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भीगता छाता

Winner of the Hindi Story Competition 'नगेन्द्र साहित्य पुरस्कार', 2020

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भीगता छाता
Writer: Priyanka Gaur, Ghodasar, Ahmedabad 380050
Winner of the Hindi Story Competition 'नगेन्द्र साहित्य पुरस्कार', 2020


"सांवरी जल्दी से छाता दे। मेरा भाई मनीष कनाडा से आ रहा है," सीढ़ी उतरते हुए मेनिका अपनी नौकरानी से बोली, "मेरा प्यारा छाता देना, जिसमें मैं बिलकुल न भीगूं।"

"क्या दीदी छाता लेकर जाएंगी। डिरिवेर....."

"डेरिवेर नहीं ड्राइवर! मुझे क्या पता था; छुट्टी दे दी। रेनी डे। खुद ही जाउंगी।" सांवरी ने छाता लाकर मेनिका को दिया।

मेनिका दिल्ली में बड़ी कोठी में अपने परिवार- माता, पिता और छोटी बहन के साथ रहती थी। भाई मनीष कनाडा से ट्रेनिंग लेके लौट रहा था। सब हरिद्वार बुआजी के पास गए थे। मेनिका की परीक्षा थी इसीलिए वह नहीं गयी। पिताजी का गारमेंट्स का अच्छा व्यापार जम गया था। घर पर नौकरों की कमी नहीं थी, जिस कारण मेनिका ने बाहरी दुनिया बहुत करीब से नहीं देखी थी। उसे गरीबी पसंद नहीं थी।

"अचानक आने की सोची, अब मैं क्या करूँ। प्लेन से भी तो नहीं आ रहे ।"

"मेनू मुंबई तक प्लेन से आऊंगा, फिर दिल्ली तक भारतीय रेल में। बहुत याद आ रही है भारत की मिटटी," मनीष ने सुबह फोन पर कहा था।

“भारत की मिट्टी यह भी कोई याद करने की चीज है?”' अपने−आप से बात करते हुई मेनिका ने गाड़ी स्टार्ट की। रेलवे स्टशन पर गाड़ी पार्क की और छाता खोल बाहर आ गयी। यूं तो मनीष अपने−आप ही आ जाता, पर मेनिका का मन नहीं माना।

5 बजे वह स्टेशन पहुँच गयी, गाड़ी आने मैं अभी समय था। "ओह! एक घंटा..." मेनिका स्टेशन के अंदर जाते हुई बोली। "माई कुछ देती जा, भूखे को खिला" एक भिखारिन बोली।

"हटो जाओ यहाँ से।" मेनिका झेंपते हुए बोली। हर तरफ भीड़, पानी के कारण कीचड़, छम-छम टीनों से गिरता पानी, सबसे चिढ़ हो रही थी। “क्या सजा दी भैया ने भी। इस बेकार सी जगह.... उफ एयरपोर्ट कितना साफ होता है।“ वह सोचने लगो।

उसने टिकट खिड़की से पूछा, पता चला ट्रैन दो घंटे लेट है। "अरे नहीं। आज का दिन ही खराब है।" वह वहीं पास की बेंच पर बैठ गयी। हर तरफ चहल- पहल थी। चाय... चाय... पकौड़े... पकौड़े... कुली.. कुली...सब अपने काम में व्यस्त। पानी की गिरती बूंदों को वह पहली बार गौर से देख रही थी। उसने सुहेला को भी कहा था। सुबह की ही तो बात है, भैया का फोन आने से पहले। "हेलो, सुलेहा है? मैं मेनिका सोमनाथ।"

"एक मिनट" कुछ पल बाद। "हाँ, मेनू क्या बात है।" "सुही, देख मैं तेरे साथ कितनी बार मार्केट गयी हूँ न। हैं न? ""

"हाँ जी।"

"तो मुझे आज इंडिया गेट जाना है, पिनी से मिलने। लंदन से आयी है, याद है न पिनी।"

"हाँ, पर मेनू मुझे स्टेशन जाना है, मामाजी आ रहे हैं।"

◕ अकेले ही पिनी से मिल आयी। वहीं भैया का फोन आया। सोचा सुहेला का साथ होगा। पर उसने तो...."अरे...वो क्या है न, मामाजी परसों आएँगे तो मैं घर पर ही काम करूँगी। सॉरी यार।" तभी सामने ट्रैन की रुकने की आवाज से मेनिका की तन्द्रा टूटी। एक बूढ़ा व्यक्ति उस ट्रैन के डिब्बे में बार-बार झाँक रहा था। सिर पर साफा, भूरो कोटी, धोती चमक रही थी। उस बरसाती कीचड़ में भी वह स्वच्छ लग रहा था। बूँदें और तेजी से गिरने लगी। मेनिका ने छाता खोला और उस तरफ चल पड़ी। "बाबा बारिश हो रही है, आप किसे ढूँढ़ रहे हैं?" उस बूढ़े ने मेनिका को देखा।

झुर्रियाँ भरा संतोषभावी चेहरा। श्वेत बालों पर करीने से बंधा साफा, चश्मा। एकदम सौम्य और दिव्य प्रतीत हो रहे थे। वो मुस्कुराये, “बेटी, मैं अपने पोते से मिलने आया हूँ। उसका तार आया था, गाड़ी का समय बताया था और डिब्बा नंबर; पर गाड़ी का नाम.... नहीं पता। तुम कौन हो?"

"मैं मेनिका हूँ | आइए बेंच पर बैठते हैं। आपका पोता शायद अगली गाड़ी से आये। डिब्बा नंबर....।"

"बी- 4 है, यहीं आता है न?" वह मेनिका के साथ बेंच तक आ गए। "तुम अकेली यहाँ क्या कर रही हो?"

"मैं अपने भाई को लेने आयी हूँ," वह छाता बंद करते हुए बोली। "बाबा आप कुछ लेंगे, चाय..."

"नहीं बेटी, मैं ठीक हूँ। तुम्हारे भाई की ट्रैन कब की है?" अपना साफा साफ करते हुए उन्होंने पूछा।

"थी तो 6 बजे, पर आएगी 8 बजे। अगर फ्लाइट होती तो समय पर आती।" मेनिका जोर देकर बोली।

"लगता है तुम किसी बड़े परिवार से हो।" वह उसका छाता देखते हुए बोले।

"जी बिलकुल, मेरे पिताजी 'सोमनाथ गारमेंट्स' के मालिक हैं।" वह बोली। उस व्यक्ति //// मेनिका को देखा। "सोमनाथ !!"

"हाँ, मेरे दादाजी की इंडस्ट्री है।"

"ओह! मैंने नाम सुना है.... तुम्हारे दादाजी कहाँ हैं?"

"वो अब यहाँ नहीं हैं, परदेस मैं रहते हैं। हमे भूल गए हैं,” कहकर मेनिका रुआंसी हो गयी।

"क्या!!" उनका शब्द गूंज उठा।

"मैंने काफी सालों से दादाजी को नहीं देखा।" वह रोने लगी।

"रोती क्यों हो? इतनी बहादुर लड़की हो..." बूढ़े व्यक्ति ने मेनिका के सर पे हाथ रख दिया। वह मुस्कुरा दी। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने चाय पी। घड़ी पर नजर डाली; 6 बज गए थे। मेनिका पहली बार यूं चाय पी रही थी ठंडी फुहारों की बीच, एक दादाजी जो मिल गए थे उसे। उनके किस्से सुन कर वह लोटपोट हो रही थी। दूसरी ट्रैन भी आके चली गयी पर उनका पोता नहीं आया।

"सुनो मेनिका बेटी, वो बुढ़िया बड़ी देर से भीग रही हैं। उसे भी ले आओ।"

"क्या बात करते हैं आप। उनके कपड़े देखे आपने? छीः एकदम खराब हैं। कीचड़ लगी है.. यहाँ बैठेंगी? हमारे साथ?" मेनिका मुँह बनाते हुए बोली।

"तो तुम मेरे कपड़े देख के यहाँ लायी हो?"

"नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं।" वो कुछ कहती की बाबा उठे और बुढ़िया के पास जाके पूछताछ करने लगे। मेनिका नए दादाजी को नाराज नहीं करना चाहती थी। अतः छाता खोल वहीं जा पहुंची।

"बेटी इन्हें 8 बजे वाली गाड़ी, जिससे तुम्हारा भाई आ रहा है, इन्हें उसी से जाना है। अकेली हैं। इसीलिए आते हुए गिर गयीं थी।“ बाबा बोले।

"अम्मा, अभी समय है, चलिए चाय - पकौड़े खाते हैं।" मेनिका बोली। तीनों बेंच पर बैठ गए। पकौड़े खाते हुए मेनिका ने देखा उसकी सलवार मे भी कीचड़ लग गयी है। दो अनजाने बुजुर्गों से मिलकर उसे लगने लगा की यदि वह भी उनकी उम्र में पहुंचकर इसी तरह.....तभी गाड़ी के आने की अनाउंसमेंट हुई। "बेटी -" अम्मा बोली, “मेरी ट्रैन तो अभी 10 मिनट लेट है।" कहकर सभी ठहाका मारकर हसने लगे। "ओह! मेरा भारत।" अम्मा के मुँह से निकला।

"अम्मा तुम्हे कहाँ जाना है?"

"वृद्धाश्रम जाना है।"

"पर आपका परिवार..."

"बहुत बड़ा और समृद्ध है। पर मेरी जरूरत अब शायद किसी को नहीं। चलो जाने की तैयारी करते हैं।"

मेनिका बूथ पर भैया से बात करने लगी। "हेलो भैया।"

"मेनू, तेरा मोबाइल कहाँ है?"

"गाड़ी मे रह गया भैया। मैं स्टेशन पर हूँ| मेरे साथ अम्मा और बाबा भी हैं। आपको सब बाद मैं बताती हूँ।"

"अच्छा। सुन मैं गेट पर ही खड़ा हूँ।"

मेनिका भागते हुए बेंच पर पहुंची। तभी गाड़ी भी आ गयी। सभी बी- 4 के सामने खड़े हो गए। मनीष ने उतारते ही बाबा के पैर छुए। मेनिका अवाक- सी देखती रही। फिर वो लोग अम्मा को उनकी सीट तक ले गए। जाते-जाते अम्मा मेनिका के सर पे हाथ रख के उसको आशीर्वाद देते हुए बोली, "खुश रहना बेटा।"

"भैया, आप बाबा को कैसे जानते हैं? और बाबा आपका पोता...अभी तक आया नही?"

"मनीष ही मेरा पोता है और तू मेरी पोती, बेटी।" बाबा की आँखों से आँसू गिर गए।

मेनिका स्तब्ध- सी खड़ी रह गयी।

"मेनू, जब मैं 10 साल का था यह तब की बात है। दादाजी गरीबों के लिए आश्रम खोलना चाहते थे। पर पिताजी मॉल और गारमेंट्स का काम चालू करना चाहते थे। दादाजी ने समझाया पर वह नहीं माने। अंततः दादाजी चले गए। अपनी जमा पूंजी व शेयर आदि बेच के वृन्दावन मैं आश्रम खोला, जहाँ वह अम्मा जा रही हैं।"

"अच्छा। पर आप तो परदेस मैं थे, तो भैया को कैसे मिले?"

"बेटी मैं स्वदेश मे ही था, तुम्हारे शहर मे। पर तुमसे न मिला। मनीष से मिलता रहा। तभी तो आज यहाँ हूँ।" कहकर दादाजी ने उन्हें गले से लगा लिया।

"तो आपने मुझे क्यों नहीं बताया?" मेनिका बोली।

"मेरा यकीन तुम नहीं कर पाती। इसीलिए सोचा की मनीष स्वयं ही बताएगा। चलो में अब जाता हूँ। तुम लोगों को देख लिया, दिल खुश हो गया।"

"नहीं दादाजी, आप अब अपने घर चलेंगे, हमारे साथ," वह बोली।

पास खेल रहे बच्चे पानी मे कूद रहे थे। कुछ छींटे मेनिका के कुर्ते पर भी पढ़ गए। पर अब वह खीझी नहीं।

"आज तुम दोनों के लिए घर चलता हूँ।" दादाजी का गला रुंध गया।

रेलवे स्टेशन के बाहर एक भिखारिन कोने में दुबकी पड़ी थी। "अम्मा, यह लो। और मुझे माफ कर दो।" मेनिका कुछ पैसे देते हुए बोली। वह काया बस मुस्कुरा दी। तीनों पानी मे छप-छप करते हुए चल रहे थे। उसे टीन पर गिर रहे पानी की टप्पर-टप्पर, पकौड़े की खुशबू, सब अच्छी लग रही थी। वह गलत थी आज का दिन तो बहुत ही अच्छा था।

हाँ छाता...वह उसी बेंच पर पड़ा रह गया था। मेनिका शायद उसे भूल आयी थी या फिर छोड़ आयी थी।
( समाप्त )
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