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Hindi Story

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दो बीजों की कहानी

- HP Sarkar


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एक विशाल वृक्ष के दो बीज थे। एक बीज के अंदर उसकी जड़ और तने में झगड़ा चल रहा था। जड़ ने कहा “ हे तन , मेरा महत्त्व तुझसे ज्यादा है। इसलिए मैं तुझसे बड़ी हूं। मैं अगर मेहनत न करूं तो तुझे एक बुंद पानी भी नहीं मिलेगा। मैं अगर धूल, मिट्टी जकड़के न पड़ा रहूं तो तू खड़ा भी न रह पाएगा। तु तो हवा, धूप , चाँद , सूरज के साथ रहेगा। तितलीओं के साथ , पंछीओं के साथ खेलेगा। और मैं जिंदगी भर अंधेरे में सड़ती रहूंगी। सारा मेहनत करूंगी मैं और तू मज़ा लूटता रहेगा , ऐसा न होगा।”

ये सुनके तना भी सीना तान के बोला “ हे जड़ , तू क्या मेहनत करेगी ? मेहनत तो मुझे करनी होगी। तू तो जमीन के अंदर सोए रहेगी , सारी मुसीबतें तो मुझे झेलनी होगी। जिंदगी भर कड़े धूप में खड़ा रहना पड़ेगा। तुफानों को सहना पड़ेगा। न जाने कितनी बार लोग मेरी टहनीओं को तोड़ेंगे और मुझे सब सहना पड़ेगा। मैं अगर हवा और सूर्य से रोशनी न लूं तो तुझे खाना भी नहीं मिलेगा। ईसलिए मैं तुझसे बड़ा हूं।”

दोनों के बीच हर वक्त ‘ कौन बड़ा? ‘ इसको लेकर झगड़ा चलता था। इन दोनों के झगड़े देखकर दूसरा बीज अपने जड़ और तना से पूच्छा “तुम लोग भी आपस में झगड़ा करोगे क्या?” ये दोनों ने बोला “ नहीं, नहीं हम दोनों झगड़ा नहीं करेंगे। हाम दोनों जिंदगी भर साथ-साथ रहेंगे।”

जड़ ने तना को गले लागाकर बोला “भाई, मैं तो ज़मीन के नीचे चली जाउंगी और तुम उपर चले जाओगे। एक-दूसरे को फिर कभी देख ही न पाएंगे। लेकिन हाम दोनों हर शाम, दिन भर की बातें करेंगे। एक-दूजे का सुख-दुख बाँटेंगे।” तना भी जड़ को गले लगाके बोला “ऐसा ही होगा। जब तक हम दोनों ज़िंदा रहेंगे एक-दूसरे से प्रेम बनाकर रखेंगे।”

सही समय पर ये दोनों बीज पेड़ बनके उभरे और बड़े होने लगे। जिस बीज के अंदर झगड़ा चल रहा था बह झगड़ा अब लडाई बन गया। तना को सबक सीखाने के लिए जड़ ने अपना काम बंद कर दिया। तना भी क्यों पीछे रहता। उसने भी जड़ को सबक सीखाने के लिए अपना काम बंद किया। देखते ही देखते एक सुंदर, हरा-भरा, ताज़ा पेड़ सूखने लगा। खुद की मौत को सामने देखके भी दोनों ने अपनी ज़िद नहीं छोड़ी और एकदिन हल्का सा एक झोंका आया और इस पेड़ को गिराके चला गया। यह पेड़ फिर कभी खड़ा न हो सका।

दूसरा जो पेड़ था उसकी जड़ और तना आपस में मिल-जुलके रह रहे थे। एक-दूसरे को अपना अनुभव बताते थे। आज किसने क्या क्या किया! क्या क्या मज़ेदार बातें हुईं! दोनों एक-दूसरे की बातें सुनके खुब हँसते थे। ऐसे ही हँसते खेलते दोनों आगे चलते रहे।

देखते ही देखते दोनों ने एक विशाल, सुदर, मनोहर पेड़ का रूप ले लिया। दूर दूर से पंछी आने लगे। वे दिनभर टहनी में बैठकर गाना गाते थे, नाचते थे, झुमते थे। हजारों रंगीन तितलीयाँ दिनभर पत्तों के पीछे लुका-छिपी खेलते थे। दूर दूर से हवा आके हरे पत्तोंसे लिपट जाती थी। रात को चाँदनी आके उसे रूपाली रंगों से सजाती थी। हर सुबह की किरण एक खुशी लेकर आती थी। एक उम्मीद लेकर आती थी। आज भी वह दौर जारी है।

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एक भेड़ चरानेवाले की कथा

- HP Sarkar

दूर एक गाँव में एक भेड़ चरानेवाला था। उसके पास बहुत सारे भेड़ थे। इन भेड़ों को ले कर वह रोज़ सुबह जंगल जाता था और शाम को लौट आता था। मगर उसका भेड़ इधर-उधर भाग जाता था। चरानेवाला बहुत मुश्किल से भेड़ोंको संभालता था।

एक दिन उसके मन में एक बात आई और् वह सोचने लगा, मैं इन गिने-चुने भेड़ों से इतना परेशान हो जाता हूं और जो भगवान हम लोगों को संभाल रहे हैं, न जाने उनको कितनी तकलीफ होती होगी। वह मन ही मन सोचा, मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिसके लिए मेरे भगवान को मेरे लिए कुछ तकलीफ उठाना पड़े, उन्हें मेरे लिए कुछ मेहनत करना पड़े। और वह ऐसा ही करने लगा। धीरे धीरे उसके स्वभाव में, व्यवहार में और जिंदगी में बहुत परिवर्तन आने लगा। अब वह बहुत शांत और खुश रहने लगा। वह वन में जाके एक पेड़ के नीचे बैठ के दिल खोलके गाना गाता था। अब उसके भेड़ खो नहीं जाते थे। वे गाने की आवाज़ को ध्यान में राखकर खुद ही रास्ता निकल लेते थे।

फिर एक दिन उस भेड़ चरानेवाले ने सोचा, हे भगवान काश मैं हर रोज थोड़ी देर आपकी गोद में सर राखके सो पाता ! अब जब भी वह सोता ये सोचके सोता कि वह भगवान की गोद में ही सो रहा है। कुछ दिन के बाद उसके मन में और एक ख़याल आया। वह मन ही मन प्रार्थना किया , हे प्रभु आप कभी मेरे घर विश्राम करने आइए, मेरी यह इच्छा है कि मैं थोड़ी देर आपके पैड़ दबाऊँ। मुझे बहुत खुशी होगी।

वह ऐसी ही बातें सोचता था और ऐसा ही गाना गाता था। दिन गुज़रने लगा। एक दिन उसी जंगल से एक संत अपने शिष्यों के साथ जा रहे थे। जंगल में इतना सुंदर गाना सुनके सब चौंक गए। उस गानेका सुर जितना सुंदर था उतने ही सुंदर उसके शब्द थे। हर शब्द में ईश्वर का गुण-गान था।

संत उस गानेवाले से मिलना चहा तो उनके शिष्य भागके गए और उस भेड़ चरानेवाले को साथ लेकर आए। संत ने उससे कहा “ सिर्फ गाना गा-गा के ईश्वर मिलते हैं क्या? नहीं मिलते। ईश्वर को पाने के लिए सही नियम से तप करना परता है। कठोर तप करना परता है।” फिर वे तप और ध्यान की बिधि बताने लगे। बीच में अचानक वो भेड़ चरानेवाला संत को रोक दिया। उसने कहा “ आप तो संत हैं। ज्ञानी हैं। मैं एक साधारन भेड़ चरानेवाला। मेरे पास कुछ भेड़-बकरी हैं। उनको संभालते संभालते ही मैं हैरान हो जाता हूं। आपने कभी सोचा के आप और मेरे जैसे हजारों भेड़-बकरी को संभालने के लिए ईश्वर को कितनी तकलीफ होती होगी? आपने कभी उनकी तकलीफ कम करने की कोशिश की? उनको थोड़ा आराम मिले ऐसा कुछ किया?”

संत जैसे आसमान से गिरा। बाकी लोग भी अचंभीत रह गए। संत सोच ही नहीं पा रहे हैं कि उनको यहां, इस हालत में, ऐसी बातें सुननी पड़ेगी। जैसे उनकी आँखें खुल गईं। उनको एक नया और महत्त्वपूर्ण सीख मिली। क्योंकि सही में उन्होंने कभी ऐसा कुछ सोचा भी नहीं और ऐसा कुछ किया भी नहीं। वे तुरंत ही उस भेड़ चरानेवाले से क्षमा माँग ली और अपने शिष्योंके साथ वहाँ बैठकर बहुत देर तक उससे भगवान की कथा सुनते रहे।

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दो दोस्त की कहानी

- HP Sarkar

शांति और सुनील दोस्त थे। उनके घर पास पास ही थे। शांति और सुनील के लेड़के भी साथ-साथ स्कूल में पड़ते थे। दोनों लेड़के पढ़ने में होशियार थे। लेकिन जैसे जैसे दोनों बड़े होने लगे सुनील का लेड़का पिछड़ने लगा और शांति का लड़का आगे बढ़ता गया। हर काम में शांति का लड़का बाकी लड़कों से बहुत आगे निकल जाता था। सुनील बहुत कोशिश करके भी अपने लेड़के को आगे लाने में विफल रहा।

वह अपना काम काज छोड़के दिन भर लेड़के पीछे ही लगा रहता था और वह क्या खाएगा, क्या पहनेगा, कहां जाएगा इन सारी बातोंमें दखल देता था। धीरे धीरे उसका लेड़का बहुत बिगड़ने लगा। बाद में सुनील उसको मारने-पिटने लगा मगर कुछ फायदा नहीं हुआ। सुनील को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करेगा। इस हालत में एक दिन वह अपने एक दोस्त के पास गया और सारी बातें उसको बताई। दोस्त ने सलाह दी शांति का अनुसरण करो। शांति कैसे अपने बेटे की देख-भाल करता है, कैसे अपने बेटे की पढ़ाई-लिखाई पे ध्यान देता है ये सव अनुसरण करो। सुनील को यह बात अच्छी लगी और उसने ऐसा ही किया।

बहुत बिनती करके सुनील गर्मी की छुट्टियों में अपने परिवार के साथ शांति के परिवार को भी अपने गाँव में ले आया।

सुंदर गाँव, चारों तरफ खुला मैदान, दूर तक हरियाली। ताज़ी हवाओंके बीच किसान खेत में काम कर रहे थे। सुबह- सुबह वे लोग गाँव में पहुंचे। सुनील का गाँव शांति को बहुत अच्छा लगा। थोड़ी देर विश्राम के बाद शांति अपने पंद्रह बर्षीय लड़के को कहा “ देखो कितना सुंदर गाँव है। ताजी हवा, हरे-भरे खेत। ये सब शहर में नहीं मिलेगा। जाओ तुम दोनों दोस्त मिलके गाँव में घूमके आओ। दोनों मिलके ख़ूब मस्ती करके आओ।”

सुनील अपनी आदत के हिसाब से माना करने ही जा रहा था फिर मुशकिल से खुद को रोका। उसने कभी अपने बेटे से इस तरहा की बातें नहीं की थीं। वह शांति की तरफ देखने लगा। लेड़के है-है करके मस्ती मे घूमने निकल पड़े।

सुनील कुछ देर बाद-बाद बाहर जाकर देखने लगे कि लड़के आए हैं कि नहीं। मगर जब बहुत देर तक लेड़के नहीं आए तो उसने शांति से पूछा “शांति लड़के अभी तक नहीं आए?” शांति मुस्कराकर बोला “भाई, तू चिन्ता मत कर। नई जग, सुंदर और मनोरम गाँव है। वे दोनों दूर तक चले गए होंगे। या फिर नए दोस्तों के साथ किधर खेल-कूद में जुट गए होंगे। थोड़ी देर बाद आ जाएंगे। तू चल भाइ मेरे साथ, दोनों नहाने चलते हैं फिर खाना खा लेते हैं। बहुत भूख लगी है। ”

सुनील को इस हालत में नहाने और खाना खाने की बात अच्छी नहीं लगी। मगर वह कुछ नहीं बोला। दोनों के खाना आधा ही होआ था कि लड़के आ पहुँचे। उनके सारे बदन पे मिट्टी और कीचड़ लगे हुए थे। अपने लड़के को इस हाल में देखकर सुनील को बहुत ही गुस्सा आया। वह गुस्से से अपने लड़के को दो झापड़ लगाने ही वाला था कि शांति जोर जोर से हँसने लगा। उसने बोला “ क्या बच्चों ! लगता है बहुत कसरत करके आए हो। ज़मीन में हल चला रहे थे क्या? ”

दोनों लेड़के महा आनंद और उत्साह से बोलने लगे “ हाँ, अपने ठीक पकड़ा। हम दोनों ने एक किसान को अपना दोस्त बनाया और उसके साथ मिलके ज़मीन में हल चलाए। बहुत मज़ा आया।” शांति: फिर क्या क्या सीखा तुमने? लड़के बोलने लगे “ हमने बहुत कुछ सीखा। जैसे, कैसे हल चलाना पड़ता है? कैसे बैलों को संभालना पड़ता है। हमें यह भी पता चला कि एक किसान अनाज के लिए कितनी मेहनत करता है।”

शांति: सही कहा तुमने। अब जाओ और अच्छे से नहाके आ जाओ। सुनील आश्चर्य होके कभी शांति को देखता था तो कभी अपने लड़के को देखता था। अपने लड़के को इतना खुश उसने कभी नहीं देखा। दोपहर के बाद शांति लड़को से पूछा “ चलो , सव मिलके देखके आते हैं के तुमने कैसा काम किया है आज। ”

लड़के खुशी खुशी राजी हो गए और चारों एक साथ निकल पड़े। तभी आसमान में बादल दिखाई दिए। इस हालत में सुनील कभी भी अपने लड़के को बाहर जाने नहीं देता था, सो उसने शांति से पूछा “ शांति, आसमान में बादल हैं। लगता है जलदी ही बारिश होगी। ऐसे मे बाहर जाना क्या सही होगा? ”
शांति: आरे सुनील, हम लोग यहा घूमने, मज़ा करने और भिगने ही तो आए हैं। और खास बात ये है कि हमारे लड़कों ने आज खूब मेहनत की है। हमें वो देखना चाहिए। तू चल, कुछ नहीं होगा।” चारों निकल गए। महा आनंद और उत्साह के साथ लेड़कों ने वह जमीन दिखाने लगे। ज़मीन के इस हिस्से पे एक ने काम किया था और उस हिस्से पे दूसरे ने काम किया था।

अपने लड़के का काम देखके सुनील दंग रह गया। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका लड़का इतना सुंदर काम किया है। उसकी आँखोंमें आँसू आ गए। उसी समय बरसात होने लगी। बारिश के पानी और उसकी आँखों के पानी एक हो गए। कोई उसे देख न पाया। सुनील को एहसास होने लगा कि उसने अपने लड़के के साथ क्या क्या गलती की। उसको एहसास होने लगा कि उसने क्या क्या खोया है। उसने मन ही मन शांति को और अपने उस दोस्त को धन्यवाद दिया। उसे लगने लगा कि वह अगर इधर नहीं आता तो कभी इस सच को समझ ही नहीं पता।





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