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श्रद्धा
Writer - गौरव शर्मा, लाड़पुरा बाजार, कोटा (राजस्थान)



श्रद्धा

Writer: गौरव शर्मा, लाड़पुरा बाजार, कोटा, राजस्थान

घड़ी पर नजर गई तो सुईयां सुबह के 9:30 बजा रही थी। संध्या के हाथ और जल्दी-जल्दी रसोई के काम निपटाने लगे। शरीर घर के काम निपटा रहा था और मन हिसाब लगा रहा था कि कैसे ठाकुर जी के मन्दिर में समय से पहुँचा जाएं। सुबह 10:00 बजे के करीब ठाकुर जी के उत्थापन के दर्शन, 15 मिनट के लिए खुलते है। तब तक उसका वहाँ पहुँचना जरूरी है वरना दर्शन नहीं हो पाएंगें। फटाफट हाथ का काम पूरा कर वो घर पर ताला लगा कर निकल पड़ी। उसने अपनी सामान्य गति से तेज चलना शुरू किया। घर से मन्दिर की दूरी लगभग 2 किलोमीटर थी। रिक्शा करने के बारे में वो नहीं सोच सकती थी क्योंकि वो जानती थी रिक्शे वाले को देने के लिए उसके पास कुछ नहीं था। संध्या और उसके पति अभिजीत अकेले ही इस शहर में रहते थे। अभिजीत एक किराने की दुकान पर काम करता था परन्तु लॉकडाउन के कारण उसकी नौकरी छूट चुकी थी अब रोज वो घर से निकलता कि कहीं कुछ काम मिल जाएं। लेकिन हर दिन केवल निराशा ही हाथ लगती। संध्या का भगवान में अटूट विश्वास था उसने मन्नत माँगी थी कि जब तक अभिजीत को कोई काम नहीं मिल जाता वो रोज ठाकुर जी के दर्शन करेगी परन्तु आज उसे ये असंभव लग रहा था। उसने और तेज कदम बढ़ाने शुरू किये। मन्दिर पहुँची तो उसने देखा कि भक्तों की भीड़ दर्शन करके बाहर निकल रही थी। मन्दिर में आने-जाने का एक ही रास्ता होने की वजह से आती भीड़ के बीच में से अन्दर जा पाना बहुत मुश्किल था। आते लोगों में से कुछ ने कहा- मत भाग ठाकुर जी का पर्दा लग चुका होगा पर संध्या जैसे-तैसे अन्दर तक पहुँच ही गई। सामने देखा तो मन्दिर का पर्दा लग चुका था। वो धम्म से वहीं बैठ गई। वहीं खड़ी दर्शन कर चुकी महिलाओं में से एक ने उस पर व्यंग्य कसा- इसका तो रोज का यही हाल हैं। अरे दर्शन ही करने हो तो समय से आना चाहिये ना। भगवान किसी का इंतजार थोड़े ही करते हैं। ये सुनकर उनके साथ खड़ी दो-चार और महिलाएं भी हँस पड़ी। उसने उनकी और कोई ध्यान नहीं दिया पर वो अन्दर से बहुत दुखी थी कि वो छोटा सा नियम भी नहीं निभा सकी। उसने आँखें बंद की और ठाकुर जी से क्षमा मांगने लगी। तभी । अचानक जाने कहाँ से हवा चलने लगी और तेज हवा के कारण मन्दिर का पर्दा उड़ने लगा। मन्दिर से बाहर निकलती महिलाओं के लिए ये किसी चमत्कार की तरह था। संध्या ने अपनी आँखें खोली तो सामने का दृश्य अद्भुत था। उड़ते रेशमी पर्दे में से ठाकुर जी शायद उसी की ओर निहार रहे थे। उसकी आँखें छलक आई। साथ खड़ी महिलाएं भी नतमस्तक थी। अब उन्हें संध्या की श्रद्धा पर कोई शक नहीं था।
( समाप्त )


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