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नाला- नाला जिन्दगी

One selected story from Hindi Story Competition 'नगेन्द्र साहित्य पुरस्कार', 2020

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नाला- नाला जिन्दगी
लेखक - पुष्पेंद्र कुमार पटेल, कटघोरा, जिला-कोरबा, छत्तीसगढ़
One selected story from Hindi Story Competition 'नगेन्द्र साहित्य पुरस्कार', 2020



"हाँ माँ, मैं निकल ही गया हूँ आप चिन्ता न करो जल्दी आ जाऊँगा," 25 बरस का आरुष फोन पर अपनी माँ को समझाते हुए बोला।

माँ को दिलासे तो दे गया पर उसे तो अभी 15 किलोमीटर पार करने थे और अभी से बूंदा-बांदी के लक्षण दिखाई दे रहे थे। उसकी मोटरसाइकिल अब फर्राटे भरने लगी और वह हड़बड़ाहट मे आगे बढ़ा। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की चमकारी इंद्रदेव के बाणों की भांति प्रतीत हो रहे थे। अब तो झमाझम बारिश ने पवन की गति को बाधित कर दिया और चारों ओर जल के सैलाब उमड़ पड़े। हाय री ! उसकी किस्मत आज तो वह अपनी बरसाती रखते- रखते ही भूल गया। सर से लेकर पाँव तक वह तर-बतर हो गया उसके केशों की पानी की बूंदे उसकी आँखों को चुभ रहे थे। सारी स्फूर्ति के साथ वह मोटरसाइकिल आगे बढ़ा रहा था पर कीचड़ के लपेटों मे पहिये फँसते ही जा रहे थे किसी भी क्षण वह गिर सकता था ऐसा जान पड़ा। जल धाराओं मे पथ अदृश्य होते जा रहे थे। कौन सड़क और कौन गड्ढे भेद करना कठिन था। अब तो एक ही चारा नजर आया, कही सुस्ताकर इस उमड़-घुमड़ कर बरसती मेघों से जान छुड़ाई जाये। पर इस स्थान पर ऐसा कोई रैन बसेरा नजर न आया। यहाँ तो सड़क के दोनों ं ओर कोई झोपड़ी तक दिखाई नहीँ दे रहे थे। आरुष वही रुका और फिर मोटरसाइकिल धकेलने लगा, मन ही मन खुद को कोसने लगा; कम दूरी तय करने के चक्कर मे उसने इस रास्ते को ही क्यों चुना था। काश वह मेन रोडवाली सड़क से जाता, कोई तो उसकी गुहार सुन ही लेता। कुछ ही क्षणों के पश्चात उसे दो और मोटरसाइकिल दिखे। मदद की आस मे उसने हाथ पैर मारे पर वे सहसा फर्राटे भरते हुए आँखों से ओझल हो गये। माँ को कितनी चिंता हो रही होगी, पता नहीँ उन्होंने खाना खाया होगा या नहीँ। मोबाइल मे नेटवर्क का नामोनिशान नहीँ था और बारिश की फुहारों ने उसमें भी सीलन पैदा कर दी।

शनै- शनै आगे बढ़ने पर उसे एक मुहल्ले जैसा दिखाई दिया। चलो ईश्वर ने उसकी प्रार्थनाओं की सुध ले ही ली, अपनी सारी ऊर्जा वह मोटरसाइकिल को धकेलने मे गवां चुका था। अब तो उससे सीधे पैर खड़ा भी नहीँ हुआ जा रहा था। डगमगाते हुए उसके पैर और हाँफती हुई साँसें उसे देखकर कोई मधुशाला का पुजारी न कह दें! एक मकान पर उसकी नजरें टकरा गई। अपनी मोटरसाइकिल वही छोड़ वह दरवाजे की ओर बढ़ा।

"सुनिए! सुनिए! कोई है क्या?" टिन-वाले दरवाजे को उसने पीटते हुए कहा।

"इतनी रात को कौन आ गया भाई?" एक आदमी ने ऐसा कहते हुए दरवाजे को धकेला। सफेद रंग की एक फटी बनियान और थोड़ी रंग उधड़ी हुई लूँगी मे 35 - 36 साल का आदमी लग रहा था। "कौन है? कोई मुसीबत है क्या जी?" अंदर से आवाज आयी।

दरवाजा खुलते ही आरुष ने अंदर की ओर प्रवेश किया। घनघोर अंधियारी रात मे दीये को हल्की रोशनी से दीवारों की नमी साफ झलक रही थी, पूरा घर पानी-पानी और नाक को चीरती हुई असहनीय गन्ध। न जाने आरुष कहाँ चला आया? पर बाहर की अपेक्षा यहाँ कुछ सहज महसूस करने लगा।

"मेरा नाम आरुष है, स्टेशन रोड मे मेरी कपड़े की दुकान है। इस हाल मे मेरा घर पहूँच पाना तो संभव नहीँ लग रहा, बारिश थमने तक आप आश्रय दे देते तो ठीक रहता।" आरुष ने विनम्रता के साथ आग्रह किया।

"कोई बात नहीँ बबुआ, बिपत्ति के क्षण हम तुम्हारे काम आये ये तो हमारा सौभाग्य होगा। मेरा नाम रामलाल है। मैं एक मोची हूँ और ये मेरी धर्म पत्नी लक्ष्मी।"

"काका यहाँ लाइट नहीँ है क्या? और ये पानी अंदर कैसे घुसता जा रहा?"

"क्या बताये बबुआ! बिजली तो कभी ढंग से रहती ही नहीँ यहाँ। और ये पानी तो नाली से आ रही है। कितनी बार नगर पंचायत मे अर्जी लगाई फिर कोई सुने तब न। नाली को आज तक नहीँ ढँका। हमसे पूछो, बरसात मे सबकी जिंदगी नाला-नाला हो जाती है यहाँ।"

"पर ऐसे मे तो आपका जीना दूभर हो जाता होगा, ये तो बहुत ही गलत है। मुझे ठंड लग रही है पीने के लिये गर्म पानी मिल सकेगा क्या?"

"क्यों नहीँ बेटा, लक्ष्मी जरा बेटे के लिये गर्म पानी और चाय बना देना, " उसने अपनी पत्नी को आवाज लगाते हुए कहा।

बाहर की ओर से पानी अंदर घुसता ही जा रहा था और एकाएक दुर्गंध भी बढ़ती जा रही थी। चारपाई पर आरुष ने अपने पैर जमाये और ऊपर ही बना रहा। सहसा उसकी नजर दीवार पर टँगे एक फोटो पर गयी जिस पर हार चढ़ा हुआ था।

"क्या आप दोनों ही यहाँ रहते है? ये तस्वीर किसकी है?" आरुष ने रामलाल से पूछा।

"ये हमारा बेटा है पिंटू, जिसकी जिंदगी इस मनहूस नाले ने छीन ली," ऐसा कहकर रामलाल ठंडा पड़ गया।

एक गिलास पानी और चाय लेकर लक्ष्मी भी रसोईघर से बाहर आई और उसने बताया कि ये तस्वीर उसके बेटे पिंटू की है जो 5 बरस की आयु मे ही भगवान को प्यारा हो गया। कितनी मनौती माँगकर, मन्दिरों के चौखटे जाकर एक बेटा मिला था जो पिछले बरस सामने वाले खुले नाले मे खेलते-खेलते गिर गया और शायद बड़े नाले मे जाकर काल के गाल मे समा गया। फिर भी नगर पंचायत ने इस ओर सुध न ली और नाला खुला ही छोड़ दिया। मुहल्ले वालों ने मिलकर काठ की एक ढकनी बनाई पर वो भी बरसात के दिनों मे कहाँ टिक पाये।

सारा वृत्तान्त सुनाते हुए लक्ष्मी अपने बेटे को याद कर सिस्कारियाँ लेने लगी। आरुष भी अपनी आखोँ का सैलाब रोक न पाया। रात्रि के 12 बज रहे थे, मेंढकों की टर्र-टर्र अब घर के अंदर भी आने लगी थी शायद एक दो बहकर नाले से अंदर घुस आए हो। बारिश क्षण भर कम होकर फिर बढ़ जाता मानो आज इंद्र देव क्रोध मे हो। आरुष का मोबाइल बड़ी मुश्किल से ऑन हो पाया फिर उसने अपनी माँ को सारी आप बीती बताते हुए सुबह जल्दी घर आने का वचन दिया। रामलाल का घर पानी से लबालब भर गया था, वो और उसकी पत्नी अंदर पैर जमाये रहे जहाँ पानी तनिक कम था। ये देखकर आरुष मन-ही मन ख्यालों मे डूबा जा रहा था। क्या बीती होगी इस माँ पर जिसका लाल बिना बताये भँवर मे खो गया, और ये अभागा पिता जो अपने बेटे का अंतिम संस्कार भी नहीँ कर पाया। कैसी विडंबना है ईश्वर? हम शहरवासियों के लिये ये सावन तो सुहाना है पर इन गरीबों का क्या? जिनकी जिंदगी ऐसे ही बह जाती है बारिशों के सैलाब मे।

सुबह होते ही आरुष, रामलाल और लक्ष्मी से विदा लेकर अपने घर की ओर चला गया। और बार- बार उनका धन्यवाद करता रहा। चार दिन बाद रामलाल ने देखा की नाले के पास जमावड़ा लगा हुआ था और कुछ कर्मचारी उसे ढँकने का काम कर रहे थे। वह आगे बढ़ा उसे आरुष भी दिखा, आरुष ने बताया कि उसने 2 दिन लगातार नगर पंचायत के चक्कर काटे और फिर ये संभव हो सका। रामलाल के साथ -साथ मुहल्ले वाले भी अब आरुष को दुवाएँ देने लगे। अब उनकी नाला-नाला वाली जिंदगी शायद सवंर जाये और कोई माँ का लाल फिर से इस मनहूस नाले मे न समा जाए।
( समाप्त )
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