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"माधव अब मैं क्या करूँ?"

Hindi Short Story

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"माधव अब मैं क्या करूँ?"
Writer: कोमल टंडन


## "माधव अब मैं क्या करूँ?"

Writer: कोमल टंडन

declaration by Writer: नमस्कार, पाठकों से निवेदन है कि यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और मात्र मनोरंजन के लिए है। इसका किसी भी व्यक्ति, स्थान व वस्तु से कोई संबन्ध नहीं। यदि कोई समानता पाई जाती है तो यह इत्तेफाक ही होगा।

माधव मैं क्या करूँ? एक विचित्र प्रेम दीवानी, "माधव अब मैं क्या करूँ?"

"करना क्या है। अब तू 2 का पहाड़ा इतनी दफा पढ़ कि 6 से ऊपर न जाए।"

"अच्छा ...दो एकम दो, दो दूनी चार, दो तियाँ छः, दो चौके आठ ..."

"ये क्या, आठ क्यों लाई? कहा न छ: से ऊपर न जाना। छ: दो तियाँ पे आया तो वहीं रुक जाती! अब दाईं ओर लिख तीन, और नीचे लिख छः। हाँ ...ऐसे... अब छ: मे से छः गये, कितने बचे?"

"शून्य!"

"शाबाश ... नीचे शून्य लिख। ऐसे ही सारे सवाल करने हैं। न समझ आये तो गृहकार्य लेकर मेरे घर चली आना, मैं बता दूंगा। अब चल घर चलते हैं।"

राधिका और माधव एक छोटे से गाँव अतरौरा के निवासी हैं। राधिका माधव से साल भर उम्र में बड़ी ही है पर माधव उससे ऐसे पेश आता मानों वह बड़ा है। गाँव की सरकारी पाठशाला में दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते हैं। यहाँ जमीन पर दरी बिछाकर बच्चे भूमि पर बैठ कर पढ़ते हैं, न कि अंग्रेजी स्टाइल में मेज कुर्सियों पर। पाठशाला के चारों ओर अनेक वृक्ष लगे हैं। बच्चे इन सबके नाम जानते हैं और इनकी पत्तियाँ देखकर ही इनका नाम बता सकते हैं। शहरी बच्चे तो शायद आम का पेड़ भी देखें तो न पहचान सकें क्योंकि आम का पेड़ बस किताबों में देखा है।

राधिका और माधव का घर आस-पास ही है। दोनों बचपन के मित्र हैं। जहां माधव एक ठाकुर परिवार में जन्मा है वहीं राधिका जाति से चमार है। माधव साँवला है पर राधिका का रंग गेहुआँ है। दोनों सदा साथ रहते हैं। कब दोनों एक दूसरे के इतने अच्छे दोस्त बने, नहीं कह सकती पर मान लीजिए वे सदा से ऐसे हैं।

"माधव अब मैं क्या करूँ?" सड़क पर बरसात का पानी भरा देखकर राधिका ने पूछा। अगर वह पानी से होकर जाती तो जूते व मोजे भीग जाते और पूरा दिन स्कूल में ऐसे ही रहना पड़ता।

"करना क्या है, जूते मोजे उतार कर हाथ में ले और चली आ। इधर आकर रामसागर चाचा के घर के बाहर जो नल लगा है उसमें पैर धो लेना और फिर जूते मोजे पहन लेना। वो गंदे भी न होगें।"

राधिका ने ऐसा ही किया। आमतौर पर बच्चों के चोट लगती तो वो अपनी माँ या पिता को पुकारते पर न जाने राधिका की जुबान पर हमेशा माधव ही क्यों चढ़ा रहता।

#
"माधव मैं क्या करूँ?" तवे पर जलकर चिपक गई रोटी देखकर किशोरी हो चुकी राधिका के मुँह से निकला।

"अब रोटियाँ बनाना भी माधव से ही सीख ले। हर बात में माधव-माधव। करना क्या है, रोटी उतार कर एक तरफ रख दे। गाय को दे देंगें। और तवा खुरच कर कपड़े से साफ कर, दूसरी रोटी डाल, " माँ ने कपड़े धोते-धोते उसे आँगन से ही बताया।

गाँव में आठवीं के बाद स्कूल न था इसलिए माधव इलाहाबाद में अपने मामा के घर रहकर आगे पढ़ाई करने लगा। और राधिका की पढ़ाई आठवीं के बाद बंद हो गई। अब उसे पाक-कला व घर-गृहस्थी की शिक्षा दी जा रही है। जब कभी माधव छुट्टियों में गाँव आता है वो दोनों खाली समय साथ ही बिताते हैं।

#
"माधव मैं क्या करूँ?" हाथ में टूटी चप्पल लिए राधिका ने पूछा।

पेड़ से कूदते समय उसकी रबर की हवाई चप्पल टूट गयी। वो लोग माधव के मामाजी के आम के बाग में आम खाने आये थे। इन दोनों को कभी किसी ने न रोका। ठाकुर साहब का इकलौता भांजा था। भला उसे कोई क्यों रोकता। ठाकुर साहब छोटे से आम के बाग और एक छोटी खेती की जमीन के मालिक थे। खेती और आम के बाग पट्टे पर दे रखे थे, दाना पानी आराम से चल जाता था। वो अपनी बहन और माधव को बहुत चाहते थे। उनकी दो बेटियाँ थीं जो माधव से बड़ी थीं और उसे अपने सगे छोटे भाई के समान स्नेह करती थीं। माधव के पिता की मृत्यु हो चुकी थी। वह अपने बड़े मामा के साथ ही रहता था। छोटे मामा शहर में रोजगार करते थे। उन्हें खेती बाड़ी से लगाव न था। अपने हिस्से की जमीन उन्होंने भी पट्टे पर दे रखी थी।

"हुम्म ... ला मैं ठीक करता हूं। " बाग में काँटे थे। बिना चप्पल के पैर घायल हो जाते। माधव ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और चप्पल के तले में छेद से डाल कर एक सिरा स्टैप पर बाँधा और एक जो तली पर था उस-पर गाँठ लगा दी। अभी के लिए कामचलाऊ चप्पल बन गई।

"वाह माधव तू तो बड़ा होशियार हो गया शहर जाकर!"

"चल झूठी। मैं तो सदा से होशियार था। तू ही बौड़म है। जब देखो तब 'माधव मैं क्या करूँ?' 'माधव मैं क्या करूँ?' रटा करती है।"

दोनों हँस पड़े। अगले साल जब माधव गाँव आया तो राधिका ने फिर अपना वही सवाल दोहराया। "माधव मैं क्या करूँ?" इस बार राधिका का ब्याह नजदीकी गाँव के एक परिवार के सबसे बड़े लड़के से तय कर दिया गया। लड़के का नाम था राम सजीवन। लड़का राधिका से सिर्फ दस वर्ष बड़ा था। शहर में जूते बनाने की अपनी दुकान थी उसकी, अच्छा कमाता था। गाँव में माता-पिता व चार भाई-बहन सहित बड़ा परिवार उसी ने संभाल रखा था। पिता की मृत्यु हो चुकी थी। बहन की शादी हो चुकी थी। तीन भाई थे, दो उसके काम में शहर में हाथ बँटाते थे व सबसे छोटा जो बारह वर्ष का था वह माँ के साथ रहता था। लड़के ने स्वयं अपनी बहन की शादी कराई व खूब दहेज दिया। लड़के की माँ यह बताना न भूलीं।

"करना क्या है? तेरे माता-पिता ने तेरे लिए रिश्ता ढूँढा है तो अच्छा ही सोचा होगा। हमारे माता-पिता सदा हमारा भला चाहते हैं। तुझे उनकी बात मानकर शादी कर लेनी चाहिए। सब लड़कियों को एक-न एक दिन ब्याह कर ससुराल तो जाना ही पड़ता है न..."

"और तू कब शादी करेगा?"

"मैं तो ग्रेजुएशन करूँगा फिर सरकारी नौकरी के लिए प्रयास करूँगा। जब कुछ कमाऊँगा-धमाऊँगा तभी तो शादी करूँगा। अभी तो ग्रेजुएशन का दूसरा ही साल है मेरा। तू शादी कर ले, मैं तेरे ससुराल आऊँगा मिलने। शादी में न आ सकूँगा उसी समय इम्तहान होंगे मेरे।"

राधिका ने हाँ में सिर हिलाया और अपने आँसू छिपाने के लिए सिर नीचे कर लिया।

ब्याह के राधिका अपने ससुराल पहुँच गई। अभी तक वह अपने पति की तारीफें ही सुनती आ रही थी कि उसने पिता के जाने के बाद किस प्रकार उसने अपने भाई बहनों का ख्याल रखा, पर... हर इंसान में कुछ न कुछ बुराई भी होती है। और वह हमें तब पता चलती है जब हम उसके करीब जाते हैं। सुहागरात में पति के मुँह से आती दुर्गन्ध ने उसे बताया कि वह शराबी था, जब वह हंसा तो उसके दाँतों ने बताया कि वह पान मसाला भी बहुत खाता था।

"कहाँ माधव... जो तरह-तरह के इत्र लगाता, सलीके से तैयार होता, जब हंसता तो मोती से चमकते उसके दाँत उसके साँवले चेहरे पर कितने मोहक लगते थे। कहाँ राम खेलावन के शरीर से सदा आती शराब की दुर्गन्ध व पान मसाले से सड़े दाँत। पहली रात ही मानों राधिका को अपना भविष्य उसके दुर्गन्धयुक्त मुँह में दिख गया। अपनी हवस बुझाकर वह मुँह फेर कर लेट गया। अगले दिन से राधिका की मेंहदी भी न छूटी और सास ने उसे पूरे घर का काम समझाना शुरु कर दिया। सास ने बुढापे व बीमारी का हवाला दे उस पर पूरे घर की जिम्मेदारी डाल दी। वह चुपचाप किसी मशीन की तरह काम करती रही। मानों उसमें कोई भाव ही न बचा हो। कोई कुछ भी कहता, कभी जवाब न देती, बस खोई-खोई सी आज्ञा का पालन करती रहती। यहाँ भी माधव ने उसका साथ न छोड़ा। जब कुछ गलती होती तो "माधव मैं क्या करूँ?" ही मुँह से निकलता।

सास कहती, "अब माधव ऊपर वैकुंठ से नहीं आएंगे तुझे गुन सिखाने। माँ ने तो कुछ सिखाया नहीं।"

पति कुछ दिन शहर में कमाता, कुछ दिन गाँव में पड़ा रहता। नई नवेली दुल्हन को वह पूरा-का पूरा उपभोग करना चाहता था। माँ भी बेटे की जरूरत को समझती थी अतः विरोध न करती। शहर की दुकान ज्यादातर बाकी दोनों भाई देखते।

जैसा कि माधव ने वादा किया था, समय मिलते ही वह राधिका के ससुराल उससे मिलने आया। उसकी सास को नमस्कार कर उसने अपना परिचय दिया। जब राधिका ने उसे देखा तो खुशी से उसका मुरझाया चेहरा खिल गया। उस समय वह चार माह की गर्भवती थी। वह खुशी-खुशी उसके लिये चाय बना लाई। इतने में उसका पति आ गया। बेटे को देखते ही अचानक राधिका की सास के तेवर बदल गए, "ले देख अपनी कुलच्छनी पत्नी को, कितनी बेहयाई से अपने यार को दिन रात याद करती थी, और मैं पगली सोचती थी कि भगवान कृष्ण को याद करती है। ये है इसका माधव। आज घर तक आ गया। कल तेरी बीबी भी भगा ले जाए तो कोई अचरज नहीं।"

"ये आप क्या कह रही हैं माँ जी? ऐसा कुछ भी नहीं। मैं तो बस राधिका के विवाह में न आ सका सो आज उपहार देने आया था। राधिका के चरित्र में कोई खोट नहीं। मैं सौगंध खाता हूं कि हमारे बीच कोई पाप नहीं, " माधव ने व्याकुल होकर कहा।

"ओह तो तू है माधव जिसका नाम दिन-रात ये तिरिया-चरित्तिन रटती है। देख अपनी भलाई चाहता है तो निकल यहाँ से।" गिरेबान पकड़कर राम खेलावन ने कहा जो नशे में झूम रहा था।

"मुझे पता होता कि आप मेरे आगमन को अन्यथा लेंगे तो मैं कभी न आता। मुझे क्षमा कीजिए, " हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से माधव ने कहा, और जाने को हुआ तभी राधिका ने पुकारा, "माधव मैं क्या करूँ?" आँखों में आँसू भरे राधिका ने पूछा।

"डूब मर कुलच्छनी... हाय राम देखा... पति के सामने यार से पूछ रही है कि क्या करूँ? जा गले लग जा उसके। सारे मोहल्ले, सारे गाँव को अब क्या मुँह दिखाएंगे? हे भगवान। तभी मैं कहूँ कि नई नवेली दुल्हन की तरह न साज, न श्रृंगार, बस दिन-रात मनहूस सूरत लिये बैठी रहती है।" राधिका की सास ने लुढकता पल्लू सिर पर डालते हुए झुंझलाकर कहा।

"राधिका तुझे इतनी बुद्धि नहीं, अब यही तेरा परिवार है और ये लोग जैसा करें वैसा ही कर; यही तेरा कर्तव्य है। और अगर तेरे परिवार को नहीं पसंद तो बार-बार माधव पुकारना बंद कर।" माधव ने मुड़कर गुस्से से कहा। राधिका ने धीरे से हाँ में सिर हिलाया।

"चल भीतर तुझे बताता हूँ, " राम खेलावन उसे खींचकर भीतर ले गया। वह तब तक माधव को जाते देखती रही जब तक देख सकी, पर माधव ने मुड़कर उसे न देखा। उसे आशा न थी कि इतना बड़ा बखेड़ा हो जाएगा। वह चुपचाप बिना किसी से कुछ कहे वापस शहर चला गया। और राधिका की उस दिन अच्छी खातिरदारी हुई। इसके बाद तो यह रोज का सिलसिला हो गया।

आप उसे मूर्ख कहें, चरित्रहीन कहें, मूढ़मगज कहें, दीवानी कहें, कम अक्ल कहें, पागल कहें या जो जी चाहे वह कहें पर माधव उसकी जुबान से न गया। अब तक उसकी सास जो माधव का अर्थ श्री कृष्ण लगाया करती थी, वह सीधे यह शब्द सुनते ही उस पर गालियों की बौछार कर देती और पति तो कूट कर रख देता। उनके शब्दकोश से कृष्ण का पर्यायवाची शब्द माधव हट गया था। अब माधव का एक ही अर्थ था "राधिका का यार...।"

होते -करते राधिका दो बच्चों की माँ भी बन गई। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गये अपने पिता व दादी के मुँह से जैसे शब्द सुनते वैसे ही दोहराते उनकी दृष्टि में राधिका मूर्ख थी और उनका पिता एक महान व्यक्ति जो उस मूर्ख को पाल रहा था, वरना कोई और होता तो घर से बाहर निकाल देता। राधिका ने कभी अपने बच्चों को न डाँटा, न मारा। वह तो बस अपना कर्तव्य निभाती रही। विवाह के कुछ एक वर्ष बाद ही उसकी माता का देहान्त हो गया। मां की मृत्यु के बाद वह कभी मायके भी नहीं गई। राम खेलावन के दोनों भाई शहर में ही बस गये। छोटा भाई भी शहर में सब्जी का ठेला लगाने लगा। राम खेलावन अपनी माँ की देखभाल के लिए गाँव में ही रुक गया। और खेत में मजदूरी करने लगा व ईंट के भट्टे पर काम करने लगा। सरकार की तरफ से मनरेगा में भी काम मिल जाता। वह यहीं अच्छी कमाई कर लेता। इस बीच गाँव की ही एक विधवा से उसका प्रेम हो गया। राम खेलावन ने उसे रख लिया और अब उसे राधिका की जरूरत ही न रही। वह विधवा स्त्री राधिका से जवान थी, गदराई थी और राम खेलावन को मोहित करने के गुन जानती थी। राधिका ने फिर भी कुछ न कहा। वह तो मानों किसी मशीन की तरह बस अपना कर्तव्य निभा रही थी। इतने पर भी उन्हें चैन न मिला और एक दिन भली प्रकार कूट-पीटकर राम खेलावन ने आधी रात में उसे घर से निकाल दिया। रोते रोते उसके मुँह से बस यही बोल फूटे "माधव मैं क्या करूँ?" पता नहीं वो मूर्ख ये जुमला क्यों दोहराया करती जिसने उसका जीवन बिगाड़ दिया। अगर वह यह जुमला न दोहराती और अगर माधव उससे मिलने न आता तो क्या उसका जीवन सुखमय होता? इस बात की गारंटी हैं कि यदि वह ऐसा करती तो उसके पति व सास उसे न सताते व उसे सम्मान देते?

राधिका अब आजाद थी। जहाँ दिल चाहता वहाँ जाती पेड़ों की डाल पकड़कर बचपन की तरह झूम जाती। ठोकर खाती, गिरती, रोती, मुस्कुराती और दोहराती, "माधव मैं क्या करूँ?"

एक गाँव से दूसरे गाँव वह चलती रही। कहीं किसी ने कुछ दे दिया तो खा लिया वरना पानी पीकर पड़ रही। ईश्वर की कृपा से हमारे देश में जीवन दायिनी नदियों की कोई कमी नहीं कि ऐसे फकीरों को पानी मुफ्त में मिल जाता है। गाँवों में कभी-कभी बच्चे उसे पत्थर मारते। कभी उसके पीछे-पीछे मजाक उड़ाते चलते। वह उनके साथ हँसती, उछलती, कूदती और अचानक रोआँसी होकर फिर वही जुमला दोहराती, "माधव मैं क्या करूँ?"

कई वर्षों की पदयात्रा कर वह महेवा नामक गाँव पहुँची। महेवा... जमुना नदी के पार बसे इस छोटे से गाँव में एक डाकखाना है जहाँ के बड़े बाबू अपने कमरे में बैठे अपना दिनभर का काम समेट रहे थे कि अचानक बाहर शोर उठा तो चपरासी से पूछा, "हरी प्रसाद, बाहर क्या हो रहा है?"

"बड़े बाबू, एक पगली जाने कहां से आ गई है। बच्चे उसी के पीछे-पीछे उसका मजाक उड़ाते चल रहे हैं और पत्थर चला रहे हैं। बेचारी को एक पत्थर लग भी गया... वही कुछ लोग डाँटकर बच्चों को भगा रहे हैं।"

"अच्छा... बेचारी ... ये बच्चे भी न बड़े शैतान हैं ...क्या नाम है उस औरत का, कुछ पता चला, कहाँ से आई है?"

"नहीं बड़े बाबू कोई नहीं जानता कौन है? कहाँ से आई है? बस बार-बार यही दोहराया करती है 'माधव मैं क्या करूँ? माधव मैं क्या करूँ?' सो सबने उसे माधव कहना शुरू कर दिया है।"

यह सुनते ही बड़े बाबू अचानक धम्म से कुर्सी पर गिर पड़े। कुछ देर के लिए मानो अपना आपा ही खो बैठे। चपरासी दौड़ा और सहारा देकर ठीक से कुर्सी पर बैठाया। जब संभले तो पीछे खिड़की से एक करुण पुकार सुनाई दी, "माधव मैं क्या करूँ?"

वो दौड़ पड़े बाहर की ओर जैसा सोचा था वही पाया। सामने राधिका डरी सहमी एक चबूतरे के कोने में बैठी थी और बच्चें उस-पर कंकड़ फेंक रहे थे। वह वही जुमला दोहराये पड़ी थी जो बचपन से उसके मुख पर था। उमर कुछ चालीस-बयालीस होगी पर देखने में साठ से कम न लगती थी। बच्चों को भगाकर माधव राधिका के पास आया। राधिका ने उसे तुरंत पहचान लिया। उसके खून से सने चेहरे पर मुस्कान आ गई, "माधव मैं क्या करूँ?" उसने पूछा।

"राधिका .. ये क्या हालत बना रखी है? तू मेरे साथ चल। हे भगवान ... किस भूल की सजा दी है इस मासूम को। गलती मेरी थी जो मैं तेरे ससुराल गया। न मैं जाता, न तेरे ससुराल वालों के दिमाग में शक का कीड़ा बैठता, न तेरी यह हालत होती?"

रास्ते भर माधव उसे प्यार से सहलाता उसके घाव पोंछता, बड़बड़ाता रहा। रास्ते मे उसकी मरहम पट्टी करा वह घर पहुँचा। गाँव में उसने अपना घर बनवा लिया था जो डाकघर से पैदल की दूरी पर था।

माधव के दो बच्चे थे। बड़ा बेटा हाई स्कूल कर रहा था, छोटा आठवीं में था। पत्नी रमा ने राधिका को उसके साथ देखा तो मुँह बनाया। उसे यह रास न आया कि एक भिखारिन को तरस खाकर उसका पति घर उठा लाया। यहाँ इतनी सी कमाई में अपना गुजारा नहीं, इस भिखारिन को कौन पाले? ऊपर से हर बात में 'माधव मैं क्या करूँ' की रट लगाए रहती है। रमा राधिका से घर के काम काज कराने लगी। उसे मुफ्त की नौकरानी ही मिल गई। वह भी चुपचाप सारे काम करती। जैसे ही माधव का मुँह देखती खिल जाती, माधव उसका हाल चाल लेता और अखबार में खो जाता। जल्द ही उसकी पत्नी को अपने ससुराली गाँव से आने वाले रिश्तेदार से पता चल गया कि राधिका को उसके पति ने घर से निकाल दिया था क्योंकि उन्हें शक था कि माधव व राधिका का प्रेम संबन्ध था। अब तो वह दिन रात समाज में बदनामी का राग अलापने लगी। अपनी चूड़ियाँ तोड़ती, मुँह पर चाँटे मारती और कहती, "तुम्हारी अय्याशियों का मेरे बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?"

बेटों ने भी स्कूल में अपने साथियों द्वारा मजाक बनाये जाने की बात कही। उनका पिता चरित्रहीन है और खुल्लम-खुल्ला एक स्त्री रख रखी है, यह कहकर उनके दोस्त उनका मजाक बनाया करते हैं। रमा ने एक दिन राधिका का हाथ पकड़ा और बाहर निकाल दिया। राधिका ने माधव की ओर देखा और फिर दोहराया, "माधव मैं क्या करूँ?"

"करना क्या है!! डूब मर जाकर कहीं। हुँह ... सुनो जी इसे दूर छोड़कर आओ वरना मैं अपने बच्चों सहित मायके चली जाऊँगी, तब रहना इस कुलटा के साथ। पर जान लो बच्चे तुम्हारी चिता को आग भी न देंगे। मरकर भी मुक्ति न मिलेगी तुम्हें। मेरा श्राप लगेगा। एक पतिव्रता नारी के श्राप से तो देवता भी न बच सके, तुम तो इंसान हो।"

बेटों ने भी माँ की हाँ में हाँ मिलाई। माधव राधिका को लेकर गाँव से बाहर जाने वाली सड़क पर पहुँचा और बोला, "राधिका मुझे माफ कर दे, मैं अपने परिवार के विरुद्ध जाकर तुझे अपने साथ नहीं रख सकता। तू चली जा यहाँ से।"

माधव लौटने को हुआ। "माधव मैं क्या करूँ?" राधिका ने रोआँसी होकर दोहराया।

"नदी में डूब मर पगली कहीं की। तू मूरख ही रही। माधव का नाम रटने की जगह अपने पति का नाम रटती तो तर जाती। भाग यहाँ से। सामने नदी बहती है उसी मे कूद जा जाकर, " गुस्से से माधव ने कहा और तेजी से चला गया।

अगले दिन गाँव वालों को राधिका की लाश नदी में तैरती मिली। माधव ने सुना तो पैरों तले जमीं निकल गई। क्या गलती थी उसकी? वह तो भोली-भाली गाय समान थी। कितनी सुंदर कितनी सुशील किसी का क्या बिगाड़ा था उसने? माधव का नाम दोहराने की इतनी बड़ी सजा। क्या माधव बस उसी का नाम है? क्या कृष्ण का भी नाम माधव नहीं? पर कृष्ण की भक्ति करने वाली मीरा को कौन सा उसके ससुराल वालों ने छोड़ दिया? एक मूरत से प्रेम करने वाली के चरित्र पर ससुराल वालों ने लांछन लगा दिया तो हाड़-माँस के माधव से प्रेम करने वाली कैसे बच जाती?

माधव नहीं जानता कि कभी उसने उसे प्रेम किया या नहीं, पर यदि किया भी वह प्रेम पाप रहित था। वह उसे अपनी मित्र, अपनी बहन या अपनी बेटी समान प्यार करता था। उसे लेकर माधव के मन में कभी दुर्भाव न आया। जब वह माधव को सहायता के लिए पुकारती तो उसे लगता कि वह बड़ा व समझदार है। वह बड़प्पन दिखाने के लिए उसकी समस्याएँ चुटकी में सुलझा देता। वह उसका साथ पसंद करता था पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने का तो कभी विचार भी न किया। फिर कैसे समाज ने यह दूषित विचार पाल लिया। क्या वे ईश्वर के समान किसी के हृदय में झाँक सकते हैं? यदि झाँकते भी, तो भी यह न देख पाते जो उन्होंने देखा।

अब माधव आत्मग्लानि से जलने लगा। पत्नी व बेटों की अवहेलना से बचने के लिए वह राधिका के अंतिम दर्शन करने भी न गया। उसकी लाश लावारिस लाशों के साथ जला दी गई। माधव अभी भी यही सोचता कि न वो उसके ससुराल जाता, न यह सब होता। गलती उसी की थी जिसकी सजा बेचारी राधिका भुगतती रही। माधव के गले से निवाला न उतरता। दिल पर बोझ लिये वह ऑफिस के काम भी न कर पाता, ऊपर से अधिकारी उस-पर नाराज रहने लगे। कुछ दिलजले उसकी शिकायत ऊपर तक पहुँचाने लगे। आखिर उसे सस्पेंड कर दिया गया। पत्नी ने खूब खरी खोटी सुनाई, "तुम भी क्यों नहीं अपनी प्रेमिका के साथ डूब मरे। कम-से कम सरकार तुम्हारी नौकरी मेरे बेटे को दे देती तो मेरा बुढापा सुधर जाता। अगर नौकरी से निकाल दिये गये तो क्या होगा?"

जिस दिन माधव को नौकरी पर बहाल किया गया उसके दो दिन बाद ही उसकी लाश भी उसी नदी में तैरती मिली। वह यह अपराध बोध लेकर न जी सका। अपने पुत्र के लिए नौकरी सुरक्षित कर वह भी राधिका के पास चला गया। अब वो दोनों एक ऐसी दुनिया में साथ-साथ रह सकते हैं जहाँ उनसे उनका रिश्ता पूछने वाला कोई न होगा। अब वह राधिका का हमेशा ख्याल रखेगा।

जैसे हमेशा होता है, मरने के बाद सम्मान; गांव वालों ने उनके प्रेम की याद में नदी किनारे एक राधा-माधव मंदिर बनवा दिया जिसके दर्शन करने अनेक गाँवों से लोग आने लगे। रमा अब रुक्मणी के नाम से मशहूर हो गई और रुक्मणी बन स्वयं को धन्य बताने लगी।। कृष्ण व राधा ने युगों-युगों तक इस धरती पर जन्म लिया पर कभी एक न हो सके। अवश्य ही यह भी कृष्ण की ही लीला है। शुक्र है कि मंदिर में माधव और राधिका की मूर्ति नहीं स्थापित की गई बल्कि राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ थीं।

जिस रिश्ते पर जीते जी कलंक का टीका लगा था वह अब किसी खास कारण आध्यात्म से जुड़ गया। मंदिर के बाहर पत्थर पर गुदवा दिया गया, "माधव मैं क्या करूँ?"
( समाप्त )


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