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नरगिस

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नरगिस
लेखिका- सुरभि सिंह, सेक्टर एच, एल डी ए कालोनी, लखनऊ
( Special episode on 75th independence day of India )
15 th August, 2021


# नरगिस
"चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ, "
नरगिस मन ही मन कविता की पंक्तियाँ पढ़ रही थी। रात के साढ़े बारह बजे सोते हुए से उठकर यूँ कविता पढ़ना, थोड़ा अजीब बात है ना? आम इंसान के लिये थोड़ा नहीं बल्कि काफ़ी अजीब है, लेकिन नरगिस के लिए ये बिल्कुल अजीब नहीं है। बल्कि ये तो अब उसकी आदत में शुमार हो चुका है। जब कभी उसकी हिम्मत डगमगाने लगती, मन आशंकाओं से विचलित होने लगता, तो वह यू हीं अपनी टेबल की ड्रॉर से भूरे रंग की डायरी निकालती, फिर किसी मन्त्र की तरह, मन ही मन कविता की पंक्तियां पढ़ने लगती।

"मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर‌ अनेक॥"

"हाँ, कोई चाहे कुछ भी कहे, मुझे इसी पथ पर जाना है, बिल्कुल अपने अब्बू की तरह, " कविता की आख़िरी पंक्तियां पढ़ते हुए नरगिस ने ख़ुद से कहा और नई ऊर्जा के साथ जीवन की अगली सुबह का इंतज़ार करने लगी।

माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित "पुष्प की अभिलाषा" नरगिस के लिए महज़ एक कविता नहीं थी, बल्कि प्रोत्साहन मंत्र था। वो प्रोत्साहन मन्त्र जो बचपन में उसके अब्बू ने दिया था। उसे आज भी याद है, जब कभी उसके अब्बू गार्डन में पौधों को पानी देते, तो वो उनके कुर्ते का सिरा पकड़े, उनके पीछे-पीछे घूमती रहती; अपने अब्बू की लाडली जो थी।

"अब्बू देखिये...कितना ब्यूटीफुल फ़ूल है, " पौधे पर लगे नरगिस के फ़ूल को देखकर पाँच वर्ष की नरगिस चहक उठी थी।

"ह्म्म्म मेरी बच्ची, बहुत सुंदर है। बिल्कुल मेरी नरगिस की तरह, " पौधे की पीली पत्ती निकालकर, उसके पापा ने जवाब दिया जिसपर नरगिस बड़ी मुस्कान के साथ फ़ूल को देखने लगी।

"अब्बू...इसे तोड़ लें?" नरगिस ने बड़ी मासूमियत से पूछा था। लेकिन "ना बेटा" कहकर उसके अब्बू ने इंकार कर दिया और दुबारा से पौधों में लगी पीली पत्तियों को छाँटने में लग गए।

"पर क्यों अब्बू? हमें वो फ़ूल पसंद है। हम अपनी चोटीमें लगाना चाहते थे उसे, " उदास होकर नरगिस ने अपना मुँह लटका लिया था। उसके अब्बू को अपनी बच्ची पर बड़ा प्यार आया था। उन्होंने उसे गोद में उठाकर और समझाते हुए बोले, "पर मेरी गुड़िया, फ़ूल को तो नहीं पसंद है ना..."

"तो क्या पसन्द है उस फ़ूल को?" नरगिस ने यही सवाल पूछा था जब उसके अब्बू ने पहली दफ़ा ये कविता सुनाई थी।

"चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक! "

पिता की गोद में खेलती नरगिस, बचपने में कविता के अर्थ को नहीं समझ सकी, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ नरगिस ने इस कविता के मायने समझ लिये थे। और जब पिछले साल बॉर्डर पर हो रही लड़ाई में पिता के शहीद होने की ख़बर मिली तो उसे यूँ महसूस हुआ, मानो कागज़ पर लिखी उस कविता के मायने अब उसकी जिंदगी बन चुके हैं। वह जब कभी कविता पढ़ती तो उसके अब्बू की आवाज़ उसके कानों में गूँजती थी। उसे लगता था, मानों उसके अब्बू उससे कहना चाहते हों कि, "बेटा नरगिस! आप हमारा सबसे अज़ीज़ फ़ूल हैं। अब आपकी बारी है। अपने मुल्क की हिफाज़त करना, अब आपकी ज़िम्मेदारी है।"

मुल्क की हिफाज़त करते हुए, नरगिस के अब्बू हिंदुस्तान की सरज़मीं में समा चुके थे, लेकिन उनके अल्फ़ाज़ अभी भी नरगिस के जहन में जिंदा थे। सिर्फ़ जिंदा ही नहीं थे, बल्कि नरगिस की जिंदगी बन चुके थे। आज पुष्प की अभिलाषा नरगिस की अभिलाषा बन चुकी थी। इसीलिए तो अपनी सहेलियों की तरह कॉलेज जाने की बजाय वह कल फ़ौज की ट्रेनिंग पर जा रही थी।

नरगिस अपने माँ-बाप की इकलौती औलाद है, और अब वह अपनी माँ यानिकि सलमा जी का आख़िरी सहारा भी है, शायद इसीलिए उन्हें नरगिस की फ़ौज में भर्ती होने की अभिलाषा रास नहीं आती है। देश के लिए अपने पति को न्यौछावर करने के बाद, शायद अब वह थोड़ी स्वार्थी हो गई थीं। वह अपने जीवन के आख़िरी सहारे को, अपने आँचल में समेटकर, दुनिया की नज़रों से बचाकर रखना चाहती थीं, ताकि नरगिस हमेशा उनके आँगन में महकती रहे। नरगिस से उनकी नाराज़गी का कारण भी यही था। सलमा जी नरगिस को डॉक्टर बनाना चाहती थीं, ताकि वह हर वक़्त उनकी आँखों के सामने रहे। लेकिन नरगिस ने तो मानों सेना में जाने के लिए कसम खा रखी थी।

"अम्मी! मैं फ़ौजी बनूँगी, अब्बू की तरह," हर बार नरगिस का यही जवाब रहता था जिसपर उसकी अम्मी चीख़ उठती थीं। लेकिन नरगिस अपनी जिद के आगे किसी की सुनने को तैयार नहीं थी।

"नरगिस...." आवाज़ सुनकर नरगिस पलटी तो पीछे दरवाजे पर सलमा जी खड़ी थीं।

"अम्मी..आ..आप?" नरगिस ने अटकते हुए कहा और अगले ही पल कविता वाली डायरी छुपा ली।

"छुपा क्यों रही हो, नरगिस? तुम तो वही करोगी ना जो तुमने ठानी है?"

"अ.. अम्मी आप सोई नहीं अभी तक?" सलमा जी के तानों को अनदेखा करते हुए नरगिस ने सवाल किया तो बिना कुछ कहे वो नरगिस के कमरे में आ गईं। उसकी आँखों में आँखें डालकर गम्भीरता से पूछा, "जिसकी बेटी इतनी ज़िद्दी हो जाये, भला वो माँ कैसे सो सकती है?"

सलमा जी के सवाल पर नरगिस ठिठकी। उसे अपनी अम्मी की आवाज़ में दर्द और आँखों में इल्ज़ाम नज़र आ रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था, मानो अम्मी की आँखें, इस दर्द का इल्ज़ाम उस पर लगा रही हों। ख़ैर कुछ हद तक ये इल्ज़ाम सच भी थे। सलमा जी शुरू से ही उसके फ़ौज़ में भर्ती होने वाले फैसले के ख़िलाफ़ थीं, इसके बावजूद वह एन डी ए के लिए प्रणबद्ध रही। अब्बू की तरह बनना है, इस चक्कर में उसने अपनी अम्मी की ख़्वाहिशों को कुचलकर रख दिया। यकीनन, उसने अम्मी को दर्द दिया लेकिन वो क्या करे, तिरंगे में लिपटे अपने अब्बू के पार्थिव शरीर को देखकर उसके मन में एक नई अभिलाषा उपजी थी। वो थी अपने मुल्क की बन्दगी की अभिलाषा। अपने अब्बू की शहादत को और गौरवमयी बनाने की अभिलाषा।

"अम्मी! आप मुझसे काफ़ी नाराज़ हैं ना?" नरगिस ने पूछा।

"तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है, नरगिस? तुम तो निर्मोही बन चुकी हो। अपने अब्बू की तरह मुझे छोड़कर जाना चाहती हो ना....," सलमा जी कहते कहते रो पड़ीं।

अम्मी आप क्यों नहीं समझतीं, अब्बू हमें छोड़कर कहीं नहीं गए हैं। वो तो इस मुल्क की आज़ाद हवाओं में हर जगह बिखरे हुए हैं। अभी उस दिन जब जनेश्वर पार्क गई थी ना, तो वहाँ लहरा रहे तिरंगे में भी हमें अपने अब्बू दिखाई दिये। बेखौफ चेहरे की मुस्कुराहटों में हमें हमारे अब्बू दिखाई देते हैं, जो हमसे कहते हैं कि, 'नरगिस, ये मुस्कान हमेशा बनी रहनी चाहिए।' अम्मी! अब्बू हर जगह हैं, आप क्यों नहीं देख पा रहीं हैं?" अपनी अम्मी का हाथ थामकर नरगिस ने समझाया तो उसकी अम्मी उसको सीने से लगा लीं।

जिस दिन से ट्रेनिंग पर जाने के लिये लेटर आया था, उसकी अम्मी ने नरगिस से बात करना छोड़ दिया था। अम्मी की नाराज़गी नरगिस के लिए ज़हर जैसी थी। इन दिनों उसने अम्मी के आँचल को बहुत याद किया। और आज अम्मी के गले लगाते ही, नरगिस सिसकियां भरने लगी।

"नरगिस! तुम हमारे घर का इकलौता चिराग़ हो, बेटा, " नरगिस के आँसू पोंछते हुए सलमा जी ने कहा तो नरगिस तपाक से बोल पड़ी, "अम्मी! मैं चिराग़ नहीं बनना चाहती, जो हवा के झोंको से बुझ जाएं। मैं सूरज की तरह चमकना चाहती हूं जिसका वजूद कोई ना मिटा सके..."

अपनी बीस साल की बेटी के मुंह से इतनी गहरी बात सुनकर सलमा जी मुस्कुराईं और माथा चूमकर सोने के लिए बोलीं। माँ के दुलार ने नरगिस के मन के आखिरी भय को भी ख़त्म कर दिया था। अब वह निश्चिंत थी वतन परस्ती के लिए।

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"यात्रीगण कृपया ध्यान दें, गाड़ी नम्बर 65789, प्लेटफार्म नंबर 7 पर आने वाली है।"

स्टेशन पर अनाउंसमेंट होते ही नरगिस के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। वक़्त आ चुका था, जब वह अपने घर, अपने शहर, अपनी माँ को छोड़कर अपने रास्ते पर आगे बढ़े। वही रास्ता जो उसने ख़ुद चुना था या यूँ कहें कि, वो रास्ता जो अब्बू की शहादत ने उसे दिखाया था। गाड़ी आने को कुछ ही वक़्त रह गया था। नरगिस और उसकी माँ प्लेटफार्म पर पड़ी बैंच पर बैठे हुए थे। नरगिस के माथे पर पसीने की बूंदे साफ़ नज़र आ रही थी। वह हाथ में पकड़ी पानी को बोतल को हथेलियों के बीच लगातार घुमाये जा रही थी।

"घबरा रही हो?" बेटी का हाथ थामते हुए सलमा जी ने कहा तो नरगिस ने नज़रें झुकाकर सिर 'ना' में हिलाया। वह अपने आँसू छिपा रही थी। माँ से बिछड़ने का समय आया तो मोह कर्तव्य के आगे आ रहा था। कैसे रहेगी वह अपने माँ के बिना, सोच-सोचकर उसका दिल बैठा जा रहा था।

"अरे! रो क्यों रही हो। तुम तो बहुत बहादुर हो, नरगिस।" नरगिस के चेहरे पर अपना हाथ फेरकर सलमा जी ने कहा तो वह फफक-फफककर रोने लगी, "मुझे आपकी याद आएगी।"

बेटी को रोता देख सलमा जी की आँख भी भर आई थी। लेकिन आज ना जाने क्यों उनकी ममता भारत माता के आगे नतमस्तक थी। अपने आंसुओं को पीते हुए वह नरगिस से बोलीं, "सो तो है...पर सुनो मेरी बच्ची! आज तुम्हारे अब्बू को असल मायने में जन्नत नसीब हुई है। तुम्हें पता है, वो मुझसे अक़्सर कहते थे कि हमारी नरगिस बेटों से कम थोड़ी है। तुम देखना, एक दिन हमारी नरगिस मिसाल कायम करेगी। और देखो, आज उनकी बात सच हो गई। जा रही है उनकी नरगिस, देश की सेवा करने के लिए।"

अब्बू की प्रशंसा ने नरगिस के होठों पर मुस्कान ला दी। वह भीगीं आँखों से मुस्कुराई थी। सलमा जी ने नरगिस के चेहरे पर प्यार से अपना हाथ रखते हुए समझाया, बोलीं, "नरगिस! सफ़र नागफ़नी जितना कठिन है बेटा। पर आप हिम्मत मत हारना। मैं चाहती हूँ मेरी नरगिस, मेरे घर मे पूरे हिंदुस्तान महके। इतनी जाबाज़ हो मेरी नरगिस, कि सरहद पार दुश्मन भी जान जाए कि भारत माता के बेटे ही नहीं बेटियां भी उनके दाँत खट्टे कर सकती हैं।"

अपनी अम्मी के प्रेरक शब्दों को सुनकर, नरगिस का गला भर आया था। आँखों से आँसू बह रहे थे पर वह होंठो से मुस्कुराते हुए सिर हिलाई और अपनी माँ के गले लग गई। बहुत भावुक क्षण था वो। अपनी बच्ची को सीने से लगाकर सलमा जी ख़ूब रोईं थीं। नरगिस भी दहाड़े मारकर रोने लगी लेकिन ट्रेन की सीटी बजते ही सलमा जी ने खुद को संभाला। अलविदा कहते हुए उन्होंने नरगिस का माथा चूमा फिर एकदम से उसे ख़ुद से अलग करते हुए उन्होंने दो क़दम पीछे लिया। अपने माथे पर हाथ ले जाकर ज़ोर से बोली, "जय हिंद।"
"जय हिंद," सलामी के दो शब्दों ने सलमा जी के ज़हन में उमड़ते मोह को नीचे दबा दिया। सोया हुआ देशप्रेम, व्यक्तिगत मोह के बंधन से आज़ाद हो गया। उसका दिल देश की सेवा के लिए मचल उठा। वह भी सलामी देते हुए 'जय हिंद' बोली और अगले ही पल ट्रेन पर चढ़ गई।

सलमा जी ने आंसुओ को पोंछकर, मुस्कुराते हुए अपने जिगर के टुकड़े को मुल्क की रक्षा के लिए भेज दिया था।

आज सेना में भर्ती हुए नरगिस को नौ साल बीत चुके थे पर उस दिन की यादें आज भी सलमा जी के दिल में बिल्कुल तरोताजा थीं। मानो कल की ही बात हो, जब वो स्टेशन पर जवानों की तरह अपनी बेटी को सलामी दे रहीं थीं। उनकी वो बीस साल की बच्ची आज पन्द्रह अगस्त की परेड पर थल सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने जा रही थी। कल पूरी रात सलमा जी को नींद नहीं आई थी। पूरी रात कभी उनके शौहर, तो कभी उनकी बेटी का चेहरा उनकी आँखों के सामने रहा। काफ़ी उत्साहित थीं वो। सुबह की पहली किरण निकलते ही सलमा जी ने बिस्तर छोड़ दिया था। सुबह से टी वी के सामने चश्मा लगाए बैठी थीं, आज नरगिस को हिदुस्तान की शान बनते हुए, उसके यश को महकते हुए देखना चाहती थीं।

"और अब आपके सामने प्रस्तुत हो रही है, भारतीय थल सेना की टुकड़ी, जिसका नेतृत्व कर रहीं हैं नरगिस बानो।"

टीवी पर आवाज़ सुनते ही सलमा जी आँखों पर लगे चश्मे को ठीक करते हुए, टीवी के बिल्कुल नज़दीक आ गईं। उनकी बेटी, उनकी नरगिस, उनके जिगर टुकड़ा सलामी देते हुए, क़दमताल करते हुए आगे बढ़े जा रही थी। सलमा जी की आँखें डबडबा आईं। टीवी स्क्रीन पर उन्होंने अपनी झुर्रियां वाले हाथों को बड़े प्यार से फेरा था, मानो अपनी नरगिस के गाल सहला रहीं हो। नरगिस प्रधानमंत्री के सामने सलामी देने के लिये जैसे ही रुकी, सलमाजी भी टी वी स्क्रीन से दूर खड़ी हो गईं।

"सलामी दे..." नरगिस के चिल्लाते ही सलमा जी ने भी जवानों की तरह अपना बयां पैर ज़मीन पर पटका और बोल उठीं, "जय हिंद!"

"जय हिंद!" सलमा जी की बुलन्द आवाज़ उनके सूने घर में गूँज उठी थी। इस वक़्त नरगिस लाल किले के परिसर मैं मौजूद थी, लेकिन उसकी ख़ुशबू सलमा जी के आँगन में महक रही थी।
( समाप्त )


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