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ज़िंदगी फिर यहीं कहीं

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ज़िंदगी फिर यहीं कहीं
Writer: मनोज शर्मा, दिल्ली


# ज़िंदगी फिर यहीं कहीं

Writer: मनोज शर्मा, दिल्ली

# वृद्धाश्रम में कमरे की बॉलकोनी पर टहलते हुए मैंने मेन-गेट की ओर देखा। एक गाड़ी हॉर्न देकर गेट के सामने रूकी। अपने गंतव्य को पुख़्ता करते हुए गाड़ी की खिड़की से एक चेहरा बाहर निकला जो आश्रम के सामने लगे बड़े बोर्ड को पढ़ने लगा और स्वयं को आश्वस्त करता हुआ गेट से अंदर आ गया। गाड़ी की पिछली सीट से दो स्त्रियां बाहर आयी और गेटकीपर से कुछ पूछने लगी। पीछे वाला चेहरा यद्यपि धूंधला दिख रहा था पर फिर भी कुछ पहचाना-सा प्रतीत हो रहा था। मैं जैसे ही आंखों पर चश्मा लगाकर बॉलकोनी में उस चेहरे को पहचानने के लिए गया गेटकीपर ने बड़ा दरवाजा खोलते हुए उन्हें ऑफिस के सामने जाने का निर्देश दिया। मैं बॉलकोनी से अंदर आकर अपने बिस्तर पर बैठ गया और स्वयं से पूछने लगा — जाने क्यों लगा इस चेहरे को पहले देखा है! कौन हो सकता है? पर यहां क्यों? कहीं पूर्वा तो नहीं? नहीं नहीं, वो क्यों यहां!! पूर्वा! वो पूर्वा नहीं हो सकती। वो तो बहुत अमीर थी, ऐसे-वैसे दस आश्रम खरीद दे! नहीं वो पूर्वा नहीं हो सकती! और इतना उदास चेहरा पूर्वा का तो नहीं हो सकता...

मैं पाजामें पर स्काई कमीज पहनकर धीरे-धीरे बॉलकोनी से नीचे उतरने लगा। ऑफिस के सामने अब कोई नहीं था। गेट के बाहर गाड़ी स्टार्ट हुई और पल भर में ही वहां से दौड़ गयी। मौसम बेहद उमस भरा था, एकदम चिपचिपा-सा। पल भर में ही सारा माथा पसीने से भीग गया। सब बुजुर्ग अपने-अपने क्रियाकलापों में व्यस्त दिखे। शांति के हाथों में उनके परिवार की पुरानी तस्वीर थी जिसे वह बड़े प्रेम से सहेजकर रखती है, हां यह अलग बात है कि उसके परिवार का आजतक यहां कोई उससे मिलने नहीं पहुंचा। दिवाकर बाबू तखत पर बैठे दाढ़ी के लिए साबुन घोलते हुए अपने खिचड़ी-बालों को आईने में निहार रहे थे। मुझे करीब देखकर सहसा वो मुस्कुराए और चेहरे पर उगी दाढ़ी को सहलाते हुए पुनः दाढ़ी बनाने की तैयारी में जुट गये। सहसा ऑफिस के गेट से बाहर उसी धुंधले चेहरे को देखकर मैं चकित रह गया। लगा! हो-न हो ये पूर्वा है। मैंने कन्फर्म करने के लिए आंखों पर चश्मा लगाया! ये पूर्वा ही थी! मैं यकायक सामने देखकर स्तब्ध हो गया, मानों शांत सागर की गहरी लहरों ने मुझे अंदर खींच लिया हो। मैं सकपका सा गया, पर फिर भी हिम्मत की, और करीब जाकर पूछा, "पूर्वा?"

हाथों में एक मुड़ा-तुड़ा सा बैग थामे वो मुझे देखती रह गयी। उसकी नज़रे जमीं में गढ़ी थी। माता जी! पीछे से स्वर पूर्वा के कानों में पड़ा! आप दायीं तरफ तीसरे कमरे में रहेंगी। पूर्वा ने वार्डन की आवाज सुनी और फिर दायीं ओर बने कमरों को देखने लगी। तीसरे कमरे की ओर बढ़ते हुए उसने कनखियों से मेरी ओर देखा, पर उदास मन से देखते हुए वो अपने कमरे की ओर बढ़ गयी। तीसरा कमरा मेरे कमरे की बॉलकोनी के बिल्कुल सामने है। मैं कुछ देर इधर-उधर देखता रहा। मेज पर तह में लिपटे कल के अखबार के एक हिस्से को लेकर पुनः अपने कमरे में चला आया और सोचता रहा — पूर्वा यहां कैसे?

इसी सोच में डूबे मैं अखबार को देखता रहा पर कुछ न पढ़ा गया। ख़बरे जैसे पल-पल में बदल रही हो, पर उन पर नज़रे एकपल भी न टिक रही हो। दस बजने वाले हैं, अब सभी नाश्ते की टेबल पर उपस्थित होंगे; ये सोचकर मैं नहा लिया और तौलिया बॉलकोनी की शिराओं पर सुखा दिया। आश्रम से सारे बुजुर्ग मैश में जाने के लिए बाहर अहाते में सभी उपस्थित होते जा रहे थे। दिवाकर ने नीचे कमरे के बाहर खड़े-खड़े मुझे नीचे आने का न्यौता दिया।

अब सब अहाते में आ चुके थे पर पूर्वा वहां नहीं थी। शायद उसे अभी यहां आने का समय-आदि की जानकारी न हो, पर जल्द ही वो भी रोज़ यहीं होगी। शाम के खाने पर भी सब इकट्ठे थे, पर पूर्वा शाम को भी न दिखाई दी।

पहले एक दिन बीता, फिर दूसरा, तीसरा, चौथा... सातवां और एक-एक करके कितने ही दिन बीते पर पूर्वा को कभी वृद्धों से मिलते-जुलते या किसी से बात करते नहीं देखा। एकाध बार मिली भी तो किसी दार्शनिक की भांति जड़वत, जैसे कोई हरा वृक्ष समय से पूर्व ही ठूंठ बनकर झुक गया हो।

पहले, वो दो-तीन साल और शायद बाद में भी जब भी पूर्वा को देखता था एक चंचल बालक की तरह हंसता चहकता देखा था। वो छवि आज भी पूर्ववत ज़हन में हैं। शायद तभी से अब तक कभी भी पूर्वा को नहीं भुला पाया। तब से अब तक मेरी डायरी के पन्नों में पूर्वा रोज़ आती है। रोज़ रात को डायरी लिखता हूं। आज लाचार हूं बेकार हूं पर डायरी लिखने का सिलसिला आज भी नहीं थमा है। शायद मेरे लेखन प्रेम ने ही पूर्वा को मेरी ओर आकृष्ट किया था। डायरी के पन्ने उलटते, पूर्वा की पुरानी तस्वीर हाथों में थामे, मैं पूर्व में चला गया!

इतना गंभीर, और पूर्वा!! वो ऐसी तो न थी! क्या कोई हादसा तो नहीं? नहीं! नही! वो कितना हंसमुख थी, एक बार बोलना आरंभ कर दे तो उसे रोकना कठिन हो जाता था। रोज़ नयी-नयी ड्रैसेज, पर्स नोटो से लबालब भरा रहता था; और हो भी क्यों न? जमींदार की बेटी थी, और वो भी पुराने रसूकदार जमींदार! पर एक बात तो थी पूर्वा में, उसे कभी अपनी दौलत पर या अपने रसूक पर गुमां नहीं था। तभी किसी भी सहपाठी को किसी भी तरह की कमी की पूर्ति करने में वो हिचकती तक नहीं थी।

पूर्वा मेरी कॉलेज मित्र थी। हम दोनों रूद्र प्रयाग कॉलेज में पढ़ते थे। वो उन दिनों द्वितीय वर्ष में थी जबकि मेरा स्नातक का अंतिम वर्ष था। मेरे कॉलेज नोट्स ही पूर्वा को पसंद थे। मैं भी किसी न किसी नोट्स-आदि के बहाने से पूर्वा से मिलने का प्रयास करता था। हमारा मेलजोल इतना बढ़ गया था कि सब 'मनु-पूर्वा' को एक-साथ पाते थे। लायब्रेरी हो या कैंटीन , बस स्टॉप या कालेज ग्राऊंड, हर जगह दोनो संग-संग। वो एक डेढ़ साल कैसे बीता कुछ भी पता नहीं चला। हम दोनों घंटों-घंटो हर उद्यान की बैंच पर भविष्य की योजनाएं बनाते थे। कितने गिफ़्ट, पत्र आदि आदान प्रदान होते थे। एक थाली में खाना, सुख-दुःख बाटना, घूमना-फिरना सब संग होता था। कितनी ही मर्तवा लगता था कि पूर्वा मुझे चाहती है, पर शायद यह सत्य ही था कि एक मुफ़लिस और अमीर के प्रेम का कोई मेल नहीं होता।

मेरा प्रथम दायित्व परिवार को पालना था। पिता नहीं थे और मां की बीमारी ने मुझे छोटी-मोटी नौकरी तलाशने को मजबूर कर दिया और फिर बहन की शादी, छोटे भाइयों को अच्छी तालीम, मेरा पहला और प्रमुख उद्देश्य था। स्नातक पूरा करते ही मैं नौकरी के चक्कर में भटकने लगा। बड़ी नौकरी के लिए शिक्षा के साथ-साथ बड़ी सिफारिश की ज़रूरत थी, पर मुझे हर ओर से निराशा ही मिलती। पेट की भूख मोहब्बत पर हावी होने लगी थी और मैंने पूर्वा से ना चाहकर भी किनारा कर लिया। उन दिनों मैंने पूर्वा की उपेक्षा करना आरंभ कर दिया था। मेरे जन्मदिन पर वो प्रेम से उपहार लेकर आई थी, पर मैंने घर न होने का बहाना बताकर उसे वापिस लौटा दिया था।

मैं चाहकर भी पूर्वा को कभी न भुला सका।
( continue..)


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