोग उसे उस्ताद ही मानने लगे।
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