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भूख

One selected story from Hindi Story Competition 'नगेन्द्र साहित्य पुरस्कार', 2020

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भूख
Writer: मधुकर मिश्रा, रायपुर, छत्तीसगढ़
One selected story from Hindi Story Competition 'नगेन्द्र साहित्य पुरस्कार', 2020


◕ उस दिन की सुबह भी आम दिनों की ही तरह थी। पर उस दिन कुछ ऐसा होना था जो जीवन भर याद रहता। मैं रोज की ही तरह उठा और अपने काम के लिये तैयार होने लगा। मैं उन दिनों मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में रहता था और एक आई. टी. कम्पनी के लिए काम करता था। मुझे अक्सर अपने काम के सिलसिले में शहर से बाहर जाना पड़ता था क्योंकि हमारे कस्टमर्स दूर- दूर थे।

उस दिन मुझे अनूपपुर जाना था। इसलिये मैं तैयार हुआ और एक रिक्सा लेकर शहडोल रेलवे स्टेशन पहुँचा। मैंने अनूपपुर की एक टिकट ली और प्लेटफॉर्म पर जाकर एक चबूतरे पर बैठ गया। ट्रैन आने में अभी देरी थी इसलिए वही बैठे- बैठे इंतजार करने लगा। मेरे बगल में ही बहुत से बड़े- बड़े बोरे रखे हुए थे। शायद किसी ट्रेन पर उनको लादना था। उन्हीं कुछ बोरियों पर मजदूरों का एक समूह भी यहाँ- वहाँ बैठा हुआ था जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे। ये वो लोग थे जो किसी ठेकेदार द्वारा बाहर ले जाये जाते है और दूसरों के खेतों में काम करते है और कमाई करके अपने गांव लौट आते है। मैं सभी को बड़े ध्यान से देख रहा था और उनकी गरीबी और लाचारी के बारे में सोच रहा था। तभी मेरी निगाहें उन्हीं के बीच के एक छोटे से बच्चे पर जा टिकी। उम्र महज 3 से 4 साल, मटमैली हॉफ बुशर्ट और हॉफ पैंट पहने बड़ी ही मासूमियत से उन बोरियों के बीच अकेले ही खेल रहा था। अपनी ही दुनियाँ में खोया हुआ था। पास ही में उसकी माँ भी अकेले ही बैठी हुई थी और अपनी ही सोच में कही गुम थी। कुछ जगहों से फटी हुई साड़ी और ब्लॉउज उसकी लाचारी को बता रहे थे। पिता का कुछ पता नहीं था। कुछ देर बाद बच्चा जो खेल रहा था, दौड़कर अपनी माँ के पास आता है और कुछ खाने को मांगता है। माँ उसे अपने पास रखे प्लास्टिक के बोतल से पानी पिला देती है। बच्चा फिर से उसी मस्ती में खेलने लगता है। थोड़ी देर खेलने के बाद फिर से वो अपनी माँ के पास खाने के लिए पहुँच जाता है और थोड़ी सी जिद करने लगता है। लाचार माँ झल्लाते हुए फिर से उसे पानी पिलाकर भगा देती है। बच्चा फिर से पानी पीकर चला जाता है और फिर से बोरियों के बीच खेलने लगता है। ट्रेन आने वाली थी और यात्रियों की भीड़ भी बढ़ गई थी तो पास ही एक नास्ते के ठेले में दुकानदार गरम- गरम आलूबंडे निकालने लगा। बच्चा उसे देख फिर माँ के पास पहुँचा और आलूबंडे लेने के लिए फिर जिद करने लगा। माँ ने फिर उसे डाँटकर पानी पिलाना चाहा पर वो बिना पानी पिये ही चला गया। लेकिन बच्चा अब भूख से बेसब्र हो रहा था और एकटक ठेले की तरफ लोगों को आलूबंडे खरीदते देखने लगा।

मैं सब कुछ बड़े ध्यान से देख रहा था तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे हृदय को द्रवित कर दिया। एक उसी की उम्र का बच्चा अपने पिता की गोद मे ठेले पर आया और अलूबंडे खरीद कर खाने लगा। उसे देख बच्चा जैसे मानो बेचैन हो गया और माँ के पास जाकर दुकान की तरफ उँगली से दिखा- दिखाकर खाने को मांगने लगा और जोर- जोर से रोने लगा। मजबूर माँ फिर से उसे पानी देना चाह रही थी पर वो मान नहीं रहा था। माँ उसे जोर जोर से मारने लगी पर वो फिर भी नहीं माना और रोता ही रहा। एक ओर बचपन और भूख, दूसरी ओर गरीबी और लाचारी। शायद पिता के आने से कुछ बदल जाता, पर उसके आने के इंतजार तक मैं खुद को रोक नहीं सका। मैं झट से उस ठेले पर गया, दुकानदार को पैसे दिए और उस बच्चे को आलूबंडे देने को कहा और वहाँ से दूर चला गया। मन में बहुत उदासी थी, पर एक खुशी भी कि उस बच्चे की भूख मिटा सका, भले एक बार ही सही।
( समाप्त )

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