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भाबो

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भाबो
Writer: गौरव शर्मा, s/o रामगोपाल शर्मा, लाड़पुरा बाजार, कोटा (राजस्थान)


# भाबो
राधा पिछले तीन-चार दिन से बड़ी उलझन में थी। आज सुबह से भी उसके दिमाग में यही सब चल रहा था कि क्या किया जाए क्या नहीं। तब ही भाबो कमरे में चाय बनाकर ले आई। राधा को बेड पर लेटे हुए देखकर जल्दी से चाय टेबल पर रखते हुए उन्होंने पूछा, "क्या हुआ बेटा? आज अभी तक पूजा नहीं की और लेट गई? तुम्हारी तबियत तो ठीक है ना?"

"हाँ भाबो, बस यूँ ही हल्का-सा सिरदर्द था। अब आप चाय ले ही आए हो तो बस चाय पीकर अभी गोली ले लूँगी," राधा ने उनकी चिंता को दूर करते हुए कहा। उसके मन में जो कुछ चल रहा था वो भाबो को नहीं बताना चाहती थी।

सिरदर्द का सुनकर भाबो राधा के पास आकर बैठ गई और चिंतित होकर डाँटने लगी, "तो पहले क्यों नहीं बताया। मैं पहले ही बाम लगा देती तो अब तक ठीक भी हो चुका होता। अब केवल चाय पीकर खाली पेट गोली लेने की जरूरत नहीं हैं। मैं अभी कुछ खाने को भिजवाती हुँ। खाकर ही गोली लेना और फिर बस आराम कर। पूजा वगैरह मैं कर लूँगी।"

"भाबो तुम क्यों परेशान होती हो? मैं सब कर लूँगी," राधा ने उन्हें समझाया। पर भाबो कहाँ समझने वाली थी। फिर से डाँटने लगी, "मुझे मत समझा, मैं सब जानती हुँ। हमेशा बस काम-काम। खुद के शरीर का तो ध्यान ही नहीं रखती। अभी वैसे ही ये कोरोना-वोरोना जाने क्या-क्या फैल रहा हैं। पर तू समझती ही नहीं हैं। तू अभी बस आराम कर और कुछ नहीं।"

डाँटते हुए भाबो कमरे से बाहर चली गई। भाबो के जाते ही राधा फिर से सोच में डूब गई। राधा जब शादी करके करीब बीस साल पहले इस घर में आई, तब से भाबो को ही घर संभालते देखा। उसकी सास, राधा के पति जब पन्द्रह साल के थे तब ही चल बसी थी। उसने सुना था कि उससे भी पहले से भाबो इस घर को संभाल रही थी। भाबो को इस घर में लगभग पैंतीस साल हो गए थे। उनकी उम्र होगी करीब पचपन-छप्पन साल । वो कहने को तो इस घर की सेविका थी पर नौकरानी जैसा शब्द कभी उनके लिए दिमाग में आया ही नहीं। घर में राधा और उसके पति नितेश के अलावा उसके ससुर और दो बच्चे गुडड़न और निशु थे और थी इन सब की चहेती भाबो। घर के हर सदस्य की पसंद-नापसंद, उनका मिज़ाज वो अच्छी तरह जानती थी। राजस्थान के किसी गाँव में उनके रिश्तेदार रहते थे, पर इतने सालों में उन्होंने ं कभी भाबो की सुध नहीं ली। छोटी उम्र में ही पति के गुजर जाने के बाद उन्होंने ं फिर से विवाह नहीं किया। जाने कैसे इस घर में आई और फिर यहीं की होकर रह गई। नितेश भी उन्हें माँ की तरह ही सम्मान देते थे। पिताजी उन्हें अपनी छोटी बहन मानते थे। कितनी ही बार राधा ने कोशिश की कि बच्चे उन्हें अम्मां या दादी कहें पर उसकी हर कोशिश नाकाम रही। दोनों की जुबान पर तो केवल एक ही नाम चढ़ा हुआ था, वो था भाबो। राधा सोचने लगी अगर भाबो ना होती तो वो अकेले इस घर-परिवार को कैसे संभालती। इस घर-परिवार के हर रीति-रिवाज, तौर-तरीके उन्होंने ं ही तो उसे समझाएं थे। पारिश्रमिक के तौर पर केवल दो समय का भोजन और कुछ नाम मात्र के पैसे ही वो स्वयं के लिए पर्याप्त मानती थी। खूब निभाया भाबो ने राधा और उसके परिवार के साथ, पर अब ये और मुमकिन नहीं। इससे पहले राधा ये सब सपने में भी नहीं सोच सकती थी, पर अब उसे निर्णय करना ही था। पिछले डेढ़ साल में उनकी जिन्दगी कोरोना महामारी के कारण पूरी तरह बदल गई। पहले तीन महीने दुकान का किराया ना चुका पाने के कारण नितेश को अपना कपड़े का कारोबार बंद करना पड़ा। उसके बाद दुकान का कपड़े का स्टॉक घर के निचले हिस्से में रखा ताकि घर से ही काम चालू रखा जा सके, परन्तु अधिक बारिश होने पर जब निचली मंजिल में पानी भरा तो कपड़े का सारा स्टॉक भी खराब हो गया। फिर भी जैसे-तैसे गुजारा हो ही रहा था कि नितेश और उसके ससुर जी के कोरोना पॉजिटिव होने पर हॉस्पिटल, दवाईयों, डॉक्टर्स के खर्च ने रही-सही कमर भी तोड़ दी। धीरे-धीरे जमा पूंजी भी खत्म हो रही थी। घर में कुल जमा पाँच-छ: लोगों का भी खाना-पीना अब उसे भारी लगने लगा था। केवल वो ही जानती थी कि एक-एक पैसा वो कैसे खर्च कर रही थी। ऐसे में उसे ना चाहते हुए भी फैसला लेना पड़ा कि भाबो को जैसे-तैसे समझा के उनके गाँव भेज दिया जाएं। हो सका तो नितेश और वो खुद गाड़ी लेकर उन्हें गाँव छोड़ आएंगे।

अगले दो-चार दिन इसी में बीत गए पर राधा ये बात नितेश को भी नहीं बता पाई। अब राधा ने सोच लिया भाबो को ये बात बतानी ही होगी। जानती वो भी थी कि भाबो को इस बात से कितना दुख होगा। जिस घर को उन्होंने अपना पूरा जीवन दिया। वहाँ से उन्हें यूँ भेजना उसके लिए भी कहाँ आसान था। भाबो इस सब से बेखबर हमेशा की तरह अपने काम में लगी थी। इसी समय किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई। राधा ने दरवाजा खोला तो सामने पास वाली किराना स्टोर पर काम करने वाला रमेश खड़ा था। उसके हाथों में सामान से भरे हुए दो थैले थे। राधा ने उसे देखकर पूछा, "क्या हुआ रमेश, ये सामान?

"हां, आपका ही है जीजी," रमेश ने उत्तर दिया।

"तू गलती से ले आया दिखता हैं..." ये बोलते हुए राधा को स्वयं पर ही हँसी आ गई कि उसके पास गुंजाइश भी कहाँ है जो वो अभी इतना सामान मँगा पाएगी।

अन्दर सामान रखते हुए रमेश ने बताया, " नहीं जीजी, मुझसे कोई गलती नहीं हुई। आप ही का सामान है। सुबह भाबो सामान की लिस्ट देकर आई थी ना। माफ करना मुझे काम की वजह से देरी हो गई।"

"पर मैनें तो भाबो से..." राधा कुछ बोलती इससे पहले ही भाबो रसोई से बाहर आकर रमेश को सामान के पैसे देते हुए बोली, "अरे रमेश बड़ी देर कर दी तूने।"

रमेश पैसे लेकर चला गया। राधा अभी तक कुछ समझ नहीं पाई थी। उसने भाबो से पूछा, "भाबो ये सामान और पैसे?"

भाबो ने सामान उठाते हुए कहा, "अरे बेटा रसोई का सामान खत्म हो रहा था ना, तो मैनें सोचा मैं ही लिस्ट बनाकर दुकान पर दे आती हुँ।"

"पर भाबो आपके पास ये पैसे?"

"पैसे... तुझे तो पता ही है, तू हर महीने जो तनख्वाह देती है ना वो कहाँ खर्च हो पाती हैं। मेरा सारा खर्चा तो तुम लोग ही उठा लेते हो। इसलिए मैं हमेशा उन्हें एक डिब्बे में डाल देती थी। आज वो बचत काम आ गई| और ये बाकी पैसे भी तेरे पास रख। ज्यादा नहीं, पर इतने तो है ही कि हमारा ढाई-तीन महीने का खर्चा चल जाएं।"

"भाबो, पर ये तो आप अपनी तीर्थयात्रा के लिए जमा कर रही थी ना," राधा ने उन्हें याद दिलाया।

"क्या बेटा तीर्थयात्रा... घर की हालत मैं भी जानती हुँ, तू कुछ बोलती नहीं है तो क्या? मुझे भी सब पता है।"

ये सुनकर राधा भाबो के गले लग गई। भाबो अपने आसूं मुस्कान में बदलते हुए कहने लगी, "और जब सबकुछ ठीक हो जाएगा तो क्या तू मुझे तीर्थ यात्रा नहीं करवाएगी?"

राधा अपने आंसू रोक नहीं पाई। भीगी आंखों से केवल वो यही कह पाई, "हां भाबो करवाऊँगी। जरूर करवाऊँगी।"
( समाप्त )


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